जातिसूचक शब्द बोलने पर कार्रवाई नहीं: यह मामला बिहार का है , जहां केशव महतो पर आंगनबाड़ी केंद्र में एक व्यक्ति को गाली देने का आरोप लगा था।
फिर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहाँ कोर्ट ने ध्यान दिया की गाली जाति के आधार पर दी गयी थी या नहीं यह अभी साफ़ नहीं है।
इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ चल रहा आपराधिक मामला रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपना साफ़ फैसला सुनाया है की है की भारत में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए इस कानूनों को बनाया गया था।
कोर्ट ने एससी एसटी एक्ट की धारा 3(1) के प्रावधानों को दोहराते हुए कहा कि किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को गाली दी जाती है, तो सिर्फ गाली देने से ही SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं बन जाता।
इसके लिए यह साफ होना जरूरी है कि गाली उस व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने के इरादे से दी गई हो।
केशव महतो को ट्रायल कोर्ट से समन मिला था, जिसे पटना हाई कोर्ट ने फरवरी 2025 में बरकरार रखा। इसके बाद महतो सुप्रीम कोर्ट पहुँचे।
शीर्ष अदालत ने कहा कि FIR में कहीं भी यह नहीं लिखा था कि गाली जाति के आधार पर दी गई, इसलिए SC/ST एक्ट के तहत केस चलाना सही नहीं था।
यह कानून तभी लागू होगा जब अपशब्दों में जातिगत नाम का प्रयोग सार्वजनिक रूप से किया गया हो और उसका इरादा अपमानजनक हो।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा,
कि न तो एफआईआर और न ही आरोप पत्र में कहीं यह आरोप है कि अपीलकर्ता ने शिकायतकर्ता को उसकी जाति के कारण अपमानित किया या धमकाया।
कब बनता है SC/ST एक्ट का मामला?
जातिसूचक शब्द बोलने पर कार्रवाई नहीं: संविधान के बावजूद SC/ST वर्गों को समान अधिकार नहीं मिल पाए और उन्हें लगातार अपमान व अत्याचार सहने पड़े।
जब वे आवाज उठाते, तो प्रभावशाली लोग उन्हें प्रताड़ित करते थे। इसी अन्याय को रोकने के लिए 1990 में SC-ST एक्ट लागू किया गया, जिसे हरिजन एक्ट भी कहा जाता है।
SC / ST एक्ट , यह एक्ट उस व्यक्ति पर लागू होता है जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग के व्यक्ति के साथ जाति के आधार पर भेदभाव, अपमान, हिंसा या अत्याचार करता है।
SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 इन वर्गों को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने के लिए अस्तित्व में आया।
हाईकोर्ट ने क्यों किया हस्तक्षेप से इंकार
पटना हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए यह अपील दायर की गयी थी जिसमे हाई कोर्ट ने समन देने से इंकार किया था।
आरोप IPC की कई धाराओं और SC/ST एक्ट के तहत लगाए गए थे। यह शिकायत जातिसूचक अपमान से जुड़ी थी।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि शिकायत में स्पष्ट और ठोस आरोपों का अभाव है। इसी वजह से हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप से इंकार किया था।
HC का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने पलटा
जातिसूचक शब्द बोलने पर कार्रवाई नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने कहा की अपीलकर्ता ने किसी जाति विशेष के कारण कोई गलत काम नहीं किया।
शिकायत में जो बातें लिखी थी वे क़ानून के हिसाब से अपराध साबित नहीं होती, इसलिए कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और अपीलकर्ता को पूरी तरह क्लीन चीट दे दी।

