संस्कृत की दुर्दशा
मनरेगा मजदूर से भी सस्ते हुए संस्कृत के विद्वान, केंद्र सरकार की ‘बौद्धिक बंधुआ मजदूरी’ का यह कैसा मॉडल?
नई दिल्ली के वातानुकूलित कक्षों में बैठकर ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ और ‘सांस्कृतिक पुनरुत्थान’ पर भाषण देना एक बात है, लेकिन धरातल पर उस संस्कृति के वाहकों के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है, यह देखना रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव है।
वर्तमान केंद्र सरकार, जो स्वयं को राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की ध्वजवाहक मानती है, उसके राज में देववाणी संस्कृत की सेवा करने वाले विद्वानों की स्थिति अकुशल मजदूरों से भी बदतर हो चुकी है।
यह एक सुनियोजित ‘बौद्धिक शोषण’ है जो शिक्षा मंत्रालय के नाक के नीचे केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा किया जा रहा है। हाल ही में जयपुर और श्रृंगेरी परिसरों द्वारा जारी किए गए विज्ञापन इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि सरकार की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है।

जिस देश में सरकार एक सफाई कर्मचारी या सुरक्षा गार्ड के लिए बीस हजार रुपये से अधिक का न्यूनतम वेतन तय करती है, उसी देश में वेदों और दर्शन के मर्मज्ञ विद्वानों को दस हजार रुपये की ‘भीख’ दी जा रही है। क्या यही ‘विश्वगुरु’ भारत की परिकल्पना है?
देववाणी का अपमान: CSU श्रृंगेरी परिसर की शर्मनाक वास्तविकता
कर्नाटक के पवित्र श्रृंगेरी क्षेत्र में स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के श्री राजीव गांधी परिसर द्वारा 29 जनवरी 2026 को जारी किया गया विज्ञापन संख्या 1175 किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के हृदय को विदीर्ण करने के लिए पर्याप्त है।
इस विज्ञापन में मीमांसा, न्याय, अद्वैत वेदांत, ज्योतिष, व्याकरण और साहित्य जैसे अत्यंत गूढ़ और क्लिष्ट विषयों को पढ़ाने के लिए ‘शिक्षण सहायकों’ की भर्ती निकाली गई है।
ये वे विषय हैं जिनका अध्ययन करने के लिए एक छात्र को अपने जीवन के दस से पंद्रह वर्ष कठोर तपस्या में बिताने पड़ते हैं। न्याय शास्त्र के तर्कों को समझने या व्याकरण की सिद्धियों को कंठस्थ करने में पीढ़ियां खप जाती हैं।

लेकिन, केंद्र सरकार के अधीन संचालित इस विश्वविद्यालय ने इन पदों के लिए जो मानदेय तय किया है, वह मात्र 10000 रुपये प्रतिमाह है। यह राशि न केवल हास्यास्पद है, बल्कि उन ऋषियों की परंपरा का घोर अपमान है जिन्होंने इन शास्त्रों की रचना की थी।
सोचने वाली बात यह है कि आज के महंगाई के दौर में दस हजार रुपये का मूल्य क्या है? एक सुदूर गांव में भी इतने कम पैसे में जीवन यापन असंभव है, तो फिर श्रृंगेरी जैसे पर्यटन और धार्मिक महत्व वाले शहर में एक विद्वान इतने अल्प वेतन में अपना भरण-पोषण कैसे करेगा?
यह विज्ञापन स्पष्ट करता है कि सरकार की नजर में ‘न्याय शास्त्र’ के विद्वान की कीमत एक दिहाड़ी मजदूर से भी कम है। 11 फरवरी 2026 को होने वाले साक्षात्कार के लिए जब अभ्यर्थी अपनी डिग्रियां लेकर पहुंचेंगे, तो वे दरअसल रोजगार मांगने नहीं, बल्कि अपनी विद्वता की नीलामी में शामिल होने जाएंगे।
सरकार ने शिक्षा को एक ऐसा बाजार बना दिया है जहां ज्ञान की बोली सबसे निचली दरों पर लगाई जा रही है। ‘समेकित’ वेतन के नाम पर विद्वानों का यह शोषण बताता है कि सरकार के लिए संस्कृत केवल एक चुनावी नारा है, न कि संरक्षण का विषय।
जयपुर परिसर: योग्यता का क्रूर उपहास और ‘हायर एंड फायर’ की नीति
शोषण की यह काली छाया केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्थान की राजधानी जयपुर तक भी फैली हुई है। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के जयपुर परिसर ने 5 फरवरी 2026 को विज्ञापन संख्या 4635 जारी कर भूगोल और ज्योतिष के लिए अंशकालिक शिक्षकों की मांग की है। यहाँ सरकार की निर्लज्जता अपने चरम पर दिखाई देती है।
इन पदों के लिए जो योग्यता मांगी गई है, वह भारत की सर्वोच्च शैक्षणिक अर्हता है। अभ्यर्थी का संबंधित विषय में स्नातकोत्तर होना अनिवार्य है और साथ ही उसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की अत्यंत कठिन ‘राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा’ (NET) उत्तीर्ण होनी चाहिए या फिर उसे ‘विद्यावारिधि’ (PhD) की उपाधि प्राप्त होनी चाहिए।

एक युवा जो अपनी जवानी के पांच से सात साल शोध कार्यों में खपाता है, जो पुस्तकालयों की खाक छानकर डॉक्टरेट हासिल करता है, उसे सरकार क्या प्रस्ताव दे रही है?
सरकार उसे प्रस्ताव दे रही है मात्र 1000 रुपये प्रति व्याख्यान का, और उसमें भी अधिकतम सीमा पच्चीस हजार रुपये प्रतिमाह तय कर दी गई है। यानी, आप चाहे जितना भी परिश्रम करें, आपको एक लिपिक के वेतन के बराबर भी राशि नहीं मिलेगी। और यह नौकरी भी केवल तीन महीने के लिए है।
9 फरवरी 2026 को साक्षात्कार के माध्यम से चुना गया विद्वान तीन महीने बाद पुनः बेरोजगार हो जाएगा। क्या शिक्षा व्यवस्था ऐसे चलती है? क्या तीन महीने के लिए आया शिक्षक छात्रों के साथ कोई भावनात्मक या बौद्धिक संबंध बना पाएगा?
यह ‘हायर एंड फायर’ (रखो और निकालो) की नीति पूरी तरह से कॉर्पोरेट जगत की वह भी सबसे निचले स्तर की शोषणकारी नीति है जिसे अब संस्कृत के मंदिरों में लागू किया जा रहा है। यह नेट और पीएचडी जैसी डिग्रियों का मखौल उड़ाना नहीं तो और क्या है?
सरकारी आंकड़ों का विरोधाभास: विद्वान से महंगा मजदूर
इस पूरे प्रकरण में जो सबसे बड़ा विरोधाभास उभरकर सामने आता है, वह स्वयं केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय के आंकड़े हैं। वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार ने शहरी क्षेत्रों में न्यूनतम मजदूरी की जो दरें तय की हैं, वे संस्कृत विद्वानों की दुर्दशा को और अधिक उजागर करती हैं।

सरकारी नियमों के अनुसार, एक अकुशल श्रमिक, जिसे किसी विशेष तकनीकी या बौद्धिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं है, उसे न्यूनतम 20,358 रुपये प्रतिमाह मिलना चाहिए। अर्द्ध-कुशल कामगार के लिए यह राशि 22,568 रुपये और कुशल कामगार के लिए लगभग 24,804 रुपये प्रतिमाह है।
यह सरकार द्वारा तय किया गया वह न्यूनतम मानक है जिससे कम वेतन देना कानूनन अपराध माना जाता है।
अब जरा इस तुलनात्मक अध्ययन को देखिए। एक तरफ वह अकुशल श्रमिक है जो शारीरिक श्रम करता है और उसे सरकार बीस हजार रुपये का अधिकार देती है, जो कि सर्वथा उचित है।
वहीं दूसरी तरफ, एक संस्कृत का विद्वान है, जिसने पाणिनी की अष्टाध्यायी को साधा है, जिसने शंकराचार्य के भाष्यों का अध्ययन किया है, और जिसने नेट जैसी कठिन परीक्षा पास की है। उसे यह सरकार दस हजार रुपये या अधिकतम पच्चीस हजार रुपये (वह भी बिना किसी सुरक्षा के) देकर अपना पल्ला झाड़ रही है।
क्या केंद्र सरकार यह कहना चाहती है कि भारतीय दर्शन और ज्ञान परंपरा को पढ़ाने वाले आचार्य की सामाजिक और आर्थिक उपयोगिता एक अकुशल मजदूर से भी कम है?
यह आंकड़े चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के शोर में भारत की आत्मा यानी उसकी ज्ञान परंपरा को भूखा मारा जा रहा है।
खोखले वादे और अंधकारमय भविष्य
यह स्थिति रातों-रात पैदा नहीं हुई है, बल्कि यह उस मानसिकता का परिणाम है जो शिक्षा को निवेश नहीं, बल्कि खर्च मानती है। देशभर के संस्कृत विश्वविद्यालयों में हजारों पद रिक्त पड़े हैं। स्थायी नियुक्तियां निकालने के बजाय सरकार तदर्थवाद (Ad-hocism) और संविदा प्रथा को बढ़ावा दे रही है।

जब एक विश्वविद्यालय अपने शिक्षकों को सम्मानजनक जीवन जीने का वेतन नहीं दे सकता, तो वह छात्रों को क्या प्रेरणा देगा? जब कक्षा में बैठा छात्र यह देखेगा कि उसके गुरु, जो ज्योतिष या वेदांत के प्रकांड विद्वान हैं, वे आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं और उन्हें अगले महीने की नौकरी की चिंता है, तो क्या वह छात्र भविष्य में संस्कृत पढ़ने का निर्णय लेगा? कदापि नहीं।
हम अपनी आंखों के सामने एक पूरी पीढ़ी को अपनी जड़ों से कटते हुए देख रहे हैं, और इसका कारण कोई विदेशी आक्रमणकारी नहीं, बल्कि हमारी अपनी चुनी हुई सरकार की नीतियां हैं।
प्राइवेट कॉलेज और संस्थान भी अक्सर शिक्षकों का शोषण करते हैं, लेकिन जब ‘राजा’ ही शोषक बन जाए तो प्रजा किससे गुहार लगाए? केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय संसद के अधिनियम द्वारा स्थापित संस्थान है। इसे आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए था, लेकिन यह शोषण का अड्डा बन गया है।
सरकार भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) के नाम पर करोड़ों का बजट आवंटित करती है, सेमिनार करती है, लेकिन जो उस ज्ञान के वास्तविक संवाहक हैं, उनके हिस्से में केवल उपेक्षा आती है।
25,000 रुपये या 10,000 रुपये में पीएचडी, आचार्य के विद्वान को रखना ‘बौद्धिक बंधुआ मजदूरी’ के अलावा और कुछ नहीं है। यह उन युवाओं के साथ विश्वासघात है जिन्होंने सरकार के ‘संस्कृत प्रेम’ पर भरोसा करके इस क्षेत्र में अपना भविष्य देखा था।
संस्कृति रक्षण का ढोंग बंद हो
अंततः यह प्रश्न पूछना आवश्यक है कि क्या हम वास्तव में अपनी संस्कृति को बचाना चाहते हैं या केवल उसकी लाश पर राजनीति करना चाहते हैं?
यदि केंद्र सरकार वास्तव में संस्कृत की हितैषी है, तो उसे तत्काल प्रभाव से श्रृंगेरी और जयपुर जैसे संस्थानों में सम्मानजनक वेतन मान के साथ स्थायी या दीर्घकालिक नियुक्तियां करनी चाहिए।
एक विद्वान को मजदूर से भी कम आंकना राष्ट्र की बौद्धिक संपदा का अपमान है। इतिहास गवाह है कि जिस समाज ने अपने शिक्षकों और विचारकों का अपमान किया, वह समाज वैभवशाली होकर भी नष्ट हो गया।
आज समय की मांग है कि ‘विश्वगुरु’ बनने का दिवास्वप्न देखने से पहले सरकार अपने घर के विद्वानों को दो वक्त की सम्मानजनक रोटी का प्रबंध करे।
अन्यथा, आने वाली पीढ़ियां संस्कृत के ग्रंथों को केवल संग्रहालयों में देखेंगी, उन्हें पढ़ने और समझाने वाला कोई जीवित विद्वान नहीं बचेगा। यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परीक्षा की घड़ी है, और दुर्भाग्य से, सरकार इसमें पूरी तरह अनुत्तीर्ण होती दिख रही है।

