Friday, June 5, 2026

कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई कम मनोरंजन ज्यादा! क्या हैं फायदे और नुकसान ?

कोचिंग

पढ़ाई की जगह उत्सव और धूमधाम का माहौल

आज कई कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई से अधिक उत्सव, पार्टी और मनोरंजन का माहौल दिखाई देता है। कहीं शिक्षक या छात्र का जन्मदिन मनाया जाता है, कहीं क्रिसमस, नया साल या दूसरे अवसरों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

इन आयोजनों में डीजे, फोम स्प्रे, गुब्बारे, रंग गुलाल और नाच गाने जैसी गतिविधियां आम होती जा रही हैं। कई जगह होली जैसे त्योहार भी इसी अंदाज में मनाए जाते हैं, जहां छात्र और शिक्षक साथ मिलकर मनोरंजन में शामिल होते हैं।

कुछ मामलों में यह माहौल सामान्य उत्सव से आगे बढ़कर मर्यादा की सीमा भी पार करता दिखता है। आरोप लगते हैं कि कुछ शिक्षक लोकप्रियता पाने के लिए फिल्मी गानों पर भद्दे अंदाज में नृत्य करते हैं और इसे फन जोन का हिस्सा बताते हैं।

ऐसी कोचिंग्स छात्रों को क्यों भाती हैं

  1. इन कोचिंग्स में छात्रों को पढ़ाई के साथ मनोरंजन का माहौल मिलता है, इसलिए वे वहां सहज महसूस करते हैं।
  2. गंभीर अध्ययन की तुलना में हल्का फुल्का वातावरण कई छात्रों को अधिक आकर्षक लगता है।
  3. जन्मदिन, त्योहार, डीजे और फन एक्टिविटी से कोचिंग का माहौल स्कूल कॉलेज जैसा मनोरंजक बन जाता है।
  4. छात्र ऐसे संस्थानों को कम बोझिल और ज्यादा मजेदार मानते हैं।
  5. सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो देखकर नए छात्र भी इन कोचिंग्स की ओर आकर्षित होते हैं।
  6. फन जोन वाली कोचिंग्स में प्रवेश लेने की होड़ इसलिए भी रहती है क्योंकि वहां पढ़ाई के साथ लगातार मनोरंजन का प्रचार किया जाता है।

पढ़ाई कम और मनोरंजन ज्यादा

ऐसी कोचिंग्स पर आलोचकों का आरोप है कि वहां पढ़ाई का हिस्सा कम और मनोरंजन का प्रभाव अधिक होता है। कई जगह वातावरण ऐसा बन जाता है कि पढ़ाई दस प्रतिशत और मनोरंजन नब्बे प्रतिशत जैसा दिखाई देता है।

फिर भी ऐसी कोचिंग्स फुल चलती हैं, क्योंकि आज बड़ी संख्या में छात्र गंभीर अध्ययन के बजाय ऐसे माहौल को पसंद करते हैं, जहां पढ़ाई के साथ हंसी मजाक, शोर शराबा और उत्सव का रंग बना रहे।

शिक्षकों की बदलती भूमिका

आजकल कई कोचिंग संस्थानों में शिक्षक पढ़ाते समय विषय पर केंद्रित रहने के बजाय चुटकुले, शेरो शायरी, राजनीतिक व्यंग्य और हल्की फुल्की बातों पर अधिक जोर देते दिखाई देते हैं। इससे कक्षा मनोरंजक बनती है, लेकिन पढ़ाई पीछे छूट जाती है।

कई जगह आरोप यह भी लगते हैं कि कुछ शिक्षक कक्षा को पढ़ाई का मंच न रखकर वैचारिक प्रचार का माध्यम बना देते हैं। किसी धर्म, दल या विचारधारा के विरोध में टिप्पणी करके वे छात्रों के बीच अपनी अलग छवि बनाने की कोशिश करते हैं।

छात्राओं के प्रति आपत्तिजनक व्यवहार का आरोप

जयपुर में राजस्थान सामान्य ज्ञान पढ़ाने वाले एक चर्चित शिक्षक को लेकर भी ऐसी शिकायतें सामने आईं कि वह छात्राओं के प्रश्न पूछने पर छिछोरी हंसी के साथ आपत्तिजनक टिप्पणी करता था। ऐसी बातों पर कक्षा में ठहाके लगते थे और छात्राएं असहज हो जाती थीं।

इस प्रकार का व्यवहार शिक्षा के वातावरण को प्रभावित करता है। शिक्षक और छात्र के संबंध में गरिमा, मर्यादा और अनुशासन आवश्यक हैं, लेकिन जब लोकप्रियता के लिए हल्के संवादों का इस्तेमाल होता है, तब शैक्षिक माहौल कमजोर पड़ता है।

मनोरंजन वाली कोचिंग्स के फायदे

  1. छात्रों को कोचिंग का माहौल हल्का और आकर्षक लगता है।
  2. नए छात्रों को जोड़ने में ऐसे संस्थानों को आसानी होती है।
  3. सोशल मीडिया पर प्रचार तेजी से फैलता है।
  4. संस्थान की लोकप्रियता जल्दी बढ़ती है।
  5. छात्रों को तनावमुक्त माहौल का अनुभव होता है।
  6. आयोजनों और वीडियो के कारण ब्रांड वैल्यू मजबूत होती है।
  7. कम गंभीर छात्र भी ऐसे माहौल के कारण कोचिंग से जुड़े रहते हैं।
  8. ऑनलाइन कोर्स बेचने में ऐसे शिक्षकों की लोकप्रियता काम आती है।
  9. वायरल वीडियो से संस्थान को मुफ्त प्रचार मिलता है।
  10. बाजार में प्रतिस्पर्धा के बीच ऐसी कोचिंग्स जल्दी पहचान बना लेती हैं।

मनोरंजन आधारित माहौल के नुकसान

  1. पढ़ाई की गंभीरता कमजोर हो जाती है।
  2. छात्र विषय की गहराई से दूर हो सकते हैं।
  3. शिक्षक की भूमिका ज्ञानदाता से मनोरंजनकर्ता जैसी बन जाती है।
  4. अनुशासन और एकाग्रता प्रभावित होती है।
  5. कक्षा में मर्यादा भंग होने का खतरा बढ़ता है।
  6. छात्र परीक्षा की वास्तविक तैयारी से भटक सकते हैं।
  7. मेहनती और गंभीर शिक्षक लोकप्रियता की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं।
  8. सोशल मीडिया के दबाव में शिक्षा तमाशे जैसी बनने लगती है।
  9. छात्र गंभीर अध्ययन को बोरिंग समझने लगते हैं।
  10. शिक्षक छात्र संबंधों में अनुचित निकटता या गलत संदेश का खतरा बढ़ सकता है।

अनुशासन वाली कोचिंग्स क्यों पिछड़ती दिखती हैं

इसके विपरीत वे कोचिंग संस्थान पीछे छूटते दिखते हैं, जहां अनुशासन को सख्ती से लागू किया जाता है। जहां केवल पढ़ाई होती है, विषय पर ध्यान दिया जाता है और शिक्षक मनोरंजन की जगह समझाने पर जोर देते हैं, वहां माहौल कई छात्रों को नीरस लगता है।

गंभीर अध्ययन वाले संस्थानों को अक्सर बोरिंग बताया जाता है। ऐसे माहौल में छात्रों की संख्या कम रहती है, क्योंकि बड़ी संख्या में छात्र उस अनुशासन को स्वीकार नहीं कर पाते। उनके लिए ऐसी कोचिंग जाना भारी और अप्रिय अनुभव जैसा बन जाता है।

बाजारी प्रतिस्पर्धा में कोचिंग संस्थानों की मजबूरी

प्रतिस्पर्धा के इस दौर में कई कोचिंग संस्थानों के लिए मनोरंजनात्मक वातावरण बनाना मजबूरी बन गया है। वे ऐसे शिक्षकों को प्राथमिकता देते हैं जो छात्रों को हंसा सकें, चटपटी बातें कर सकें और कक्षा को गंभीर अध्ययन की जगह शो जैसा बना सकें।

आज लोकप्रिय शिक्षक की परिभाषा भी बदलती दिख रही है। कई छात्रों के बीच वही शिक्षक चर्चित होता है जो खूब हंसाता है, व्यंग्य करता है, मंचीय अंदाज में बोलता है और पढ़ाई से अधिक माहौल बनाने में माहिर होता है।

आज की बेस्ट कोचिंग की बदली हुई परिभाषा

आज कई छात्रों की नजर में अच्छी कोचिंग वही है जहां साल भर नाच गाना, धूमधाम, जन्मदिन, त्योहार और मनोरंजन चलता रहे। पढ़ाई की गुणवत्ता से अधिक कोचिंग का माहौल और सोशल मीडिया पर उसका प्रदर्शन निर्णय को प्रभावित करता है।

इसके उलट जिन संस्थानों में यह सब नहीं होता, उन्हें बोरिंग और बोझिल माना जाता है। ऐसे संस्थानों के शिक्षक भी छात्रों में उतने लोकप्रिय नहीं हो पाते, क्योंकि उनका जोर पढ़ाई, अनुशासन और विषय की गहराई पर रहता है।

सोशल मीडिया ने बढ़ाया दिखावे का दबाव

सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तेज किया है। हंसते, हंसाते, ठहाके लगाते और लफ्फाजी करते शिक्षकों के छोटे वीडियो तेजी से फैलते हैं। ऐसे वीडियो संस्थानों के लिए प्रचार का माध्यम बनते हैं और छात्रों को आकर्षित करने का साधन भी।

गंभीरता से पढ़ाने वाला शिक्षक सोशल मीडिया के इस दौर में अक्सर पीछे छूट जाता है। वह विषय समझाता है, अवधारणाओं को स्पष्ट करता है और अनुशासन पर जोर देता है, लेकिन उसके वीडियो उतने मनोरंजक नहीं दिखते, इसलिए उन्हें जल्दी स्क्रॉल या स्किप कर दिया जाता है।

छात्रों की बदलती पसंद पर सवाल

यह स्थिति केवल कोचिंग संस्थानों या शिक्षकों की समस्या नहीं है, बल्कि छात्रों की बदलती पसंद का भी परिणाम है। बड़ी संख्या में छात्र अब कठिन अध्ययन, निरंतर अभ्यास, अनुशासन और गंभीर शैक्षिक माहौल की जगह हल्के मनोरंजन को प्राथमिकता देते दिखते हैं।

आलोचकों का मानना है कि आज का बड़ा छात्र वर्ग शिक्षा से अधिक मनोरंजन चाहता है। वह मेहनती, कर्मठ और अनुशासनप्रिय शिक्षक की अपेक्षा ऐसे शिक्षक को पसंद करता है जो कक्षा को हल्का, मजेदार और वायरल सामग्री जैसा बना सके।

शिक्षा की गंभीरता बचाने की चुनौती

कोचिंग संस्थानों का मूल उद्देश्य छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं, विषय ज्ञान और भविष्य की तैयारी के लिए सक्षम बनाना है। लेकिन जब वातावरण का केंद्र अध्ययन से हटकर मनोरंजन बन जाता है, तब शिक्षा का चरित्र कमजोर होने लगता है।

उत्सव, सहजता और हल्के वातावरण का विरोध नहीं किया जा सकता, लेकिन जब वही पढ़ाई पर हावी हो जाए, तब समस्या गंभीर हो जाती है। शिक्षक की गरिमा, छात्र की एकाग्रता और संस्थान की शैक्षिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि कोचिंग संस्थान लोकप्रियता और बाजार की होड़ में शिक्षा को तमाशा न बनाएं। छात्रों को भी यह समझना होगा कि परीक्षा, करियर और ज्ञान मनोरंजन से नहीं, अनुशासन, मेहनत और गंभीर अध्ययन से बनते हैं।

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Mudit
Mudit
लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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