Friday, June 5, 2026

त्रिभाषा फॉर्मूला क्या है? ऐसे करेगा देश की एकता मज़बूत !

त्रिभाषा फॉर्मूला

नयी पीढ़ी को विविधता में एकता की सीख देने का प्रयास

विविधता में एकता भारत की सांस्कृतिक पहचान रही है। इसी भावना को नयी पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने के लिए त्रिभाषा फॉर्मूला एक महत्वपूर्ण माध्यम माना जा रहा है। लंबे अंतराल के बाद आयी नयी शिक्षा नीति 2020 ने फिर इस फॉर्मूले को अपनाने पर जोर दिया है।

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड एक जुलाई से शुरू हो रहे नये सत्र में कक्षा नौवीं से बारहवीं तक त्रिभाषा फॉर्मूला लागू करने जा रहा है। इस निर्णय को देश की भाषायी एकता और बहुभाषिकता को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

सीबीएसई के निर्णय का विरोध और अदालत तक पहुंचा मामला

अतीत की तरह इस बार भी त्रिभाषा फॉर्मूले को लागू करने के निर्णय का विरोध शुरू हो गया है। शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों के एक समूह ने सीबीएसई के इस फैसले को मनमाना बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है।

विरोध करने वाले समूह का कहना है कि इस निर्णय से छात्रों, अध्यापकों और स्कूलों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय पर रोक नहीं लगायी है, लेकिन केंद्र सरकार और सीबीएसई को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

दौलत सिंह कोठारी ने दिया था त्रिभाषा फॉर्मूला

त्रिभाषा फॉर्मूला सबसे पहले कोठारी आयोग के प्रमुख दौलत सिंह कोठारी ने दिया था। कोठारी कोई सामान्य शिक्षाविद नहीं थे। वे रक्षा अनुसंधान एवं अध्ययन संगठन यानी डीआरडीओ के संस्थापक थे और महान ब्रिटिश वैज्ञानिक लॉर्ड रदरफोर्ड के शिष्य रहे थे।

कोठारी का मानना था कि भारत की राष्ट्रीय एकता को और मजबूत बनाने में त्रिभाषा फॉर्मूला अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। उनके अनुसार, भाषा केवल पढ़ाई का विषय नहीं, बल्कि भारतीय समाज को जोड़ने वाला सांस्कृतिक सूत्र भी है।

मातृभाषा, हिंदी और अंग्रेजी के संतुलन का प्रस्ताव

कोठारी आयोग ने छात्रों को पहली भाषा के रूप में मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा पढ़ाने का सुझाव दिया था। दूसरी भाषा के रूप में हिंदीभाषी क्षेत्रों में अंग्रेजी या कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा और गैर हिंदीभाषी क्षेत्रों में हिंदी या अंग्रेजी पढ़ाने की सलाह दी गई थी।

तीसरी भाषा के रूप में आयोग ने अंग्रेजी या कोई अन्य भारतीय भाषा पढ़ाने का प्रावधान सुझाया था, जो पहली या दूसरी भाषा के रूप में शामिल न हो। इस व्यवस्था का उद्देश्य छात्रों को व्यापक भारतीय भाषायी संसार से जोड़ना था।

पहली शिक्षा नीति से नयी शिक्षा नीति तक जारी रहा फॉर्मूला

जब यह फॉर्मूला सामने आया, तब देश को आजादी मिले अधिक समय नहीं हुआ था। हालांकि तमिलनाडु में हिंदी को लेकर विरोध जारी था, फिर भी देश के बड़े हिस्से ने त्रिभाषा फॉर्मूले को स्वीकार कर लिया और इसे उपयोगी माना।

वर्ष 1968 में आयी पहली शिक्षा नीति में त्रिभाषा फॉर्मूले को लगभग शब्दशः अपनाया गया। इसके बाद वर्ष 1986 में आयी नयी शिक्षा नीति में भी इस फॉर्मूले को जारी रखा गया और इसे भारतीय शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग माना गया।

तमिलनाडु सहित कुछ राज्यों ने नहीं अपनाया फॉर्मूला

त्रिभाषा फॉर्मूले को हिंदीभाषी क्षेत्रों में अपनाया गया, लेकिन तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों ने इसे स्वीकार नहीं किया। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में इसे स्थानीय भाषा और सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़कर देखा गया, जिससे इसका राजनीतिक विरोध लगातार बना रहा।

वर्ष 2020 में आयी नयी शिक्षा नीति ने भी त्रिभाषा फॉर्मूले को अपनाया। इसके बाद तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन और कर्नाटक की राजनीति के एक हिस्से ने इसे स्थानीय संस्कृति और भाषा की अस्मिता पर चोट बताना शुरू किया।

सीबीएसई का आदेश नयी शिक्षा नीति का कार्यान्वयन

सीबीएसई के नये आदेश को नयी शिक्षा नीति 2020 का कार्यान्वयन माना जा सकता है। इसके तहत पहली जुलाई से नौवीं कक्षा में तीन भाषाएं पढ़ाई जाएंगी। इन तीन भाषाओं में दो भारतीय भाषाओं का होना अनिवार्य रहेगा।

आदेश के अनुसार, यदि पहली भाषा अंग्रेजी है, तो दूसरी भाषा हिंदी या स्थानीय क्षेत्र विशेष की मातृभाषा होगी। तीसरी भाषा के रूप में विद्यार्थी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किसी भी भाषा का चयन कर सकेंगे।

बहुभाषिकता को बढ़ावा देने का उद्देश्य

इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य देश में बहुभाषिकता को बढ़ावा देना है। नयी शिक्षा नीति के तहत त्रिभाषा फॉर्मूला राज्यों में भी लागू किया जाना है। इसके माध्यम से विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा के साथ अन्य भारतीय भाषाओं से भी परिचित कराने की योजना है।

कुछ राज्यों ने इस दिशा में कदम भी उठाये। महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने त्रिभाषा नीति को लागू करने की कोशिश की, लेकिन स्थानीय अस्मिता के नाम पर विरोध करने वाले समूहों के दबाव के कारण इस नीति में ढिलाई देनी पड़ी।

दक्षिणी राज्यों की आपत्ति का मूल आधार

त्रिभाषा फॉर्मूले के विरोध में दक्षिण भारत के राज्यों की एक बड़ी आपत्ति यह रही है कि उत्तर भारत के राज्यों ने दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने में अपेक्षित रुचि नहीं दिखाई। उनके अनुसार, हिंदीभाषी क्षेत्रों ने फॉर्मूला तो अपनाया, लेकिन भावना अधूरी रही।

उत्तर भारत के कई राज्यों ने तीसरी भाषा के रूप में किसी अन्य भारतीय भाषा के स्थान पर संस्कृत को प्राथमिकता दी। दक्षिणी राज्यों का आरोप रहा कि इससे भारतीय भाषाओं, विशेषकर दक्षिण भारतीय भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था में पर्याप्त स्थान नहीं मिला।

सीबीएसई के नये आदेश में पुरानी गुंजाइश नहीं

सीबीएसई के नये आदेश में ऐसी स्थिति की गुंजाइश सीमित कर दी गई है। इसमें दो भारतीय भाषाओं की अनिवार्यता रखी गई है, जिससे विद्यार्थियों को भारतीय भाषायी विविधता से जोड़ने की संभावना बढ़ती है और त्रिभाषा फॉर्मूले का मूल उद्देश्य अधिक स्पष्ट होता है।

छात्रों पर दबाव बढ़ने का तर्क भी कमजोर माना जा रहा है। महानगरों के अधिकतर पब्लिक स्कूलों में ग्यारहवीं और बारहवीं में हिंदी पढ़ने पढ़ाने का विकल्प ही नहीं है, जबकि उन्हीं संस्थानों में विदेशी भाषाएं पढ़ाने की व्यवस्था उपलब्ध रहती है।

उत्तर भारत के विद्यालयों की जिम्मेदारी

सीबीएसई के नये आदेश के संदर्भ में उत्तर भारत के विद्यालयों के सामने एक महत्वपूर्ण अवसर है। उन्हें अपने यहां तीसरी भाषा के रूप में दक्षिण भारतीय भाषाओं को पढ़ने और पढ़ाने का विकल्प विकसित करने की गंभीर कोशिश करनी चाहिए।

यदि उत्तर भारत के विद्यालय दक्षिण की भाषाओं को स्थान देते हैं, तो गैर हिंदीभाषी राजनीति को यह कहने का अवसर नहीं मिलेगा कि हिंदीभाषी समाज में उनकी भाषाओं के प्रति सम्मान या आत्मीयता का अभाव है।

भाषाएं केवल संचार का माध्यम नहीं

मानवशास्त्री और समाज विज्ञानी मानते हैं कि किसी भी बहुरंगी संस्कृति को जोड़ने वाले तंतुओं में भाषाओं का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। भाषा केवल किसी स्थान या क्षेत्र विशेष में संवाद का साधन नहीं होती, बल्कि सभ्यता की स्मृति भी होती है।

हर भाषा अपने भीतर समाज की ऐतिहासिक यात्रा, सांस्कृतिक अनुभव, लोक परंपरा और भाव जगत को समेटे रहती है। इसी कारण भारत जैसे बहुलवादी देश में भाषाओं की भूमिका केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय भी है।

आधुनिक शिक्षा से पहले भाषाओं ने ही भारत को जोड़ा

भारत में जब आधुनिक शिक्षा व्यवस्था नहीं थी, तब विभिन्न भारतीय भाषाएं ही समाजों को जोड़ने का काम करती थीं। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक संवाद, ज्ञान, परंपरा और सांस्कृतिक संबंधों को जीवित रखने में भाषाओं की बड़ी भूमिका थी।

विद्वानों के बीच भौगोलिक दूरी होने के बावजूद संस्कृत संचार का एक प्रमुख माध्यम रही। इसके साथ ही अन्य भारतीय भाषाएं भी ज्ञान, परंपरा और सामाजिक संपर्क के स्तर पर गंभीर भूमिका निभाती रही हैं।

आधुनिक भारत में भाषायी सेतु बन सकता है त्रिभाषा फॉर्मूला

त्रिभाषा फॉर्मूले के माध्यम से पढ़कर निकलने वाले विद्यार्थी भविष्य में उसी ऐतिहासिक भूमिका को आधुनिक रूप में आगे बढ़ा सकते हैं। यह व्यवस्था उन्हें केवल एक अतिरिक्त भाषा नहीं देगी, बल्कि भारत की व्यापक सांस्कृतिक चेतना से भी जोड़ेगी।

यदि इस नीति को राजनीतिक आशंकाओं से ऊपर उठकर लागू किया जाता है, तो यह भारत की एकता को मजबूत करने वाला बड़ा कदम सिद्ध हो सकता है। बहुभाषी विद्यार्थी भविष्य में क्षेत्रीय दूरी घटाने और सांस्कृतिक संवाद बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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