UGC
लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। UGC के नए नियमों के विरोध में पार्टी के 11 पदाधिकारियों ने एक साथ अपने पदों से इस्तीफा देकर राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
UGC के नए नियमों को लेकर गहराता विरोध
UGC द्वारा लागू किए गए नए नियमों को लेकर आपत्तियां सामने आ रही थीं। पदाधिकारियों का कहना है कि इन प्रावधानों से शिक्षा व्यवस्था में असमानता बढ़ेगी और परंपरागत सामाजिक संतुलन प्रभावित होगा। विरोध का स्वर अब औपचारिक इस्तीफों के रूप में सामने आया है।
सामूहिक इस्तीफा देने वाले 11 पदाधिकारी

UGC के नए नियमों के विरोध में लखनऊ में भाजपा संगठन से जुड़े कुल 11 पदाधिकारियों के एक साथ इस्तीफे की सूची सामने आई है। इस सूची में मंडल, युवा मोर्चा, शक्ति केंद्र और बूथ स्तर तक के पदाधिकारी शामिल हैं। नीचे नाम और पद क्रमवार दिए जा रहे हैं।
- अंकित तिवारी मंडल महामंत्री
- आलोक सिंह मंडल उपाध्यक्ष
- महावीर सिंह मंडल मंत्री
- मोहित मिश्रा शक्ति केंद्र संयोजक
- वीर प्रताप सिंह शक्ति केंद्र संयोजक
- नीरज पाण्डेय शक्ति केंद्र संयोजक
- अनुप सिंह युवा मोर्चा मंडल अध्यक्ष
- राज विक्रम सिंह युवा मोर्चा मंडल महामंत्री
- अभिषेक अवस्थी पूर्व मंडल मंत्री
- विवेक सिंह बूथ अध्यक्ष
- कमल सिंह पूर्व सेक्टर संयोजक
सवर्ण समाज के बच्चों के भविष्य पर चिंता
इस्तीफा देने वाले पदाधिकारियों ने शिक्षा से जुड़े इन नियमों को सवर्ण समाज के बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कहा है।
उनका कहना है कि इन बदलावों से अवसरों में कटौती होगी और योग्य विद्यार्थियों के साथ अन्याय होगा। इसी आशंका ने विरोध को निर्णायक मोड़ दिया।
संगठन के भीतर असंतोष का खुला इजहार
सामूहिक इस्तीफों ने यह संकेत दिया है कि संगठन के भीतर असंतोष केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है, कई पदाधिकारियों का एक साथ आगे आना दर्शाता है कि मुद्दा अब तेजी से आग पकड़ रहा है।
नेतृत्व तक संदेश पहुंचाने की कोशिश
इस्तीफों को केवल त्यागपत्र नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। पदाधिकारियों ने संगठन और नीति निर्धारकों का ध्यान शिक्षा से जुड़े फैसलों की सामाजिक परिणति पर केंद्रित करने का प्रयास किया है। यह कदम दबाव की रणनीति के रूप में उभरा है।
सियासी समीकरणों पर संभावित असर
इस घटनाक्रम का असर स्थानीय राजनीति और संगठनात्मक संतुलन पर पड़ सकता है। संगठन के सामने आंतरिक संवाद और क्षति नियंत्रण की चुनौती खड़ी हो गई है।
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि इस्तीफों के बाद संगठन किस दिशा में कदम उठाता है।
शिक्षा नीति से जुड़े मुद्दों पर पुनर्विचार की मांग तेज हो सकती है। लखनऊ की राजनीति में यह घटनाक्रम लंबे समय तक चर्चा का केंद्र बना रहेगा।

