उत्तराखंड: सरकार 52 करोड़ खर्च कर मिटा रही अपनी ही गलती, 600 मेगावाट का लोहारीनाग पाला प्रोजेक्ट इतिहास के पन्नों में दर्ज
उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में एक दुर्लभ और युगांतकारी घटना घट रही है, जो भारत के पर्यावरणीय इतिहास में एक नजीर बनकर उभरी है। विकास की अंधी दौड़ में जिस भागीरथी (गंगा) को बांधकर बिजली बनाने के लिए सरकार ने पहाड़ों का सीना चीरकर 14 किलोमीटर लंबी विशालकाय सुरंगें बना दी थीं, आज उन्हीं सुरंगों को हमेशा-हमेशा के लिए बंद करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह देश का संभवतः पहला ऐसा मामला है, जब नदी की ‘अविरलता’ और ‘निर्मलता’ को बचाने के लिए करीब 2000 करोड़ रुपये की परियोजना को न केवल रद्द किया गया, बल्कि उसके बने-बनाए ढांचे को भी 52 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करके मिटाया जा रहा है।
उत्तरकाशी में भागीरथी नदी पर स्थित लोहारीनाग पाला जलविद्युत परियोजना की सुरंगों को भरने का काम सोमवार से युद्धस्तर पर शुरू हो चुका है। कंक्रीट और लोहे के इस ढांचे के ध्वस्त होने के पीछे एक वैज्ञानिक संत की तपस्या, 111 दिनों का उपवास और अंततः प्राणों का उत्सर्ग है। वे थे—प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद।
सुरंगों को ‘कब्र’ बनाने की प्रक्रिया युद्धस्तर पर शुरू
गंगा की अविरल धारा को सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने लोहारीनाग पाला प्रोजेक्ट की सुरंगों को स्थायी रूप से सील करने का अंतिम निर्णय ले लिया है। इसके लिए 52 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया गया है। यह कोई सामान्य भराई का काम नहीं है, बल्कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के वैज्ञानिकों की कड़ी निगरानी में यह कार्य किया जा रहा है।
प्रक्रिया के तहत सबसे पहले सुरंगों के भीतर जमा पानी और गाद (मलबा) को मशीनों से बाहर निकाला जा रहा है। इसके बाद, विशेष मिट्टी और मलबे का उपयोग करके इन 14 किलोमीटर लंबी सुरंगों को पूरी तरह से पाट दिया जाएगा (Backfilling)। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में कभी भी इन सुरंगों का उपयोग नदी को मोड़ने के लिए न किया जा सके। केवल सुरंगें ही नहीं, प्रोजेक्ट से जुड़ी अन्य सभी संरचनाओं को भी चरणबद्ध तरीके से हटाने की योजना है।
650 करोड़ पानी में बहे, 60 फीसदी काम हो चुका था पूरा
लोहारीनाग पाला उत्तराखंड की सबसे महत्वाकांक्षी ‘रन ऑफ द रिवर’ जलविद्युत योजनाओं में से एक थी। साल 2006 में एनटीपीसी (NTPC) ने भागीरथी नदी पर 600 मेगावाट क्षमता वाली इस परियोजना का काम शुरू किया था, जिसकी अनुमानित लागत करीब 2000 करोड़ रुपये थी। जब इस परियोजना को रोकने का आदेश आया, तब तक इसका लगभग 60 प्रतिशत काम पूरा हो चुका था और सरकार के 650 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे। योजना यह थी कि नदी के पानी को सुरंगों के जरिए मोड़कर टर्बाइनों पर गिराया जाएगा।
2008-09 के दौरान गंगा घाटी में इस प्रोजेक्ट का विरोध तेज हो गया। धराली आपदा के दौरान जब सड़क बह गई और नदी के बीच बने ‘डायवर्जन’ को नुकसान पहुँचा, तो सरकार को समझ में आने लगा कि हिमालय का यह क्षेत्र इतनी बड़ी छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं कर सकता। भारी जनविरोध और पर्यावरणीय खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2010 में इसे रद्द कर दिया। यह उन दुर्लभ मामलों में से है, जब ‘पर्यावरणीय जोखिम’ को ‘आर्थिक नुकसान’ के ऊपर तरजीह दी गई।
स्वामी सानंद: वह वैज्ञानिक संत जिसने विज्ञान और अध्यात्म से जीती लड़ाई
इस परियोजना के बंद होने और सुरंगों के भरे जाने का श्रेय निर्विवाद रूप से प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) को जाता है। राजेंद्र सिंह (जल पुरुष) बताते हैं कि स्वामी सानंद उन बिरले लोगों में से थे जिन्होंने गंगा को जीवित रखने के लिए विज्ञान और आध्यात्म दोनों का एक साथ संधान किया था। आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के पहले सदस्य-सचिव रहे स्वामी सानंद पर्यावरणीय प्रवाह (Environmental Flow) की समझ रखने वाले देश के सबसे बड़े विशेषज्ञ थे।
जुलाई 2007 में स्वामी सानंद अपने मित्र और प्रसिद्ध पर्यावरण वकील महेश चंद्र मेहता के साथ गंगोत्री जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि लोहारीनाग पाला परियोजना के कारण गंगा का पानी सुरंगों में कैद हो रहा है और नदी का पाट सूखा पड़ा है। गंगा को गायब होते देख वे अत्यंत दुखी हुए और उसी क्षण संकल्प लिया कि वे गंगा की ‘सघन चिकित्सा’ करेंगे।
‘सरकार गंगा माई से भी कमाई करना चाहती है’
राजेंद्र सिंह के मुताबिक, 2007 से पहले स्वामी सानंद मानते थे कि बड़े बांधों के विकल्प के रूप में छोटे बांध बनाए जा सकते हैं। लेकिन गंगा की दुर्दशा देखकर उन्होंने कहा, “प्रायश्चित के लिए 20 वर्ष बहुत हैं। अब मैं बड़े बाँधों को तुड़वाने, रुकवाने व आगे नहीं बनने देने के काम में लगूँगा। सरकार गंगा माई से भी कमाई करना चाहती है। मैं सबसे पहले गंगा से कमाई के सभी रास्ते बंद करूँगा।”
स्वामी सानंद का स्पष्ट मानना था कि सरकारें, चाहे वे किसी भी दल की हों, विज्ञान और संवेदना की भाषा नहीं, बल्कि केवल मुनाफे की भाषा समझती हैं। उन्होंने हरिद्वार के मातृसदन में अपना ‘चिमटा’ गाड़ दिया और गंगा की अविरलता के लिए ऐतिहासिक अनशन शुरू किया। 111 दिनों तक अन्न-जल का त्याग करने के बाद, अपनी मांगों पर अडिग रहते हुए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। उनके इस बलिदान ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। उनके तर्क ही थे जिन्होंने लोहारीनाग पाला जैसी विशालकाय परियोजना को ठंडे बस्ते के हवाले करवा दिया था।
सुरंगें बंद हुईं, लेकिन ‘गंगा एक्ट’ का सपना अब भी अधूरा
सुरंगों का भरा जाना स्वामी सानंद की एक बड़ी जीत है, लेकिन उनकी लड़ाई अभी भी अधूरी है। वे केवल प्रोजेक्ट बंद नहीं करवाना चाहते थे, बल्कि गंगा के लिए एक सशक्त कानून चाहते थे। स्वामी सानंद ने 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और 2014 में उमा भारती को ‘गंगा संरक्षण प्रबंधन अधिनियम’ (Ganga Act) का प्रारूप सौंपा था। नितिन गडकरी ने भी कानून बनाने का लिखित वायदा किया था, लेकिन 9 साल बीत जाने के बाद भी यह कानून ठंडे बस्ते में है।
स्वामी सानंद का कुम्भ मेले को लेकर भी क्रांतिकारी विचार था। उनका कहना था, “जो कुम्भ कभी सत्य की खोज के लिए शुरू हुआ था, वही कुम्भ अब गंगा की पवित्रता और अविरलता पर विचार नहीं करके उसे और अधिक गंदा ही करता है। जब तक गंगा स्वस्थ न हो, कुम्भ पर रोक लग जानी चाहिए।”
आज जब लोहारीनाग पाला की सुरंगों में मलबा भरा जा रहा है, तो यह केवल एक इंजीनियरिंग गतिविधि नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि एक निहत्थे फकीर का संकल्प सरकारों की अरबों-खरबों की सत्ता को झुका सकता है। यद्यपि स्वामी सानंद अपनी माँ गंगा को पूर्णतः स्वस्थ और ‘गंगा संरक्षण कानून’ को लागू होते नहीं देख पाए, लेकिन उत्तरकाशी में भरी जा रही ये सुरंगें गवाह हैं कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। लोहारीनाग पाला का अंत, गंगा की अविरलता की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।

