अमित शाह
आडवाणी मॉडल से तुलना क्यों हो रही है
लालकृष्ण आडवाणी को अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल के बीच उपप्रधानमंत्री बनाकर राजनीतिक रूप से ऊंचा स्थान दिया था। अब सत्ता और संगठन की राजनीति को देखने वाले कुछ लोग उसी पुराने उदाहरण के आधार पर अमित शाह के लिए ऐसी संभावना जता रहे हैं।
लेकिन इस तुलना को सीधा मान लेना राजनीतिक भूल होगी। 2002 की भाजपा और 2026 की भाजपा की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। उस समय सत्ता संतुलन, संघ परिवार की स्वीकार्यता, गठबंधन की मजबूरियां और नेतृत्व की आंतरिक स्थिति बिल्कुल अलग प्रकार की थी।
2002 में आडवाणी को पदोन्नति क्यों मिली
जून 2002 में जब आडवाणी उपप्रधानमंत्री बनाए गए, तब प्रधानमंत्री कार्यालय और नॉर्थ ब्लॉक के बीच तनाव जैसी खबरें लगातार सामने आती थीं। वाजपेयी को यह भी महसूस हो रहा था कि संघ परिवार में उनकी स्वीकार्यता पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई है।
ऐसे माहौल में आडवाणी को पदोन्नत करना केवल प्रशासनिक फैसला नहीं था। यह संघ परिवार और व्यापक संगठन को संतुष्ट करने वाला राजनीतिक संदेश भी था। वाजपेयी ने आडवाणी को ऊपर उठाकर भाजपा के मूल वैचारिक परिवार का भरोसा फिर से साधने की कोशिश की थी।
वाजपेयी और आडवाणी का संबंध अलग था
वाजपेयी और आडवाणी लगभग एक ही पीढ़ी के नेता थे। अस्सी के दशक से दोनों को भाजपा के भीतर अलग अलग शक्ति केंद्रों के रूप में देखा जाने लगा था। रथयात्रा के बाद आडवाणी का कद तेजी से बढ़ा और संतुलन बदल गया।
वाजपेयी के सक्रिय रहने तक भाजपा में नंबर एक और नंबर दो की चर्चा इन्हीं दोनों के इर्द गिर्द घूमती रही। जब वाजपेयी स्वास्थ्य कारणों से पीछे हटे, तब आडवाणी पार्टी के सबसे बड़े नेता बने और 2009 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी रहे।
मोदी और शाह के समीकरण बिल्कुल अलग
मौजूदा स्थिति में नरेंद्र मोदी और अमित शाह को किसी भी रूप में प्रतियोगी नहीं माना जा सकता। प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की उम्र में चौदह वर्ष का अंतर है। शाह स्पष्ट रूप से जूनियर हैं और मोदी नेतृत्व के भरोसेमंद स्तंभ माने जाते हैं।
अमित शाह आज पार्टी, सरकार और राष्ट्रीय राजनीति में स्वतः ही नंबर दो की स्थिति रखते हैं। उन्हें यह साबित करने की जरूरत नहीं कि वे कितने शक्तिशाली हैं। संगठन से लेकर सरकार तक, उनके फैसलों को प्रधानमंत्री की स्वीकृति और विश्वास से जुड़ा माना जाता है।
PMO और गृह मंत्रालय में टकराव नहीं
वाजपेयी काल में प्रधानमंत्री कार्यालय और नॉर्थ ब्लॉक के बीच दूरी की चर्चा होती थी, जबकि आज प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय के बीच किसी प्रकार की अनबन दिखाई नहीं देती। मोदी और शाह की कार्यशैली में समन्वय सत्ता की सबसे बड़ी ताकत है।
दोनों नेता गुजरात से आते हैं और राज्य की राजनीति में भी शाह, मोदी के विश्वस्त सहयोगी रहे हैं। यही संबंध दिल्ली की सत्ता में भी जारी है। इसलिए अमित शाह को अलग पद देकर शक्ति दिखाने की आवश्यकता मौजूदा संरचना में नहीं दिखती।
अमित शाह को पद नहीं, प्रभाव पर्याप्त है
आडवाणी को यह दिखाना जरूरी था कि वे भाजपा में नंबर दो हैं, लेकिन अमित शाह के सामने ऐसी कोई हड़बड़ी नहीं है। वे बिना उपप्रधानमंत्री बने भी सत्ता और संगठन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हैं। उनका प्रभाव पदनाम से स्वतंत्र है।
अगर शाह को औपचारिक रूप से डिप्टी पीएम बनाया जाता है, तो भाजपा के भीतर अनावश्यक गुटबाजी शुरू हो सकती है। ऐसी स्थिति में पार्टी नेतृत्व किसी नए सत्ता संकेत से बचना चाहेगा। भाजपा सामान्यतः ऐसे कदम फूंक फूंककर उठाती है।
2029 और 2034 की राजनीतिक गणना
भाजपा के कई नेता यह स्पष्ट कर चुके हैं कि 2029 का चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। इस आधार पर सत्ता नेतृत्व में फिलहाल कोई रिक्ति नहीं मानी जा रही। 2034 तक की चर्चा भी अभी बहुत दूर की राजनीतिक गणना है।
2034 आने में अभी आठ वर्ष बाकी हैं। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कोई बड़ी गिरावट दिखाई नहीं देती, जबकि वाजपेयी के समय लोकप्रियता का स्तर धीरे धीरे कमजोर पड़ता जा रहा था। 2004 के चुनाव परिणाम में यह असर साफ दिखा था।
गठबंधन राजनीति तब और अब
लालकृष्ण आडवाणी के दौर में भाजपा गठबंधन सहयोगियों पर अधिक निर्भर थी। वाजपेयी सरकार को कई राजनीतिक संतुलनों के साथ चलना पड़ता था। उस समय सहयोगी दलों, संघ परिवार और भाजपा के अंदरूनी समीकरणों को साथ साधना बड़ी जरूरत थी।
अमित शाह के दौर की भाजपा पूर्ण बहुमत वाली पार्टी के रूप में खड़ी है। 2024 में पार्टी को कुछ झटके जरूर लगे, लेकिन तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना उबाठे में टूट जैसी स्थितियों के बाद भाजपा को फिर लगभग बहुमत के आसपास माना जा रहा है।
फेरबदल संभव, लेकिन शाह की भूमिका वही रहेगी
मंत्रिमंडल फेरबदल तय माना जा रहा है, लेकिन अमित शाह की भूमिका में बड़ा बदलाव होने की संभावना कम है। वे सरकार और संगठन दोनों में अपने मौजूदा किरदार में ही प्रभावशाली बने रहेंगे। भाजपा नेतृत्व इस समय उत्तराधिकार की जल्दी में नहीं है।
सार यही है कि आडवाणी मॉडल को अमित शाह पर लागू करना राजनीतिक रूप से सतही तुलना है। आडवाणी को पद देकर संदेश देना जरूरी था, जबकि अमित शाह बिना किसी अतिरिक्त पद के भी सत्ता संरचना में वही स्थान रखते हैं, जो वास्तव में निर्णायक है।

