नेहरू सोमनाथ मंदिर विवाद पर सुधांशु त्रिवेदी की पूरी प्रेस कांफ्रेंस
मित्रों हम सभी जानते हैं कि भारत स्वतंत्रता के इस अमृतकाल में 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए बहुत सजगता के साथ सक्रियता के साथ आगे बढ़ रहा है। परंतु इसी के साथ यह विषय भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह किन विचारों के साथ किस स्वरूप में और किस दृष्टि के साथ आगे बढ़ रहा है। अथवा उस भारत की पहचान और स्वरूप क्या होगा?
इसका बहुत महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि माननीय प्रधानमंत्री जी ने कल ही यह घोषणा की थी कि एक वर्ष तक श्री सोमनाथ मंदिर के विध्वंस के 1000 वर्ष पूर्ण होने के बाद जो उसके गौरव की पुनर प्रतिष्ठा हुई थी उसके उत्सव के रूप में इसे मनाया जाएगा। यहां पर विषय मात्र एक मंदिर नहीं है। यहां पर विषय श्री नरेंद्र मोदी जी मात्र एक प्रधानमंत्री नहीं है।
और यहां पर विषय तमाम विरोधी दलों के द्वारा किया जा रहा व्यक्तिगत विरोध नहीं है। यहां पर विषय यह है कि भारत का स्वरूप और भारत की पहचान और विकसित होने के बाद भारत की पहचान क्या होगी? इस संदर्भ में मैंने आज कुछ विषय आप लोगों के संज्ञान में एक्स पर पोस्ट करके लाए थे। यहां पर मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू जी से हमारा कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं है।
जो विरोध है वह सैद्धांतिक और व्यवहारिक है। जैसे श्री नरेंद्र मोदी जी एक व्यक्ति नहीं है। एक अधिष्ठान है। उसी प्रकार जवाहरलाल नेहरू जी एक नेता नहीं है। बल्कि एक विचार के प्रतीक हैं। और वह विचार भारत के लिए कितना भयावह और खौफनाक था और उसके उस असली चेहरे के ऊपर कितना बड़ा पर्दा डाल के रखा गया था वो आज जानने की आवश्यकता है।
जैसा कि आप सब ने देखा होगा कि बहुत ही दुखद बात है कि अप्रैल 1951 में जवाहरलाल नेहरू जी पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं। और उल्लेखनीय बात यह भी है कि लियाकत अली जो पाकिस्तान के फर्स्ट प्राइम मिनिस्टर बने यह अंतरिम सरकार में यानी 1946 2 सितंबर को जब नेहरू जी प्रधानमंत्री बने थे तो उनके वित्त मंत्री थे और बजट उन्होंने प्रस्तुत किया था अंतरिम सरकार का।
और इस बात का उल्लेख प्रणव मुखर्जी जी ने अपनी 2009-10 की बजट स्पीच में भी किया है। उनके लिए लिखते हैं माय डियर नवाबजादे। यानी वह डियर भी हैं और नवाबजादे भी हैं। सम्मान से अभिभूत होकर वह यह कह रहे हैं कि मैं यह बात स्पष्ट करना चाहता हूं कि जो सोमनाथ का मंदिर में हो रहा है, वह बिल्कुल गलत है। उसको लेकर कोई प्रचार दुष्प्रचार नहीं करना चाहिए।
और इसके अलावा उसमें एक लाइन वो कह रहे हैं जो मैं आपके सामने रिपीट करना चाहता हूं। नाउ द स्टोरी ऑफ़ द गेट्स ऑफ सोमनाथ टेंपल बीइंग ब्रॉट बैक टू इंडिया फ्रॉम अफगानिस्तान इज कंप्लीटली फॉल्स एंड देयर इज नॉट एन एटम ऑफ ट्रुथ इन इट। तो साहब वो यह कहते हैं कि जब महाराजा रणजीत सिंह ने काबुल जीता था तो उन्होंने सबसे पहले सोमनाथ के उन दरवाजों को मांगा था कि वह कहां है। यह पूरी तरह फॉल्स है। देयर इज नॉट एन एटम ऑफ ट्रुथ इन इट।
अब मैं कोट करना चाहता हूं। खुद कांग्रेस सरकार के द्वारा आधिकारिक रूप से पब्लिश महाराजा रंजीत सिंह बाय एलएस बख्शी पेज नंबर 15 पब्लिश्ड बाय मिनिस्ट्री ऑफ इंफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग न्यू दिल्ली इन 1992। सरकार कह रही है कि रंजीत सिंह मेड नो डिस्टिंशन बिटवीन द हिंदू एंड सिक्स अमंग देयर सब्जेक्ट व्हेन द कंबाइंड फोर्सेस ऑफ ईस्ट इंडिया कंपनी एंड रंजीत सिंह डिफिटेड शाह सुजा इन काबुल।
आगे ध्यान दीजिएगा जब उन्होंने काबुल को कैप्चर किया। वन ऑफ द टर्म इंसर्टेड बाय रंजीत सिंह जी इन द ट्रीटी दैट फॉललोड वाज़ द डोर्स ऑफ सोमनाथ टेंबल प्लंटर्ड बाय महमूद गजनी शुड बी रिटर्न टू इंडिया। अब महाराजा रणजीत सिंह सही हैं या अपने जवाहरलाल नेहरू जो लियाकत अली की खिदमत में उनकी मिजाज कुर्सी में लगे हुए हैं वो सच बोल रहे हैं या भारत सरकार के द्वारा 1992 में इंफॉर्मेशन ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्ट्री के द्वारा पब्लिश्ड बात सत्य है।
यहां पर विषय यह नहीं है। यहां विषय यह है उसकी आज की प्रासंगिकता क्या है? यह भी आपको समझने की आवश्यकता है। फिर जो दूसरा उल्लेख है आपने देखा होगा उसमें के एम पिककर जो उस समय कम्युनिस्ट चाइना में कम्युनिस्ट मानसिकता के थे। चीन में हमारे राजदूत थे। उनको लेटर में लिखते हैं कि नहीं नहीं यह सब बिल्कुल गलत है।
अगर आप में से किसी ने जाकर किताबों में पढ़ा हो कि पिककर ने जो लेटर नेहरू जी को लिखा था उसमें यह भाव था कि भाई चेयरमैन माओ को कैसा लगेगा यह पता लग के गजब है साहब धर्म को अफीम मानने वाले माओवादियों के प्रति क्या अनुराग है और मुस्लिम लीग के प्रति कितना नजदीकी और अजीज मिजाज है और हिंदू मान बिंदुओं के ऊपर गिरती हुई गाज है।
और यह मानसिकता आज भी यथावत है जो प्रियंका गांधी जी ने कहा था ना कि एक बार जो कहना है कह लो भाई बार-बार क्यों कहते हो मजे की बात यह है खानदान तो लगातार है हमसे कहते हैं बार-बार क्यों है तो वहां बताना चाहता हूं जो मानसिकता उस समय थी वही मानसिकता आज दिख रही है मुस्लिम ली मानसिकता से प्यार क्योंकि गठबंधन है और माओवादी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से करार और सनातन हिंदू धर्म पर भीषण प्रहार जो तब था वही अब है। जो तब हो रहा था वही आज हो रहा है। इसलिए इसकी प्रासंगिकता और मानसिकता बहुत गंभीर है।
अब यहां पर मैं एक और बात कहना चाहूंगा। हो सकता है किसी को बहुत प्रॉब्लमेटिक लगे। सरदार पटेल को कोट करते हुए भारत के बहुत प्रख्यात पत्रकार दुर्गादास जी ने जिनकी बड़ी प्रसिद्ध किताब है इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू एंड देयर आफ्टर और उनको पद्म अवार्ड भी मिला। डाक टिकट भी उनके नाम पर जारी हुआ। पत्रकारिता में भारत के स्तंभों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने अपनी बुक इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू एंड देयर आफ्टर में पेज नंबर 240 पर लिखा है। पटेल सेड दैट ह प्रिंसिपल ए्जायटी वास टू सेव इंडिया फ्रॉम द केओस बाय काउंटरिंग एंग्लो मुस्लिम अग्रेशन एंड द अपोजिट डायरेक्शन मौलाना आजाद यह वो कह रहे हैं हम नहीं कह रहे हैं मौलाना आजाद इज मोर कंसर्न एंड वरीड अबाउट द मुस्लिम्स।
और आगे कोर्ट अनकोट में आई एम कोटिंग कर्जन टू नेहरू एंड देयर आफ्टर दुर्गादास कोटिंग सरदार पटेल जवाहरलाल लाल इज द ओनली नेशनलिस्ट मुस्लिम टुडे। पटेल एडेड दैट नेहरू वाज़ अनड्यूली अमेनेबल टू माउंटबेट्स इन्फ्लुएंस एज ऑलवेज लीन ऑन समवन ही वाज़ अंडर द बापूस प्रोटेक्टिव विंग्स एंड नाउ ही इज़ लीनिंग ऑन माउंटबेटेटन पेज नंबर 240 इंडिया फ्रॉम कर्ज़न टू नेहरू एंड देयर आफ्टर हम नहीं कह रहे।
अब चलिए ये तो किसी दूसरे ने कहा। नाउ आई एम कोटिंग अ बुक जिसमें नेहरू को कोट किया जा रहा है। द सोर्स इज स्टैनली वालपर्ट नेहरू अ ट्रिस्ट विद डेस्टिनी ऑक्सफोर्ड प्रेस 1996 जो कोट कर रहा है जॉन केनेथ गैलब्रथ जे के गैलब्रथ जो सबसे लंबे समय तक नेहरू जी के टाइम में भारत में अमेरिका के राजदूत रहे उससे वो कह रहे हैं कि नेहरू स्वयं कह रहे हैं गैलब्रथ आई एम द लास्ट इंग्लिश रूलर ऑफ इंडिया प्राइम मिनिस्टर जवाहरलाल नेहरू वेरीली टोल्ड अमेरिकन एंबेसडर।
मुझे लगता है कांग्रेस को इन सारी बातों को गंभीरता से लेना चाहिए था। उस समय आज तो दौर निकल गया। थोड़ा उन पे नोटिस-वोटिस भेजने चाहिए थे उन लोगों को। मगर ध्यान रखना चाहिए था कि बहुत सारी बातों का बड़ा अपेक्षित रिकॉर्ड भी होता है। अब मैं यहां कहना चाहता हूं। ऐसा नहीं कि कांग्रेस पार्टी में सभी लोग ऐसे थे। कांग्रेस पार्टी में अनेक नेता ऐसे थे जो भारत और भारतीयता की पहचान के लिए पूरी तरह कृत संकल्पित थे।
सरदार पटेल के साथ-साथ मैं कोट करना चाहता हूं केएम मुंशी जी कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी जी जो कि सोमनाथ मंदिर के उस आयोजन समिति के अध्यक्ष थे। उन्होंने अपनी किताब में लिखा 24 अप्रैल 1951 को और वो नेहरू जी को लेटर लिखते हैं और सोर्स है पिलीग्रिमिस टू फ्रीडम। वह कहते हैं प्रिय नेहरू जी मेरे लिए ऐसी स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है जो मुझसे भगवत गीता छीन ले। जो हमारे लाखों करोड़ों देशवासियों के मन में तीर्थ स्थलों और मंदिरों के प्रति श्रद्धा और भक्ति को नष्ट कर दे। इस प्रकार हमारे धार्मिक जीवन के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दे। ऐसी स्वतंत्रता का कोई औचित्य नहीं है।
मेरा यह सौभाग्य है कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का मेरा स्वप्न पूरा हुआ। मुझे भरोसा है इस मंदिर से हमारे राष्ट्र जीवन को फिर से महत्व और प्रतिष्ठा मिलेगी। जिससे हमारे देशवासी धर्म शुद्ध रूप का साक्षात्कार कर सकेंगे और अंदर से आत्मविश्वास जागृत होगा जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अत्यंत आवश्यक है। कांग्रेस के एक नेता कह रहे हैं कि स्वतंत्रता प्राप्त के बाद स्वतंत्रता की सार्थकता के लिए किस चीज के लिए आवश्यक है?
अब मैं नेहरू जी की कैबिनेट के एक मंत्री को कोट करना चाहता हूं। वी एन गाडगिल जी ने अपनी किताब गवर्नमेंट फॉर इनसाइड में लिखा। नेहरू जी को हमेशा पाकिस्तान में प्रचार की चिंता लगी रहती थी। मैं पूछना चाहता हूं आज कांग्रेस में सबसे ज्यादा चिंता पाकिस्तान में ही प्रचार की है ना? आप लोग भारतीय मीडिया से हैं पर जितनी सुर्खियां पाकिस्तान की मीडिया में बटोरी है हमारे विपक्ष ने उतनी पाकिस्तान के नेताओं ने नहीं बटोरी है। पाकिस्तानी मीडिया में।
तो यह कहते हैं कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा ने यह वी एन गाडगिल जी कह रहे हैं। घोषणा ने करोड़ों भारतवासियों के मन में उत्साह और हर्ष की लहर उत्पन्न कर दी है। गाडगिल जी आगे लिखते हैं कि पीडब्ल्यूडी मंत्री के नाते मैंने नेहरू जी के आदेश पर कई मस्जिदों और दरगाहों की मरम्मत सरकारी खर्च पर करवाई है। अब बताइए साहब उनका मिनिस्टर कह रहे हैं कि उन्होंने नेहरू जी के आदेश पर सरकारी खर्च से मस्जिदों और दरगाहों की मरम्मत कराई है। परंतु यदि मंदिर का निर्माण स्वयं प्रेरणा से भी हो रहा है तो उसमें जाने से परहेज करना चाहिए।
मुझे लगता है कि यह दर्शाता था कि भारत की स्वतंत्रता के बाद भी मानसिक रूप से हम मैकाले की मानसिकता से भरे हुए थे। इसलिए माननीय प्रधानमंत्री जी ने जो बात कही है कि मैकाले की मानसिकता से अगले 10 वर्ष में मुक्त होना है और मैकाले की मानसिकता का जो प्रभाव हमारी उस समय की सरकार और तत्कालीन प्रधानमंत्री जी पे था।
जबकि कांग्रेस पार्टी के अंदर ही एक नहीं अनेक नेता। जिसमें मैंने दो का नाम बनाया के एम मुंशी, वी एन गाडगिली नहीं पुरुषोत्तम दास टंडन। डॉ. राजेंद्र प्रसाद, के एम मुंशी, सी राजगोपालाचारी, सरदार पटेल यह सब लोग इस विचार के थे। डॉ. संपूर्णानंद परंतु उन विचारों को ध्वस्त करके उस मानसिकता का जो आवरण बना के रखा था।
तो मैं कह सकता हूं भारत को मानसिक गुलामी से मुक्त करने का अभी भी अंतिम चरण बाकी है। जिसे हम लोग एक जमाने में एक पंक्ति बोलते थे कि उगा सूर्य कैसा कहो मुक्ति का यह उजाला करोड़ों घरों में ना पहुंचा। तो उसकी एक पंक्ति है ना संयम ना निष्ठा ना एक आत्मता है। भरी है मनों में अभी तक गुलामी। वही राग अंग्रेजियत का पुराना सुनाते बड़े लोग नामी गिरामी प्रजातंत्र की धार उतरी गगन से मगर नीरज जन सागरों तक ना पहुंचा उगा सूर्य कैसा कहो मुक्ति का यह उजाला करोड़ों घरों तक ना पहुंचा।
इसलिए आज आवश्यकता है उस यथार्थ को दुनिया तक पहुंचाने की भारत के उस आत्म गौरव को भारत की उस शक्ति को और भारत की उस श्रेष्ठता को सम्मान देने की जो संपूर्ण विश्व को मार्गदर्शन देना चाहती है और इसके द्वारा भारत की अस्मिता भी अविभाज्य रहती है। जब आप श्री सोमनाथ के आगे श्रद्धा से सर झुकाते हैं तो वही श्रद्धा का भाव आपके मन में उत्तर में अमरनाथ से ले दक्षिण में रामेश्वरम तक और मल्लिकार्जुन से लेकर काशी विश्वनाथ तक जुड़ जाता है। और इतना ही नहीं वही श्रद्धा का भाव काशी विश्वनाथ से आगे बढ़कर काठमांडू के पशुपतिनाथ तक कैलाश मानसरोवर तक और पाकिस्तान के कटाश राज तक जुड़ जाता है। यह भारत की अविछिन्न पहचान और अस्मिता का प्रतीक है।
दुख की बात यह है कि आज कांग्रेस जिस प्रकार से उन चीजों का बचाव करने में रुकी है। भाई नेहरू की हर चीज तो आपने छोड़ दी। अब तो नेहरू टोपी भी आप नहीं पहनते। अब तो उनके नेता ने कुर्ता पजामा भी पहनना छोड़ दिया है। कांग्रेस सेवा दल में भी कैफ हटा दी है। नेहरू की हर चीज छोड़ दी है। मतलब जातपात भाषा प्रांत सब कुछ पे तो आ गए हैं। तो भाई यह भी छोड़ दीजिए। काहे बचाव करने में लगे?
तो इसलिए अंत में मैं सिर्फ यह कहना चाहूंगा कि वो लोग जो कहते हैं कि एक बार में बोल लीजिए बार-बार क्यों बोलते हैं? हकीकत में सिलेक्टेड वर्ड्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू का जितना पन्ना खोलिए वो पन्ना कुछ बोलता हुआ नजर आता है। और जो वो बोलता है वो दुनिया के सामने सच को खोलता है और उनके दिल को चीरता है।
मानो पन्ना कांग्रेस से कहता हो कि बैठा हूं दिल में इतने राज छुपाए। जरा सा होठ हिले तो दिल डगमगाए और उसके बाद जब कभी ईमानदारी से कोई कांग्रेसी उन पन्नों को पलटता होगा तो मुझे लगता है कि उसको वो पुराना गीत याद आता होगा कि कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया और जो बात निकली तो हर एक बात पे या पन्ने पलटे तो हर एक बात पे रोना आया।
अंत में मैं यह कहना चाहूंगा आज देश को इसलिए याद दिलाने की जरूरत है। दुनिया में शायद बहुत कम देश होंगे जिनका 1000 साल की कंटिन्यूम हिस्ट्री दिख रही हो। श्री सब्लीमाला में 2000 साल से ज्योति जल रही है। कोई बहुत से ऐसे देश नहीं है। मेरे ख्याल से शायद ही कोई एक देश हो जहां 2000 साल का कंटिन्यूम दिखाई पड़ रहा हो। तो दो विकल्प हैं।
एक तरफ वो विचारधारा जो ये मानती थी भारत कभी एक देश नहीं था। यहां एक एक देश के रूप में नहीं रह नहीं पाएगा। वो वो विचारधारा आज भी जो कांग्रेस में जीवित है अर्बन नक्सल थॉट जिसको कैसा भारत चाहिए? उत्तर दक्षिण में लड़ता हुआ भारत भाषाओं में लड़ता भारत, प्रांतों में लड़ता भारत, जातियों में लड़ता भारत और हर मुद्दे पर लड़कर बिखरता भारत। और एक तरफ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में समस्त प्रकार की भिन्नताओं के बीच में एक भारत और श्रेष्ठ भारत के भाव के साथ विकसित होकर निखरता भारत। धन्यवाद।
मेरा सवाल है मेरा सवाल है आप कांग्रेस पार्टी जवाहरलाल नेहरू छवि देखिए अगर सत्य ना हो तब वो कहे कि छवि खराब हम किसी की छवि नहीं खराब कर रहे हैं। छवि के ऊपर पड़ा हुआ पर्दा उठा दे रहे हैं। अब जनता स्वविवेक से निर्णय ले सकती है कि वह छवि उसको कैसी दिख रही है, खराब दिख रही है या अच्छी दिख रही है?
तो इसलिए कांग्रेस और जहां तक नेहरू जी के प्रति सम्मान की बात है तो हमारी मोदी जी की सरकार जब आई थी 2014 में तो नेहरू जी का 125वा वर्ष था और 125वें वर्ष के सारे कार्यक्रम हमारी सरकार ने पूरे सम्मान के साथ और पूरी गरिमा के साथ निभाए थे और आप सबको याद हो उस आयोजन समिति के अध्यक्ष भी श्री राजनाथ सिंह जी जो तत्कालीन गृह मंत्री थे वो थे तो प्रधानमंत्री के रूप में उनका पूरा सम्मान मान है।
विचारधारा के रूप में हम यह जनता के ऊपर छोड़ते हैं कि वह इस चीज को क्या समझते हैं। और वैसे एक और बात कहूं उस समय की तो बात छोड़िए आज की छवि कितनी सुंदर है। और ऐसी छवि आंखों में बसी हुई है माओवादियों और मुस्लिम लीगियों की कि मुझे वो पंक्ति याद आती है। कांग्रेस की आंखों में ऐसा दो एक तरफ मुस्लिम लीग एक तरफ माओवाद ऐसा आंखों में बसा है कि प्रीतम छवि नैन बसी पर छवि कहां समाए। पूरी तरीके से आंखों में ऐसी छवि बसी दूसरी छवि आ ही नहीं सकती।
खैर दिल्ली पुलिस और एमसीडी की टीम जो है गेट पर थी अतिक्रमण को हटाने के लिए वहां पर पथराव हुआ है। कई जवान आए हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाजवादी पार्टी के सांसद थे का हिस्सा। देखिए जो कुछ भी हो रहा है वह न्यायालय के आदेश पर विधिक प्रक्रिया के अनुरूप विशुद्ध ऑब्जेक्टिव और प्रोफेशनल यानी वस्तुनिष्ठ और व्यावसायिक दृष्टि से हो रहा है।
इस पर पत्थरबाजी से भी बाज आना चाहिए और बयानबाजी से भी बाज आना चाहिए। देखिए वह लोग आदतन बोलते हैं। इस तरह के वातावरण में माहौल को उकसाकर डायवर्ट करके भ्रम पैदा करके इंडी गठबंधन के दलों में जो आपसी प्रतिस्पर्धा है कट्टरपंथी वोटों के लिए यह उसका एक अंग है। मुझे लगता मगर देश की जनता इसको बहुत गंभीरता से नहीं लेती।
जी कोर्डिनेशन मीटिंग हुई तो रेजिडेंट के बीच में तब ये सांसद वहां मौजूद नहीं थे परंतु उसके बाद वो नजर आए और ये सवाल उठाए कि वो क्यों आए और यही सारी बातें अपने आप में देखिए इस घटना के दो पक्ष हैं। एक है लीगल पक्ष टेक्निकल यानी वैधानिक पक्ष और एक है राजनीतिक पक्ष। लीगल और वैधानिक पक्ष पर सरकारी एजेंसी और पुलिस काम कर रही है और राजनैतिक पक्ष के ऊपर क्या हो रहा है यह बहुत साफ दिखाई पड़ रहा है कि यहां पर भी यह वही भाव है जो दिल्ली में दिखता है और वही मुर्शिदाबाद में दिखता है। दोनों की मानसिकता में कोई अंतर नहीं है।
सवाल यह है कि अपने विपक्ष को पहले की बात को क्या एक ही हमारा स्टैंड बहुत स्पष्ट है। भारत सरकार एक नहीं कई बार इस बातों को दृढ़ता से कह चुकी है। हमारे विदेश सचिव वहां जाकर बात करके आए हैं। उसके बाद ही पहली बार बांग्लादेश की सरकार ने सांप्रदायिक हिंसा की बात स्वीकार की थी।
80 से अधिक केसेस दर्ज हुए थे और भारत सरकार ने बांग्लादेश में बदली हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भारतीय बंदरगाहों से मैं पुनः ये बात स्पष्ट करना चाहता हूं। भारतीय बंदरगाहों से व्यापार करने के लिए जो बांग्लादेश को फ्री एक्सेस मिला हुआ था उसे समाप्त कर दिया है। हम अपनी तरफ से कार्य कर रहे हैं।
मगर जिन लोगों को वहां पर यह वही लोग हैं ना जो सीए में कहते थे कि प्रोसीक्यूशन तो नजर नहीं आता है। और यह वही लोग हैं जो कहते थे कि नहीं नहीं नहीं सिर्फ आप नॉन मुस्लिम्स को क्यों दे रहे हैं? हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध ईसाई को ही क्यों दे रहे हैं? मुस्लिम्स को क्यों नहीं दे रहे हैं?
आज मुझे लगता है कांग्रेस पार्टी और विपक्षी दलों को सीएए के दौरान शाहीन बाग जैसे आंदोलन करने के लिए देश से माफी मांगनी चाहिए। क्योंकि जिन लोगों ने उस समय यह कहा था कि उन्हें पर्सक्यूशन नहीं दिख रहा है कि भारत सरकार पर्सक्यूशन के बेस के ऊपर यह कर रही है। मुझे लगता है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों के और आजकल बांग्लादेश में विशेष रूप से वो हिंदू इन दलों से कह रहा है कि इधर तो मेरे दर्द की इंतहा नहीं और तू कहता है कि जख्म दिखता नहीं।
ओके भारतीय जनता पार्टी पर विपक्षी नेताजिक इसमें देखिए कई बार बता चुके हैं और हम सिर्फ हिंदू संस्कृति को ही नहीं प्रतिस्थापित कर रहे हैं। हम उस संस्कृति को स्थापित कर रहे हैं जिसके लिए जर्मन दार्शनिक ऑर्थर शोपेनहावर ने कहा था कि उपनिषदिक फिलॉसफी इज द प्रोडक्ट ऑफ हाईएस्ट ह्यूमन विज़डम हम उसको पुन स्थापित कर रहे हैं।
हम उसको पुन स्थापित कर रहे हैं। पता नहीं आप लोगों में से कितने लोगों ने इरविन शोडिंग का नाम सुना है। जिसने इलेक्ट्रॉन की वेव की इक्वेशन दी थी। अगर जिन्होंने 11th 12th में भी फिजिक्स पढ़ी होगी तो शोडिंग वेव इक्वेशन पढ़ी होगी। क्वांटम फिजिक्स के तीन लोग पिता माने जाते हैं। प्लैंक, मैक्स प्लैंक, वनर हजनबर्ग और इरविन शडिंगर।
एरविन शडिंगर ने अपनी किताब 1964 में लिखी है माय व्यू ऑफ द वर्ल्ड। उसमें पूरा उपनिषदिक वर्जन है। और वो कहता है उपनिषदिक फिलॉसफी के लिए इट इज द मोस्ट एलिवेटिंग एंड अवार्डिंग रीडING फॉर मी इन द होल लाइफ। हम उसको पुन स्थापित कर रहे हैं और हम किसको पुन स्थापित कर रहे हैं? पुनः मैंने आप लोगों से बोला था। फिर बताए दे रहा हूं।
आज एआई का जमाना है। एआई का सबसे प्रचलित टूल चैट जीपीटी है। चैट जीपीटी के मालिक सैम वाल्टमैन से एक इंटरव्यू में पूछा गया था कि कौन सा ऐसा क्वेश्चन है जिसका आंसर एआई को नहीं पता है पर आपको पता है। तो उन्होंने कहा था हां एक प्रश्न है जिसका आंसर एआई को नहीं पता है पर मुझे पता है।
और वो उन्होंने कहा था द एब्सोल्यूट इक्विवेलेंस ऑफ आत्मन एंड ब्रह्मन। आत्मा और ब्रह्म में अब्सोल्यूट इक्विवेलेंस है। यह अद्वैत वेदांत के सार वाक्य ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या जीवो ब्रह्म ना परह जो आचार्य आदि शंकराचार्य ने कहा था उसे ही सैम ऑटमैन कोट कर रहे हैं। उसे ही इरविन शॉडिंग ने कहा है कि ऑब्जर्वर और ऑब्जर्व में कोई डिफरेंस नहीं है। हम उसको स्थापित कर रहे हैं।
और अंत में मैं कहना चाहूंगा हम उस हिंदू संस्कृति को स्थापित कर रहे हैं। जिसने जग केक्के ठुकराए लोगों को लो मेरे घर का खुला द्वार मैं अपना सब कुछ लुटा चुका फिर भी अक्षय है धनागार हमने दुनिया के हर धर्म को यहां शरण दी मैं पुनः ये बात कह चुका हूं फिर कह रहा हूं एक देश बताइए जिसमें दुनिया में पाए जाने वाले सारे धर्म पाए जाते हो वो सिर्फ भारत है पारसी अपनी जमीन से मिट गए भारत में फल फूल रहे हैं यहूदियों पे एकमात्र देश जहां कोई पर्सक्यूशन नहीं हुआ वो सिर्फ भारत है इस्लाम के सारे फिरके पाए जाते हैं 57 में से एक मुस्लिम देश नहीं सिर्फ भारत है। क्रिश्चियनिटी के सारे से जहां पाए जाते हैं, वह सिर्फ भारत है।
बौद्ध अनेक देश हैं। पर बौद्ध धर्म के सबसे बड़े धर्मुरु दलाई लामा जी को जिसने जीवन रक्षा के लिए यहां पर स्थान दिया वो सिर्फ भारत है और वह इसलिए है कि यह हिंदू संस्कृति है। इसलिए इसका उत्थान सामाजिक, वैज्ञानिक और कूटनीतिक तीनों दृष्टियों से 21वीं सदी में अति आवश्यक है।
नेहरू सोमनाथ नेहरू सोमनाथ नेहरू सोमनाथ नेहरू सोमनाथ नेहरू सोमनाथ नेहरू सोमनाथ नेहरू सोमनाथ नेहरू सोमनाथ

