Thursday, July 16, 2026

27 साल बाद सलाखों से बाहर आएंगे ‘दारा सिंह’: मिशनरियों के चक्रव्यूह और एकतरफा नैरेटिव की इनसाइड स्टोरी!

27 साल बाद सलाखों से बाहर आएंगे ‘दारा सिंह’: ओडिशा की जेल में पिछले 27 सालों से बंद रवींद्र पाल उर्फ दारा सिंह एक बार फिर देश की सुर्खियों में हैं।

साल 1999 से जेल की कालकोठरी में अपनी जवानी खपा देने वाले दारा सिंह को आखिरकार साल 2026 में अदालत से रिहाई की उम्मीद जगी है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने समय पूर्व रिहाई (Premature Release) को लेकर एक अहम रुख अपनाया है, जिसके बाद उनके बाहर आने का रास्ता साफ होता दिख रहा है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की कहानी सिर्फ एक कैदी की रिहाई की नहीं है, बल्कि यह उस गहरे नैरेटिव और कानूनी लड़ाई की दास्तान है जिसने तीन दशकों तक एक व्यक्ति के पूरे अस्तित्व को हिलाकर रख दिया।

27 साल का लंबा इंतजार

27 साल बाद सलाखों से बाहर आएंगे ‘दारा सिंह’: दारा सिंह के वकील के अनुसार, कोर्ट की तरफ से उनकी रिहाई को लेकर सकारात्मक संकेत मिले हैं और आगामी 15 अगस्त तक समिति को इस पर अंतिम निर्णय लेने की उम्मीद जताई गई थी।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले को 19 अगस्त तक के लिए स्थगित करते हुए स्पष्ट किया कि समय पूर्व रिहाई की समीक्षा करने वाली समिति इस बीच अपना फैसला लेगी।

सरकारी वकील योगेश्वरन ने भी अदालत को सूचित किया है कि जिला अदालत से कुछ जरूरी कागजात जुटाए जा रहे हैं, जिन्हें जल्द ही समिति के समक्ष पेश कर दिया जाएगा। 27 सालों से एक ही कोठरी में न्याय का इंतजार कर रहे दारा सिंह के लिए यह किसी बड़ी राहत से कम नहीं है।

सलाखों के पीछे बर्बाद हुई पूरी जवानी

27 साल बाद सलाखों से बाहर आएंगे ‘दारा सिंह’: 60 वर्ष की उम्र पार कर चुके दारा सिंह जब आज जेल से बाहर आने की दहलीज पर खड़े हैं, तो उनके पास अपनी मूल पहचान के अलावा कुछ नहीं बचा है।

इन 27 वर्षों के लंबे अंतराल में उन्होंने अपने माता-पिता और बहन सबको खो दिया। जब उनके अपनों का देहांत हुआ, तब भी उन्हें मुखाग्नि देने या आखिरी बार देखने के लिए पैरोल तक नहीं मिली। विडंबना देखिए कि मुख्यधारा का मीडिया अक्सर इस मानवीय पहलू को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है।

खबरों की हेडलाइन्स आज भी इस तरह बनाई जाती हैं जिससे उनकी रिहाई पर ही सवाल खड़े होने लगें, जबकि एक व्यक्ति के मानवाधिकारों के हनन और उसके जीवन की बर्बादी पर पूरी तरह चुप्पी साध ली जाती है।

मिशनरियों के गढ़ में ‘दारा’

27 साल बाद सलाखों से बाहर आएंगे ‘दारा सिंह’: उत्तर प्रदेश के औरैया से निकलकर नोएडा और फिर ओडिशा के जनजातीय इलाकों में बच्चों को हिंदी पढ़ाने पहुंचे दारा सिंह का जीवन अचानक कैसे बदल गया?

क्या एक स्कूल में बच्चों को अपनी भाषा, संस्कृति और सनातन धर्म के प्रति जागरूक करना कोई अपराध था? या बजरंग दल से जुड़कर जनजातीय समाज को उनके मूल अधिकारों और धर्म के प्रति सचेत करना कोई गुनाह था?

असल में, यह काम कोई कानूनी अपराध नहीं था, लेकिन यह उस समय ओडिशा के अंदरूनी इलाकों में तेजी से फैल रहे ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण अभियान में एक बहुत बड़ा रोड़ा जरूर बन गया था। जनजातीय समाज में आ रही यह सांस्कृतिक जागरूकता मिशनरियों के एजेंडे को सीधे चुनौती दे रही थी।

सेवा की आड़ में धर्मांतरण का सच

27 साल बाद सलाखों से बाहर आएंगे ‘दारा सिंह’: विकीपीडिया और मुख्यधारा के विमर्श में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस को अक्सर कुष्ठ रोगियों (Leprosy Patients) की सेवा करने वाले एक मसीहा के रूप में पेश किया जाता है।

लेकिन सालों से गढ़े गए इस नैरेटिव के पीछे का दूसरा पहलू काफी अलग है। जमीनी हकीकत यह थी कि मयूरभंज और क्योंझर जैसे जिलों में 20 से 25 चर्च खड़े हो चुके थे।

‘जंगल कैंप’ के नाम पर स्थानीय लोगों, विशेषकर महिलाओं और भोले-भाले आदिवासियों को यह विश्वास दिलाया जा रहा था कि उनकी बीमारियां भगवान का श्राप हैं और वे ईसाई बनकर ही ठीक हो सकते हैं।

सेवा की इस आड़ में चल रहे आक्रामक धर्मांतरण ने स्थानीय समाज के भीतर एक गहरे आक्रोश को जन्म दे दिया था।

22 जुलाई 1999 की वो रात

27 साल बाद सलाखों से बाहर आएंगे ‘दारा सिंह’: 22 जुलाई 1999 की रात को जब ग्राहम स्टेंस क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में अपनी गाड़ी के साथ पहुंचे, तो स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा।

भीड़ ने उनकी गाड़ी को घेर लिया और आग लगा दी, जिसमें स्टेंस और उनके दो बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई। हालांकि इस घटना और हिंसा का समर्थन कोई भी सभ्य समाज नहीं कर सकता, लेकिन इसके बाद जो कानूनी चक्रव्यूह रचा गया, उसने कई सवाल खड़े किए।

घटना के बाद दारा सिंह के समर्थकों का हमेशा से यह दावा रहा कि उन्हें इस मामले में केवल इसलिए मुख्य आरोपी बनाया गया ताकि मिशनरियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले हर व्यक्ति को एक कड़ा संदेश दिया जा सके।

यह भी पढ़ें: Dara Singh: कौन है दारा सिंह जो 24 साल से है जेल में बंद, नहीं मिला कोई पैरोल

औरैया के उस टूटे घर की दास्तान

27 साल बाद सलाखों से बाहर आएंगे ‘दारा सिंह’: दारा सिंह के पैतृक निवास औरैया में आज भी उनके भाई अरविंद पाल कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। सालों तक चले मुकदमों के कारण घर के बर्तन, गहने और जमीन तक बिक चुकी है, लेकिन न्याय की उम्मीद नहीं टूटी।

प्रशासनिक स्तर पर यह आरोप भी लगते रहे हैं कि उत्तर प्रदेश प्रशासन द्वारा कई बार दारा सिंह के अच्छे आचरण की रिपोर्ट भेजे जाने के बावजूद, ओडिशा की तत्कालीन सरकारों ने उनकी फाइलों को दबाए रखा।

प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जब इस विषय पर जवाब तलब किया गया, तब भी मामले को लटकाने का प्रयास किया गया। जहां देश में बड़े से बड़े अपराधियों को अच्छे आचरण के नाम पर समय से पहले रिहा कर दिया गया, वहीं दारा सिंह की हर अर्जी को खारिज किया जाता रहा।

स्वामी लक्ष्मणानन्द की हत्या से दारा सिंह तक

27 साल बाद सलाखों से बाहर आएंगे ‘दारा सिंह’: यह देश की सबसे बड़ी विडंबना है कि जहां एक तरफ आतंकी घटनाओं में शामिल लोगों के मानवाधिकारों की दुहाई दी जाती है, वहीं मिशनरियों के तंत्र के खिलाफ खड़े होने वाले दारा सिंह जैसे लोगों के लिए कोई आवाज नहीं उठाता।

ठीक ऐसा ही कुछ साल 2008 में ओडिशा में ही देखने को मिला था, जब जन्माष्टमी के पावन अवसर पर पूज्य स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की निर्मम हत्या कर दी गई थी क्योंकि वे भी धर्म परिवर्तन के खिलाफ खड़े थे।

आज 27 साल बाद जब दारा सिंह की रिहाई की आस जगी है, तो यह केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उस पूरे दमनकारी तंत्र और एकतरफा नैरेटिव पर एक बड़ा सवालिया निशान है जिसने एक व्यक्ति की पूरी जिंदगी और उसके परिवार को तहस-नहस कर दिया।

यह भी पढ़ें: नरोत्तम मिश्रा: बड़ा नेता बनते ही छोटी राजनीति छोड़ देनी चाहिए


WhatsApp Channel Join Now
Telegram Channel Join Now
- Advertisement -
- Advertisement -

Latest article