जयपुर के गांव में स्कूल जांच के दौरान भड़का बवाल
जयपुर के एक गांव में आज स्कूलों की जांच के लिए पहुंचे तिलचट्टा पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं का स्थानीय ग्रामीणों से टकराव हो गया। विवाद इतना बढ़ा कि ग्रामीणों ने उन्हें दौड़ाकर पीटा, बेल्ट चलाए, पत्थर फेंके और उनकी गाड़ियों में भी तोड़फोड़ कर दी।
यह घटना सामान्य धक्का मुक्की या एक दो थप्पड़ों तक सीमित नहीं रही। ग्रामीण काफी उग्र हो गए और उन्होंने समूह के सदस्यों को गांव से खदेड़ते हुए लगातार मारा। कई गाड़ियों के शीशे टूटे, वाहनों को नुकसान पहुंचा और इलाके में अफरातफरी फैल गई।
किस अधिकार से स्कूलों का ऑडिट करने निकला समूह
विवाद की जड़ उस दावे में है, जिसके तहत यह समूह देश भर के स्कूलों की जांच और ऑडिट करने की बात कर रहा है। सवाल है कि किसी निजी संगठन को सरकारी विद्यालयों और कार्यालयों की जांच का अधिकार आखिर किस कानून से मिला है।
सरकारी विद्यालय में चपरासी की नौकरी पाने के लिए भी अभ्यर्थियों को कई परीक्षाओं और चयन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इसके विपरीत कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करके खुद को शिक्षा व्यवस्था का निरीक्षक समझने लगे, तो उसके अधिकार पर गंभीर सवाल उठते हैं।
फेसबुक पर करोड़ों फॉलोवर होना किसी व्यक्ति को सरकारी संस्थानों का प्रशासनिक अधिकारी नहीं बना देता। यदि लोकप्रियता ही अधिकार का आधार हो, तो मनोरंजन जगत की लोकप्रिय हस्तियां भी हर सरकारी कार्यालय की प्रमुख होने का दावा कर सकती हैं, जो पूरी तरह हास्यास्पद होगा।
चालीस पचास लोगों की भीड़ से कैसे सुधरेगी शिक्षा
किसी विद्यालय में चालीस या पचास लोग घुस जाएं, शिक्षकों को धमकाएं, उनसे जबरन रजिस्टर मांगें, डांटते हुए वीडियो बनाएं और उसे सोशल मीडिया पर वायरल करें, तो शिक्षा की गुणवत्ता नहीं सुधरती। इसका लाभ केवल प्रचार और राजनीतिक दृश्यता बढ़ाने में मिलता है।
स्कूलों की कमियां सामने लाना अलग बात है, लेकिन शिक्षकों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करके वीडियो बनाना किसी संस्थागत सुधार की प्रक्रिया नहीं है। इससे बच्चों की पढ़ाई, विद्यालय प्रबंधन या शिक्षकों की कार्यक्षमता में कोई वास्तविक बदलाव होने की ठोस व्यवस्था तैयार नहीं होती।
कई परीक्षाओं के बाद मिलती है शिक्षक की नौकरी
शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया बताती है कि यह नौकरी किसी आकस्मिक चयन का परिणाम नहीं होती। कई राज्यों में अभ्यर्थी पहले बीएड करते हैं, फिर शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करते हैं और उसके बाद राज्य स्तरीय भर्ती परीक्षा में बैठने के योग्य बन पाते हैं।
बिहार जैसे राज्यों में शिक्षक बनने की प्रक्रिया और लंबी है। अभ्यर्थियों को बीएड के बाद TET पास करना पड़ता है, फिर बीपीएससी की परीक्षा देनी होती है। नई व्यवस्था में अतिरिक्त परीक्षाओं से गुजरने के बाद ही स्थायी नौकरी तक पहुंचने का रास्ता खुलता है।
अन्य राज्यों में भी शिक्षक नियुक्ति के लिए लगभग इसी तरह शैक्षणिक योग्यता, पात्रता परीक्षा और भर्ती परीक्षा की प्रक्रिया रहती है। यानी नियुक्त शिक्षक पहले ही कई स्तरों पर अपनी योग्यता साबित करके विद्यालय तक पहुंचता है और उसके बाद उसे सरकारी सेवा की जिम्मेदारी मिलती है।
स्वयंभू निरीक्षक किस आधार पर लेंगे शिक्षकों का टेस्ट
ऐसी स्थिति में कोई व्यक्ति, जिसने किसी प्रतियोगी परीक्षा से प्रशासनिक या शैक्षणिक अधिकार प्राप्त नहीं किया, नियुक्त शिक्षकों का परीक्षण लेने लगे तो विरोध पैदा होना स्वाभाविक है। सवाल है कि स्वयंभू निरीक्षक आखिर किन नियमों और मानकों के आधार पर शिक्षकों का मूल्यांकन करते हैं।
जो लोग स्वयं अपने जीवन में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी स्तर की प्रतियोगी परीक्षा तक पास नहीं कर सके, वे यदि नियुक्त शिक्षकों की योग्यता जांचने निकल पड़ें तो उनकी अपनी पात्रता भी सवालों में आएगी। निरीक्षण करने वाले की योग्यता और वैधानिक स्थिति भी स्पष्ट होना जरूरी है।
जर्जर स्कूल और शिक्षकों की कमी का जिम्मेदार कौन
व्यवस्था सुधारने का दावा करने वाले समूहों की प्राथमिकता भी सवालों में है। किसी विद्यालय की इमारत जर्जर हो, शौचालय न हो, कमरों की कमी हो या पर्याप्त शिक्षक न हों, तो इन समस्याओं की जिम्मेदारी शिक्षक से अधिक प्रशासन और नीतिगत व्यवस्था पर होती है।
बजट जारी करना, भवन बनवाना, शिक्षकों की नियुक्ति करना, पद स्वीकृत करना और संसाधन उपलब्ध कराना सामान्य शिक्षक के अधिकार क्षेत्र में नहीं होता। इन व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संबंधित विभाग और अधिकारियों की होती है, इसलिए सुधार की मांग का वास्तविक केंद्र भी वहीं होना चाहिए।
अधिकारियों के बजाय शिक्षक ही आसान निशाना क्यों
फिर भी ऐसे समूह उन अधिकारियों तक कम पहुंचते हैं, जिनके पास बजट, नियुक्ति, निर्माण और संसाधनों से जुड़े वास्तविक अधिकार होते हैं। विद्यालय में शिक्षक से बहस करना आसान है, क्योंकि वहां कैमरे के सामने टकराव, डांट फटकार और वायरल वीडियो की गुंजाइश ज्यादा रहती है।
यहीं से सवाल उठता है कि लक्ष्य वास्तव में शिक्षा व्यवस्था सुधारना है या सोशल मीडिया के लिए आक्रामक सामग्री तैयार करना। यदि सुधार उद्देश्य है, तो शिकायत, दस्तावेज, प्रशासनिक कार्रवाई और जवाबदेही की वैधानिक प्रक्रिया भी पूरे अभियान में साफ दिखाई देनी चाहिए।
योग्य और अयोग्य शिक्षक तय करने का पैमाना क्या
एक गंभीर सवाल योग्यता तय करने के मापदंड का भी है। जो शिक्षक अनेक शैक्षणिक और प्रतियोगी परीक्षाएं पास करके नियुक्त हुए हैं, उन्हें अयोग्य बताने वालों के पास योग्य शिक्षक चुनने का कौन सा बेहतर तरीका है। कुछ सवाल किसी की पेशेवर क्षमता का अंतिम प्रमाण नहीं होते।
यदि किसी संगठन के पास शिक्षा सुधार का ठोस मॉडल है, तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए। स्पष्ट होना चाहिए कि शिक्षक की योग्यता किन विषयगत मानकों, शिक्षण परिणामों, कक्षा प्रबंधन, प्रशिक्षण, विद्यार्थियों की प्रगति और सरकारी नियमों के आधार पर मापी जाने वाली है।
व्यवस्था बदलनी है तो लोकतांत्रिक रास्ता खुला है
यदि किसी समूह में वास्तव में व्यवस्था सुधारने का सेवा भाव है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था उसके लिए स्पष्ट रास्ता देती है। वह चुनाव लड़ सकता है, जनता का समर्थन हासिल कर सकता है और सत्ता में पहुंचकर शिक्षा विभाग के नियमों, जवाबदेही तथा निरीक्षण प्रणाली को बदल सकता है।
लोकतंत्र में नीतियां बदलने, अधिकारियों को जवाबदेह बनाने और सरकारी संस्थानों के संचालन में परिवर्तन करने के संवैधानिक रास्ते मौजूद हैं। भीड़ लेकर विद्यालयों में पहुंचना और बिना अधिकार कर्मचारियों की जांच शुरू कर देना किसी निर्वाचित अथवा वैधानिक निरीक्षण व्यवस्था का विकल्प नहीं बन सकता।
बिना वैधानिक अधिकार भीड़ के साथ संस्थानों में घुसना, कर्मचारियों को अपमानित करना और सोशल मीडिया के लिए टकराव पैदा करना सुधार की स्वीकार्य प्रक्रिया नहीं है। जयपुर की घटना ने दिखाया कि हुड़दंग की भाषा अपनाई जाएगी तो जनता की प्रतिक्रिया भी उतनी ही कठोर हो सकती है।

