Monday, June 8, 2026

सुप्रीम कोर्ट स्वदेशी न्यायशास्त्र विकसित कर रहा है: ऑक्सफोर्ड में CJI सूर्यकांत

सुप्रीम कोर्ट CJI : आयातित अवधारणाओं पर निर्भरता पर्याप्त नहीं

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा है कि भारतीय सुप्रीम कोर्ट ऐसी “स्वदेशी न्यायशास्त्र” की दिशा में काम कर रहा है, जो भारत के संवैधानिक मूल्यों, संस्थागत वास्तविकताओं, भाषाई विविधता और सामाजिक परिस्थितियों से जुड़ा हो। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को केवल आयातित तकनीकी मॉडल या विदेशी अवधारणाओं पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने यह बात ऑक्सफोर्ड यूनियन और ऑक्सफोर्ड लॉ सोसाइटी में दिए गए अपने व्याख्यान के दौरान कही। उनके व्याख्यान का विषय था— “Constitutional Promise to Digital Reality: Safeguarding Justice in the Age of AI and Technological Advancement.”

तकनीक न्यायिक विवेक का विकल्प नहीं, सहायक है: CJI

CJI सूर्यकांत ने कहा कि भारत का सुप्रीम कोर्ट तकनीक को मानव तर्क और स्वतंत्र न्यायिक विचार का विकल्प नहीं मानता, बल्कि इसे न्यायिक प्रक्रिया की सहायता करने वाले उपकरण के रूप में देखता है।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने तकनीक को लेकर सचेत दृष्टिकोण अपनाया है। तकनीक का उद्देश्य न्यायिक सोच को प्रतिस्थापित करना नहीं, बल्कि उसे अधिक सक्षम और प्रभावी बनाना है।

CJI ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका के लिए ऐसी स्वदेशी न्यायशास्त्रीय दृष्टि विकसित करना आवश्यक है, जो भारत की अपनी संवैधानिक संरचना, सामाजिक यथार्थ, भाषाई विविधता और संस्थागत आवश्यकताओं से संचालित हो।

भारतीय न्यायपालिका के लिए स्वदेशी AI इकोसिस्टम पर काम

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बताया कि भारतीय न्यायपालिका के लिए स्वदेशी AI इकोसिस्टम विकसित करने की दिशा में गंभीर प्रयास चल रहे हैं। इसमें भारतीय लार्ज लैंग्वेज मॉडल विकसित करने की पहल भी शामिल है।

उन्होंने कहा कि इस कार्य में सरकारी संस्थाएँ, शैक्षणिक संस्थान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विशेषज्ञ सहयोग कर रहे हैं। उद्देश्य यह है कि न्यायपालिका के लिए ऐसे समाधान तैयार किए जाएँ, जो भारत की अपनी संस्थागत आवश्यकताओं और संवैधानिक वास्तविकताओं के अनुरूप हों।

AI के लिए नियामक ढाँचा तैयार कर रहा सुप्रीम कोर्ट

CJI ने कहा कि न्यायपालिका में AI के उपयोग से जुड़े जोखिमों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट एक नियामक ढाँचे पर काम कर रहा है। इसका उद्देश्य एल्गोरिदमिक पक्षपात, जवाबदेही, पारदर्शिता और डाटा सुरक्षा जैसी चिंताओं को संबोधित करना है।

यह ढाँचा मानव निगरानी, संवैधानिक अनुपालन, निष्पक्षता, पारदर्शिता, व्याख्यात्मकता, जवाबदेही और डाटा सुरक्षा जैसे सिद्धांतों पर आधारित होगा।

AI प्रणालियों की समय-समय पर निगरानी और ऑडिट भी किया जाएगा, ताकि त्रुटियों, तकनीकी गड़बड़ियों और संभावित पक्षपात की पहचान की जा सके।

जिम्मेदार AI अपनाने के पक्ष में न्यायपालिका

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने जिम्मेदार AI अपनाने के पक्ष में दृष्टिकोण रखा है। तकनीक को अनावश्यक भय के साथ देखने की आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने कहा कि देशभर की अदालतों को यह देखना चाहिए कि AI उपकरणों का उपयोग कहाँ न्याय तक पहुँच बढ़ाने, मुकदमों में देरी कम करने और प्रशासनिक दक्षता सुधारने में किया जा सकता है।

वैश्विक न्यायिक संवाद का उद्देश्य एकरूपता नहीं: CJI

CJI सूर्यकांत ने कहा कि विश्वभर की न्यायिक संस्थाएँ अब अभूतपूर्व परस्पर संपर्क के दौर में प्रवेश कर रही हैं। उन्होंने फ्रांस, अर्जेंटीना, ब्राजील, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में AI आधारित न्यायिक पहलों का उल्लेख किया।

इन देशों में अदालतें केस मैनेजमेंट, दस्तावेज तैयार करने, कोर्टरूम ट्रांसक्रिप्शन और कानूनी शोध जैसे कार्यों में AI का उपयोग कर रही हैं।

हालाँकि, CJI ने चेतावनी दी कि वैश्विक संपर्क को न्यायिक एकरूपता नहीं समझा जाना चाहिए। अलग-अलग देशों की संवैधानिक पहचान, ऐतिहासिक अनुभव और सामाजिक परिस्थितियाँ अलग होती हैं।

स्थानीय इतिहास और संवैधानिक पहचान की रक्षा जरूरी

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संवाद का उद्देश्य किसी एक जैसे कानूनी ढाँचे का निर्माण करना नहीं है। इसका उद्देश्य विचारों का आदान-प्रदान है, लेकिन इसके साथ प्रत्येक देश की संवैधानिक पहचान और स्थानीय संदर्भों की रक्षा भी आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि न्यायिक संवाद सांस्कृतिक बारीकियों को समाप्त करने या एक समान कानूनी संस्कृति बनाने का माध्यम नहीं होना चाहिए।

इसी संदर्भ में उन्होंने डिजिटल युग के लिए “स्वदेशी न्यायशास्त्र” की अवधारणा को रेखांकित किया।

वर्चुअल सुनवाई ने न्याय तक पहुँच बढ़ाई

अपने संबोधन में CJI सूर्यकांत ने भारत की न्याय व्यवस्था में डिजिटल बदलावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान डिजिटल सुधारों की गति तेज हुई, लेकिन अब ये सुधार न्यायिक व्यवस्था की स्थायी विशेषता बन चुके हैं।

उन्होंने कहा कि वर्चुअल सुनवाई ने न्याय तक पहुँच को व्यापक किया है। इससे उन वादियों और वकीलों को भी संवैधानिक अदालतों में प्रभावी भागीदारी का अवसर मिला है, जो भौगोलिक दूरी के कारण पहले कठिनाई का सामना करते थे।

अनुच्छेद 14, 19 और 21 से जुड़ा डिजिटल न्याय

CJI ने डिजिटल न्यायिक सुधारों को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 से जोड़ा।

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 14 के तहत विधि के समक्ष समानता का सिद्धांत वर्चुअल सुनवाई के माध्यम से अधिक प्रभावी हुआ है। इससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक सुलभ और समान अवसर प्रदान करने वाली बनी है।

अनुच्छेद 19 के संदर्भ में उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की समझ अब न्याय को वास्तविक समय में देखने के अधिकार तक विस्तृत हो रही है।

अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को न्याय तक सार्थक पहुँच के अधिकार से जोड़ा गया है।

ई-कोर्ट्स, NJDG और वन केस वन डाटा पहल

मुख्य न्यायाधीश ने न्यायपालिका में लागू तकनीकी सुधारों का भी उल्लेख किया। उन्होंने ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट, नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड और हाल में शुरू की गई “वन केस वन डाटा” पहल को महत्वपूर्ण बताया।

“वन केस वन डाटा” पहल का उद्देश्य केस मैनेजमेंट सिस्टम को एकीकृत करना और न्यायिक रिकॉर्ड की पुनरावृत्ति को समाप्त करना है।

इन पहलों के माध्यम से न्यायिक प्रशासन को अधिक पारदर्शी, कुशल और तकनीक-सक्षम बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

तकनीक संवैधानिक मूल्यों की सेवक रहे, स्वामी नहीं

अपने संबोधन के अंत में CJI सूर्यकांत ने कहा कि तकनीक को संवैधानिक मूल्यों का सेवक बने रहना चाहिए, उनका स्वामी नहीं बनना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भविष्य ऐसा बनाया जाना चाहिए, जहाँ एल्गोरिदम समानता और न्याय के प्रकाश से निर्देशित हों। डिजिटल वास्तविकता वही होनी चाहिए, जो भारत को मिले संवैधानिक वादे के प्रति पूरी तरह निष्ठावान रहे।

यह कार्यक्रम ऑक्सफोर्ड लॉ सोसाइटी, ऑक्सफोर्ड यूनियन और एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड तन्वी दुबे के सहयोग से आयोजित किया गया था।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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