Thursday, July 16, 2026

फ़िल्म ‘सतलुज’ और पंजाब का अधूरा सच: क्या हम इतिहास के सबसे बड़े नरसंहारों को भूल रहे हैं?

फ़िल्म ‘सतलुज’ और पंजाब का अधूरा सच: आज जब दिलजीत दोसांझ अभिनीत फ़िल्म ‘सतलुज’ (पूर्व नाम: घल्लूघारा/पंजाब 95) को लेकर बहस छिड़ी है, तो पंजाब में 80 और 90 के दशक के उस खौफ़नाक दौर की यादें एक बार फिर ताज़ा हो गई हैं।

हमेशा की तरह, इस बार भी सोशल मीडिया और गलियारों में दो नैरेटिव तैर रहे हैं। पहला नैरेटिव उन तमाम बेगुनाह हिंदुओं और सिखों का है, जो आतंकवाद की बलिवेदी पर चढ़ गए।

दूसरा नैरेटिव उन ताकतों का है, जो इस दर्दनाक इतिहास का इस्तेमाल अपने अलगाववादी एजेंडे को चमकाने के लिए कर रही हैं।

दुर्भाग्य यह है कि सच्चाई बयां करने वाला पहला पक्ष आज धुंधला पड़ता जा रहा है और चुनिंदा एजेंडों वाली कहानियां हावी हो रही हैं।

जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी और ‘सतलुज’ का एकतरफ़ा फ़्रेम

फ़िल्म ‘सतलुज’ और पंजाब का अधूरा सच: यह फ़िल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन, पुलिस की कथित बर्बरता और लापता लोगों के गुप्त अंतिम संस्कारों की जांच पर केंद्रित है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि खालड़ा का अपहरण और उनकी हत्या एक जघन्य अपराध था, जिसके लिए ज़िम्मेदार पुलिसकर्मियों को सज़ा भी मिली। कानून के राज में ऐसी घटनाओं का कोई बचाव नहीं कर सकता।

लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब कोई फ़िल्म पूरे पंजाब के आतंकवाद को केवल और केवल ‘पुलिसिया कार्रवाई’ का नतीजा दिखाकर सिमट जाती है। यह सिनेमाई आज़ादी तो हो सकती है, लेकिन यह पंजाब का मुकम्मल इतिहास नहीं है।

वह खूनी सच, जिसे सिनेमा के कैमरों ने छोड़ दिया

फ़िल्म ‘सतलुज’ और पंजाब का अधूरा सच: जिस दौर को आज एक ‘प्रतिरोध आंदोलन’ (Resistance Movement) की तरह पेश करने की कोशिश की जा रही है, उसकी असलियत बेहद वीभत्स थी।

यह वही दौर था जब खालिस्तानी उग्रवादी चलती बस और ट्रेनों को रोकते थे, यात्रियों की आईडी चेक करते थे और सिर्फ हिंदू होने की वजह से उन्हें कतार में खड़ा कर गोलियों से भून देते थे।

यह वही दौर था जब अमन-चैन की बात करने वाले सिख नेताओं को ‘गद्दार’ कहकर मार दिया जाता था। सरकारी दफ़्तरों में बम धमाके होते थे और हर सुबह ड्यूटी पर निकलने वाले पुलिसकर्मी के परिवार को यह नहीं पता होता था कि उनका बेटा, पति या पिता शाम को ज़िंदा घर लौटेगा या नहीं।

इन बेगुनाह पीड़ितों पर आज कोई बड़ी डिबेट नहीं होती, न ही इनके लिए कोई कैंडल मार्च निकलता है।

ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले ही सुलग चुका था पंजाब

फ़िल्म ‘सतलुज’ और पंजाब का अधूरा सच: आज के दौर में एक बहुत बड़ा भ्रम फैलाया गया है कि पंजाब में सारी हिंसा ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ (1984) के बाद शुरू हुई। लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज़ और तथ्य इसके बिल्कुल उलट हैं।

अलगाववाद के खिलाफ लिखने वाले मशहूर पत्रकार लाला जगत नारायण की हत्या 1981 में ही कर दी गई थी। अप्रैल 1983 में डीआईजी अवतार सिंह अटवाल को स्वर्ण मंदिर के पवित्र परिसर के ठीक बाहर मौत के घाट उतार दिया गया था।

अक्टूबर 1983 में धिलवां के पास एक बस से निकालकर 6 हिंदू यात्रियों की हत्या की गई। ये सारी घटनाएं चीख-चीखकर गवाही देती हैं कि सेना के स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से बहुत पहले ही पंजाब में उग्रवाद अपनी जड़ें पूरी तरह जमा चुका था।

खूदा और मुक्तसर के वो खौफ़नाक नरसंहार

फ़िल्म ‘सतलुज’ और पंजाब का अधूरा सच: पंजाब के इतिहास का सबसे काला पन्ना वो था, जब आम नागरिकों को उनकी धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया।

30 नवंबर 1986 को होशियारपुर के खूदा में हथियारबंद आतंकवादियों ने एक बस रोकी, हिंदू यात्रियों को नीचे उतारा और अंधाधुंध फायरिंग कर 24 लोगों को मार डाला।

ठीक इसी तरह का पैटर्न मुक्तसर, लालरू, फतेहाबाद और अबोहर में भी अपनाया गया। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया जैसे Los Angeles Times की तत्कालीन रिपोर्टें गवाह हैं कि कैसे सिख यात्रियों को सुरक्षित जाने दिया जाता था और हिंदू यात्रियों को चुन-चुनकर मारा जाता था।

ये मौतें किसी क्रॉसफ़ायर का हिस्सा नहीं थीं, यह एक सोची-समझी जनसांख्यिकीय और राजनीतिक साज़िश थी।

मोगा का नेहरू पार्क: जब आरएसएस की शाखा को दहलाया गया

फ़िल्म ‘सतलुज’ और पंजाब का अधूरा सच: जून 1989 में मोगा के नेहरू पार्क में राष्ट्र स्वयंसेवक संघ (RSS) की सुबह की शाखा पर हुआ हमला आतंकवादियों की क्रूर कार्यप्रणाली का एक बड़ा उदाहरण है।

वहां न केवल अंधाधुंध गोलियां चलाई गईं, बल्कि पहले से बम भी प्लांट किए गए थे। जब पुलिस और स्थानीय लोग घायलों की मदद के लिए दौड़े, तो दूसरा धमाका हुआ ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग मारे जा सकें।

इस हमले में 24 लोगों की जान गई। इसका मकसद साफ था कि पंजाब के हिंदुओं में इस कदर खौफ़ भर देना कि वे पलायन करने पर मजबूर हो जाएं, और पंजाब के बाहर सिखों के खिलाफ प्रतिक्रिया भड़के, जिससे देश का सांप्रदायिक ताना-बाना पूरी तरह टूट जाए।

अलगाववाद के खिलाफ खड़े होने वाले सिखों का बलिदान

फ़िल्म ‘सतलुज’ और पंजाब का अधूरा सच: यह समझना बेहद ज़रूरी है कि खालिस्तानी आतंकवाद कोई ‘हिंदू बनाम सिख’ लड़ाई नहीं थी। उग्रवादियों का विरोध करने वाले हज़ारों सिख भी उनके निशाने पर थे।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण संत हरचंद सिंह लोंगोवाल हैं। उन्होंने जब 1985 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ ‘पंजाब समझौते’ पर हस्ताक्षर कर शांति बहाली की कोशिश की, तो एक महीने के भीतर ही एक गुरुद्वारे में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।

जिन ग्रामीण सिखों ने पुलिस की मदद की, जिन परिवारों के बच्चे पुलिस में भर्ती हुए, या जिन्होंने लोकतांत्रिक चुनावों में हिस्सा लिया, उन्हें अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी।

इसलिए, खालिस्तानी मानसिकता की आलोचना करना किसी भी तरह से सिख समुदाय की आलोचना नहीं है।

जब कलम को चुप कराने के लिए काट दिए गए सिर

फ़िल्म ‘सतलुज’ और पंजाब का अधूरा सच: अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सबसे बड़ा हमला उस दौर के मीडिया पर हुआ था। उग्रवादियों ने पत्रकारों, संवाददाताओं, अखबार के एजेंटों और यहाँ तक कि हॉकरों तक को अपनी हिट लिस्ट में डाल दिया था।

पंजाब केसरी समूह के लाला जगत नारायण और उनके बेटे रोमेश चंद्र की हत्या के बाद भी जब मीडिया नहीं झुका, तो आतंक का एक नया दौर शुरू हुआ।

मई 1992 में ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन डायरेक्टर एम.एल. मंचंदा का अपहरण कर लिया गया। उग्रवादी संगठन बब्बर खालसा चाहता था कि रेडियो स्टेशन उनकी भाषा में खबरें पढ़े।

जब सरकार ने घुटने टेकने से इनकार कर दिया, तो मंचंदा का सिर धड़ से अलग कर दिया गया। यह पूरी पत्रकारिता बिरादरी को डराने और अपनी आचार संहिता थोपने का एक खूनी प्रयास था।

पंजाब पुलिस के 1,800 जांबाजों की अनकही शहादत

फ़िल्म ‘सतलुज’ और पंजाब का अधूरा सच: आज पंजाब पुलिस की ज्यादतियों पर तो खूब चर्चा होती है, लेकिन उस आतंक से लोहा लेते हुए शहीद हुए 1,784 पुलिस अधिकारियों और जवानों की शहादत को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

जब स्वर्ण मंदिर के बाहर डीआईजी अटवाल की हत्या हुई, तो उनका शव घंटों वहीं पड़ा रहा क्योंकि राज्य का मनोबल टूट चुका था।

जनवरी 1990 में जालंधर के पीएपी मुख्यालय के भीतर कमांडेंट गोबिंद राम के दफ़्तर को बम से उड़ा दिया गया। पुलिसवालों के परिवारों को जिंदा जला देने की धमकियां मिलती थीं।

ऐसे खौफ़नाक माहौल में जब कानून व्यवस्था पूरी तरह ढह चुकी थी, पुलिस को असाधारण और आक्रामक रणनीतियां अपनानी पड़ीं।

उग्रवाद को कुचलने के इस भीषण दौर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप भी लगे, जिनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह कटई नहीं कि हम अपने जवानों के बलिदान को ही भुला दें।

‘सिलेक्टिव एम्नेशिया’ और इतिहास बदलने की साज़िश

फ़िल्म ‘सतलुज’ और पंजाब का अधूरा सच: इतिहास को बदलने का सबसे शातिर तरीका यह नहीं है कि आप झूठ बोलें, बल्कि यह है कि आप सच का एक हिस्सा छुपा लें।

आज के नैरेटिव में आतंकवादी को एक ‘सहानुभूति के पात्र’, एक भाई या एक पीड़ित के रूप में स्थापित कर दिया जाता है, जबकि उसके हाथों मारे गए मासूम लोग सिर्फ एक ‘संख्या’ बनकर रह जाते हैं।

यही पैटर्न दुनिया भर के कई अन्य आतंकवादी नैरेटिव्स में भी देखा गया है, जहां सुरक्षा बलों की कार्रवाई को तो बड़ा गुनाह साबित किया जाता है, लेकिन आतंक की शुरुआत करने वालों को ‘हालात का शिकार’ बताकर उनका महिमामंडन किया जाता है।

पंजाब का इतिहास इन दोनों छोरों के बीच फंसा हुआ है। 1984 के सिख विरोधी दंगे भारतीय लोकतंत्र पर एक बड़ा कलंक थे, जिसे कभी सही नहीं ठहराया जा सकता, ठीक उसी तरह पुलिस की ज्यादतियों को भी जायज़ नहीं कहा जा सकता।

लेकिन इनके बहाने खालिस्तानी उग्रवादियों द्वारा किए गए बेगुनाहों के नरसंहारों पर पर्दा डालना इतिहास के साथ सबसे बड़ा धोखा होगा।

सिनेमा आज़ाद है, लेकिन इतिहास बंधक नहीं

फ़िल्म ‘सतलुज’ और पंजाब का अधूरा सच: फ़िल्म ‘सतलुज’ या कोई भी अन्य कलाकृति अपनी पसंद का दृष्टिकोण चुनने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। वे किसी एक पक्ष पर अपनी कहानी केंद्रित रख सकते हैं।

लेकिन हमें यह याद रखना होगा कि एक चुनिंदा फ़िल्म कभी भी पूरा इतिहास नहीं हो सकती। पंजाब के मुकम्मल इतिहास में उस बेगुनाह हिंदू यात्री की भी जगह है जिसे बस से उतारकर मार दिया गया,

उस साहसी सिख संपादक की भी जगह है जिसने उग्रवादियों के आगे कलम नहीं झुकाई, और उस सिपाही की भी यादें हैं जिसने देश की अखंडता के लिए हंसते-हंसते जान दे दी। सच को उसके पूरे स्वरूप में देखना ही उन तमाम पीड़ितों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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