सुप्रीम कोर्ट
नशीले पदार्थों की आपूर्ति को राष्ट्र के खिलाफ गंभीर चुनौती माना
सुप्रीम कोर्ट ने एनडीपीएस से जुड़े एक गंभीर मामले में स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है। अदालत ने कहा कि जब देश की संप्रभुता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच टकराव हो, तो ऐसे मामलों में राष्ट्रहित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
अदालत ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें आरोपी पर जेल के भीतर से हेरोइन तस्करी नेटवर्क चलाने का आरोप है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि नशीले पदार्थों की आपूर्ति देश की अर्थव्यवस्था, जनस्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर गंभीर असर डालती है।
पंजाब और हरियाणा सरकार की अपील स्वीकार
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने पंजाब और हरियाणा सरकारों की अपील स्वीकार करते हुए आरोपी बलराज सिंह को मिली जमानत रद्द कर दी। यह जमानत पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने दी थी।
बलराज सिंह को जनवरी 2024 में एनडीपीएस अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ आरोप है कि वह गोइंदवाल साहिब स्थित केंद्रीय जेल में बंद रहते हुए मोबाइल फोन के जरिये मादक पदार्थों की तस्करी का नेटवर्क संचालित कर रहा था।
जेल से हेरोइन सप्लाई कराने का आरोप
मामले के अनुसार, बलराज सिंह ने जेल में रहते हुए दो सह आरोपियों को कुछ लोगों तक 1.465 किलोग्राम हेरोइन पहुँचाने के निर्देश दिए थे। जांच में यह आरोप सामने आया कि पूरा नेटवर्क जेल के अंदर से मोबाइल फोन के इस्तेमाल से चलाया जा रहा था।
पंजाब सरकार ने हाई कोर्ट के 15 अक्टूबर 2025 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें बलराज सिंह को जमानत दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को सही नहीं माना और कहा कि ऐसे मामलों में कठोर कानूनी कसौटी लागू होनी चाहिए।
धारा 37 की दो शर्तों पर अदालत ने दिया जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि व्यावसायिक मात्रा से जुड़े एनडीपीएस मामलों में जमानत देते समय एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के तहत निर्धारित दो शर्तों की अनिवार्य रूप से जांच की जानी चाहिए। इन शर्तों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पहली शर्त यह है कि लोक अभियोजक को जमानत आवेदन पर सुनवाई का अवसर दिया जाए। दूसरी शर्त यह है कि अदालत को यह संतुष्टि होनी चाहिए कि आरोपी प्रथम दृष्टया दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए अपराध दोहराने की संभावना नहीं है।
गंभीर अपराधों में सामान्य जमानत सिद्धांत पर्याप्त नहीं
अदालत ने स्पष्ट किया कि एनडीपीएस मामलों में कठोर जमानत प्रावधान सामान्य आपराधिक प्रक्रिया की सीमाओं के अतिरिक्त लागू होते हैं। गंभीर अपराधों में केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आधार पर जमानत देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि आरोपी के विरुद्ध इसी प्रकृति के अपराधों से जुड़े पूर्व मामले भी मौजूद हैं। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि वह जमानत पर बाहर आने के बाद वैसा अपराध दोबारा नहीं करेगा।
पुराने फैसलों का हवाला देते हुए जमानत रद्द
पीठ ने लालरिंतलुआंगा साइलो और स्टेट बाय द इंस्पेक्टर ऑफ पुलिस बनाम बी रामू जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों को ध्यान में रखा। इन फैसलों में व्यावसायिक मात्रा वाले मादक पदार्थ अपराधों में धारा 37 की कसौटी को आवश्यक बताया गया था।
अदालत ने कहा कि इस मामले को धारा 37 की दो कठोर शर्तों के आधार पर देखने पर आरोपी के पक्ष में जमानत का कोई मामला नहीं बनता। इसी आधार पर हाई कोर्ट का आदेश पलटते हुए जमानत रद्द कर दी गई।
लंबी जेल अवधि पर जमानत का प्रश्न बड़ी पीठ के सामने
सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर अपराधों में लंबी जेल अवधि के आधार पर जमानत देने के प्रश्न का भी उल्लेख किया। यूएपीए, एनडीपीएस, टाडा और पोटा जैसे मामलों में इस मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेजा गया है।
यह प्रश्न हाल में दिल्ली दंगों से जुड़े उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत अस्वीकृति पर उठे विवाद के बाद व्यापक चर्चा में आया था। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में संतुलन अलग कसौटी पर तय होगा।
संप्रभुता और स्वतंत्रता में टकराव हो तो राष्ट्रहित ऊपर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि देश की संप्रभुता और व्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संघर्ष की स्थिति बने, तो निस्संदेह संप्रभुता को प्राथमिकता दी जाएगी। खासकर तब, जब राष्ट्र के खिलाफ युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो रही हो।
अदालत ने माना कि नशीले पदार्थों की आपूर्ति भी राष्ट्र के खिलाफ गंभीर आघात का रूप ले सकती है। इसका असर केवल अपराध तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य और समाज की सुरक्षा को भी प्रभावित करता है।

