Tuesday, July 7, 2026

GI टैग की रफ़्तार तेज: सिर्फ एक साल में जुड़े 125 नए उत्पाद, अब भारत में 822 GI टैग का नया रिकॉर्ड

GI टैग की रफ़्तार तेज: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है।

वर्ष 2025-26 के दौरान देश के 125 नए उत्पादों को Geographical Indication (GI) Tag प्रदान किया गया। इसके बाद भारत में GI टैग प्राप्त उत्पादों की कुल संख्या बढ़कर 822 हो गई है।

यह उपलब्धि केवल एक सरकारी आंकड़ा नहीं है, बल्कि उन लाखों किसानों, कारीगरों, बुनकरों और हस्तशिल्प कलाकारों के वर्षों के परिश्रम का सम्मान भी है, जिनकी पहचान उनके क्षेत्र से जुड़ी हुई है।

GI टैग ऐसे उत्पादों को उनकी मौलिकता और विशिष्टता के आधार पर कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।

GI टैग की संख्या में तेज बढ़ोतरी क्या संकेत देती है?

GI टैग की रफ़्तार तेज: बीते कुछ वर्षों में भारत ने स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार से जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया है। इसी रणनीति का परिणाम है कि एक ही वर्ष में 125 नए उत्पादों को GI टैग मिला।

इससे पहले देश में 697 उत्पाद इस सूची में शामिल थे, जबकि अब यह आंकड़ा 822 तक पहुंच चुका है।

सरकार और विभिन्न राज्य लगातार ऐसे उत्पादों की पहचान कर रहे हैं, जिनकी गुणवत्ता और प्रतिष्ठा किसी विशेष क्षेत्र से जुड़ी हुई है। इससे स्थानीय उद्योगों को नई पहचान मिलने के साथ-साथ निर्यात बढ़ाने में भी मदद मिल रही है।

आखिर GI टैग होता क्या है?

GI टैग की रफ़्तार तेज: GI यानी Geographical Indication एक ऐसा कानूनी प्रमाणपत्र है, जो यह बताता है कि कोई उत्पाद किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ा हुआ है और उसकी गुणवत्ता या प्रसिद्धि उसी क्षेत्र की विशेष परिस्थितियों के कारण विकसित हुई है।

इस टैग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि दूसरे स्थानों पर बने समान उत्पाद उस नाम का उपयोग नहीं कर सकते। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगती है और असली उत्पाद बनाने वालों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।

कारीगरों और किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है GI टैग?

GI टैग की रफ़्तार तेज: GI टैग मिलने के बाद उत्पाद की विश्वसनीयता बढ़ जाती है, जिससे बाजार में उसकी कीमत बेहतर मिलने लगती है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय खरीदारों का भरोसा भी मजबूत होता है।

इसका सीधा लाभ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलता है। स्थानीय उद्योगों में रोजगार बढ़ता है, पारंपरिक कला जीवित रहती है और छोटे उत्पादकों को बड़े बाजारों तक पहुंचने का अवसर मिलता है। कई क्षेत्रों में GI टैग पर्यटन को बढ़ावा देने का माध्यम भी बन चुका है।

GI टैग मिलने की प्रक्रिया कैसे पूरी होती है?

GI टैग की रफ़्तार तेज: भारत में GI टैग का पंजीकरण चेन्नई स्थित Geographical Indications Registry द्वारा किया जाता है। किसी उत्पाद से जुड़े संगठन, उत्पादक समूह, सहकारी समिति या अधिकृत संस्था आवेदन कर सकती है।

जांच के दौरान यह देखा जाता है कि उत्पाद वास्तव में उस क्षेत्र की विशिष्ट पहचान रखता है या नहीं। सभी मानकों पर खरा उतरने के बाद उसे GI टैग प्रदान किया जाता है। यह पंजीकरण दस वर्षों तक वैध रहता है और बाद में इसका नवीनीकरण कराया जा सकता है।

‘लोकल टू ग्लोबल’ अभियान को मिल रही नई मजबूती

GI टैग की रफ़्तार तेज: आज GI टैग केवल कानूनी सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गया है। यह भारत के “लोकल टू ग्लोबल” अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

कृषि उत्पादों से लेकर हथकरघा, हस्तशिल्प, पारंपरिक खाद्य पदार्थ और लोक कलाओं तक, कई क्षेत्रों को इसका लाभ मिल रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में GI टैग भारतीय उत्पादों की वैश्विक ब्रांडिंग का मजबूत आधार बनेगा और निर्यात बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगा।

देश में अन्य महत्वपूर्ण विकास भी चर्चा में

इसी दौरान भारत ने विज्ञान और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। ISRO ने अंतरिक्ष में मलबे की निगरानी के लिए SOLVE तकनीक विकसित की है, जिससे भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों की सुरक्षा और बेहतर होगी।

वहीं झारखंड के गढ़वा जिले में गोंदली नदी पर लगभग 30 मीटर लंबे पुल के निर्माण को मंजूरी मिली है, जिससे स्थानीय लोगों को बेहतर आवागमन सुविधा मिलेगी।

इसके अलावा भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर कई वैज्ञानिक प्रयोग सफलतापूर्वक पूरे कर भारत की अंतरिक्ष अनुसंधान क्षमता को नई पहचान दिलाई है।

एक साल में 125 नए GI टैग मिलना इस बात का प्रमाण है कि भारत अब अपनी पारंपरिक विरासत को केवल संरक्षित ही नहीं कर रहा, बल्कि उसे वैश्विक बाजार में स्थापित भी कर रहा है।

822 GI टैग का वर्तमान आंकड़ा देश की सांस्कृतिक विविधता, स्थानीय कौशल और आर्थिक संभावनाओं का मजबूत प्रतीक बन चुका है।

यदि यही गति आगे भी जारी रही, तो आने वाले समय में भारत के पारंपरिक उत्पाद विश्व बाजार में और अधिक प्रभावशाली पहचान बना सकेंगे।

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