Monday, June 8, 2026

सुप्रीम कोर्ट: भारत में इलाज उपलब्ध तो विदेश जाने की छूट नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिका यात्रा पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट

मेडिकल आधार पर विदेश यात्रा की मांग खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने एक आरोपी को इलाज के लिए अमेरिका जाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि जिस बीमारी के उपचार के लिए विदेश यात्रा की मांग की गई थी, उसका इलाज भारत में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं से पर्याप्त रूप से किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने तेलंगाना हाई कोर्ट के उस निर्णय को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी प्रतिवादी संख्या 2 को इलाज के लिए अमेरिका जाने की अनुमति दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को अनुचित माना।

आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में चल रहा मुकदमा

मामले में आरोपी भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में ट्रायल का सामना कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपी की बीमारी ऐसी नहीं है, जिसके लिए देश से बाहर जाकर इलाज कराना अनिवार्य हो।

आरोपी ने अपने पक्ष में यह कहा था कि वह जांच और ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही में सहयोग करता रहा है। उसने यह भी तर्क दिया कि वह मजिस्ट्रेट कोर्ट में 12 बार उपस्थित हो चुका है, इसलिए उसे विदेश जाने की अनुमति दी जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस तर्क से भी असहमति जताई कि 12 बार मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने और छह महीने में भारत लौटने की अंडरटेकिंग देने भर से विदेश यात्रा की अनुमति दी जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को बताया जरूरत से अधिक उदार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने मामले के पूरे घटनाक्रम, एफआईआर दर्ज होने के बाद की कार्यवाही, आरोपी के आचरण, उसकी बीमारी की प्रकृति और भारत में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं को सही दृष्टि से नहीं देखा। इन परिस्थितियों में हाई कोर्ट को न्यायिक संयम बरतना चाहिए था।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि भारत में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाएँ किसी भी विदेशी देश की चिकित्सा सुविधाओं के बराबर हैं। इसलिए जब सभी मेडिकल सुविधाएँ देश में मौजूद हैं, तो आरोपी को अमेरिका जाने की अनुमति देना हाई कोर्ट की ओर से जरूरत से अधिक उदारता दिखाने जैसा था।

पासपोर्ट लौटाने से शुरू हुआ विवाद

मामले की शुरुआत तब हुई जब मजिस्ट्रेट ने आरोपी को जमा किया गया पासपोर्ट वापस कर दिया। हालांकि मजिस्ट्रेट ने यह स्पष्ट शर्त लगाई थी कि आरोपी सक्षम अदालत से अनुमति लिए बिना भारत से बाहर नहीं जाएगा।

मजिस्ट्रेट के इस आदेश से असंतुष्ट होकर राज्य ने सेशन कोर्ट में रिवीजन याचिका दाखिल की। सेशन कोर्ट ने मजिस्ट्रेट का आदेश पलटते हुए आरोपी को अपना पासपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया, क्योंकि मामला लंबे समय से लंबित था।

सेशन कोर्ट ने पासपोर्ट अधिकारियों को यह भी सिफारिश की कि आरोपी की आवाजाही को पासपोर्ट अधिनियम 1967 के प्रावधानों के अनुसार प्रतिबंधित किया जाए। इस आदेश के खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाई कोर्ट ने आरोपी को अमेरिका जाने की छूट दी थी

हाई कोर्ट ने अपनी रिवीजनल अधिकारिता का प्रयोग करते हुए सेशन कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट के आदेश को बहाल कर दिया। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने आरोपी को कुछ शर्तों के अधीन अमेरिका जाने की अनुमति भी दे दी।

हाई कोर्ट के अनुसार, आरोपी पहले मजिस्ट्रेट के समक्ष 12 बार पेश हो चुका था और उसे अमेरिका में मेडिकल ट्रीटमेंट की जरूरत थी। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने माना कि आरोपी को विदेश यात्रा की अनुमति दी जा सकती है।

हाई कोर्ट के इस फैसले से शिकायतकर्ता असंतुष्ट हुआ और उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड, आरोपी की स्थिति और आपराधिक मुकदमे की प्रकृति को देखते हुए हाई कोर्ट के आदेश की समीक्षा की।

अनुच्छेद 21 का अधिकार पूर्ण नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की उस दलील को भी खारिज कर दिया कि पासपोर्ट जमा कराने या विदेश यात्रा से पहले अदालत की अनुमति लेने की शर्त संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन है।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता द्वारा लिखे गए निर्णय में कहा गया कि अनुच्छेद 21 निश्चित रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है और इसमें विदेश यात्रा का अधिकार भी शामिल है। लेकिन इस अधिकार को अलग करके नहीं देखा जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, शिकायतकर्ता के शीघ्र ट्रायल के अधिकार और आपराधिक न्याय प्रशासन से जुड़े व्यापक सामाजिक हितों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में राजेश रंजन यादव बनाम सीबीआई मामले का भी उल्लेख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने मजिस्ट्रेट का आदेश बहाल किया

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली। इसके परिणामस्वरूप मजिस्ट्रेट का आदेश अपने प्रभाव सहित बहाल हो गया, जिसके अनुसार आरोपी अदालत की अनुमति के बिना भारत से बाहर नहीं जा सकेगा।

इस निर्णय से सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे आरोपी को केवल मेडिकल आधार पर विदेश यात्रा की अनुमति देना स्वतः उचित नहीं माना जा सकता, विशेष रूप से तब जब भारत में पर्याप्त इलाज उपलब्ध हो।

कोर्ट का रुख यह भी बताता है कि विदेश यात्रा का अधिकार मौलिक स्वतंत्रता का हिस्सा होने के बावजूद मुकदमे की निष्पक्षता, पीड़ित पक्ष के अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

मामले का शीर्षक और उद्धरण

इस मामले का शीर्षक सीसा संतोष बनाम स्टेट ऑफ तेलंगाना एंड अदर है। इसका उद्धरण 2026 लाइव लॉ एससी 603 है। सुप्रीम कोर्ट ने 4 जून 2026 के निर्णय में तेलंगाना हाई कोर्ट के आदेश को पलट दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के परमेश्वर, अधिवक्ता एम शरथ चंद्र रेड्डी, अधिवक्ता यशस्वी एसके चोकसी, अधिवक्ता कृष्ण कुमार सिंह और एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड पेश हुए। प्रतिवादियों की ओर से देविना सहगल, श्रीकांत वर्मा मुदुनुरु और अन्य अधिवक्ता उपस्थित रहे।

प्रतिवादियों की ओर से यथार्थ कंसल, एस निरंजन रेड्डी वरिष्ठ अधिवक्ता, कृष्ण देव जगर्लामुदी, अर्पित कुमार मिश्रा, विष्णु कांत मुंडाडा और शादाब अजहर ने भी पक्ष रखा। मामले में सुप्रीम कोर्ट, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और विदेश यात्रा के अधिकार से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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