Friday, August 29, 2025

संघ शताब्दी पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का संपूर्ण व्याख्यान: 27 अगस्त 2025, विज्ञान भवन, नई दिल्ली

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं, शताब्दी वर्ष के इस अवसर पर नई दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिवसीय व्याख्यान माला का आयोजन किया गया है।

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इस कार्यक्रम का विषय ‘आरएसएस की 100 वर्ष की यात्रा: नए क्षितिज’ है। कार्यक्रम में संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत तीन दिन व्याख्यान देकर संघ के विचारों को प्रस्तुत कर रहे हैं।

यह श्रृंखला 26 अगस्त से 28 अगस्त तक आयोजित की गई है। संघ शताब्दी के अवसर पर सरसंघचालक के तीनों दिन के सम्पूर्ण व्याख्यान यहां प्रकाशित किए जा रहे हैं।

सरसंघचालक मोहन भागवत जी का 27 अगस्त 2025 का संपूर्ण व्याख्यान :-

माननीय सरकार्यवाह जी, उत्तर क्षेत्र के माननीय संघचालक जी, दिल्ली प्रांत के माननीय संघचालक जी, संघ के अन्य अधिकारी गण, उपस्थित समाज जीवन के सभी क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति की सार्थकता को दर्ज करने वाले सभी सुधी जन, माता-भगिनी, कल संघ की 100 साल की यात्रा का वर्णन किया था।

यात्रा का वर्णन किया था। किस प्रकार उपेक्षा और विरोध के वातावरण में संघ स्वयंसेवकों ने अपनी निष्ठा के बलबूते स्वयं को दांव पर लगाकर संघ को इन सब कालखंडों से पार किया। और यह सारा करते समय कई कटु अनुभव आए। विरोध हुआ।

यह सारा होने के बाद भी संपूर्ण समाज के लिए उनके हृदय में शुद्ध सात्विक प्रेम ही रहा। आज भी है। यही संघ है। शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है। और इसलिए आज वह समय नहीं रहा। अनुकूलता है। समाज की मान्यता है।

विरोध बहुत कम हो गया है और जो है उसकी भी धार भोथरी हो गई है। उसका परिणाम नहीं होता। परंतु इसमें भी स्वयंसेवक यही सोचता है कि अनुकूलता मिली है तो सुविधा भोगी नहीं होना है। अनुकूलता मिली है इसलिए आराम नहीं करना है।

तो संपूर्ण हिंदू समाज को संगठित करने के अपने लक्ष्य को पाने तक सतत चलते रहना है और चलते रहना है किस तरीके से तो तरीका मैंने बताया चार शब्दों में उसका वर्णन भी होता है मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा जो सज्जन लोग हैं उनसे मैत्री करना।

जो हमारे प्रति सज्जनता नहीं बरतते उनकी उपेक्षा करना। कुछ अच्छा होता है। किसी ने भी किया हो अपने विचार का समर्थक हो ना हो विरोधी भी हो लेकिन अच्छा करता है तो आनंद जताना और जो दुर्जन है पाप होता है कुछ होता है तो दुर्जनों की करुणा करना।

घृणा नहीं करना इस प्रकार से यह काम चलता है और यह काम करते समय जैसा मैंने कहा स्वयंसेवकों को मिलता कुछ नहीं। संघ में इंसेंटिव नहीं है। डिसइंसेंटिव्स बहुत सारे हैं। जब पूछते हैं लोग कि आपको क्या मिलेगा संघ में? संघ में आके हमको क्या मिलेगा?

तो मैं तो सीधा जवाब देता हूं। तुमको कुछ नहीं मिलेगा। तुम्हारे जो पास है वो भी चला जाएगा। हिम्मत है तो करो। हिम्मत वालों का काम है। लेकिन स्वयंसेवक कर रहे हैं और इसलिए करते हैं कि ऐसी निस्वार्थ सेवा समाज की करने के कारण उनको जो जीवन में एक सार्थकता प्राप्त होती है।

उसका उनको आनंद होता है। और हम जो कर रहे हैं वह सबके हित की बात है। यह अनुभव से वह जानते हैं। उनको तर्क से समझाना नहीं पड़ता है। करते समय उनको अनुभव आता है और इसलिए आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च अपनी जीवन की सार्थकता के लिए मुक्ति के लिए।

और पूरी दुनिया के हित के लिए ऐसा हम काम कर रहे हैं। यह अनुभूति उनको और इस पथ पर सतत परिश्रमशील रहने के लिए प्रेरित करती है। क्योंकि ध्येय के लिए सब स्वयंसेवक है। शुद्ध सात्विक प्रेम का संबंध है। लेकिन वह मोह का संबंध नहीं है।

यह व्यक्तिगत प्रेम नहीं है। एक ध्येय के पथिक है। और ध्येय बहुत भव्य है। हमारे पुराने कार्यकर्ता थे दादा राव परमार साहब नहीं रहे। उनको अंग्रेजी में ही बोलने की आदत पड़ी। पहले से दक्षिण भारत में काम किया। तो उनकी मातृभाषा मराठी थी।

हिंदी भी अच्छा जानते थे। लेकिन शुरू होते थे और दो लाइनों के बाद अंग्रेजी शुरू होता था। तो उन्होंने एक बार संघ के कार्य का वर्णन एक लाइन में ऐसे किया कि आरएसएस इज इवोल्यूशन ऑफ लाइफ मिशन ऑफ हिंदू नेशन। स्वयंसेवक ही जानता है।

हिंदू राष्ट्र के जीवन कार्य का विकास हम कर रहे हैं अपने राष्ट्र में। सो व्हाट इज दी लाइफ मिशन ऑफ हिंदू नेशन? तो हमारा हिंदुस्तान जो है उसका प्रयोजन ही है विश्व कल्याण। जैसा मैंने कहा राष्ट्र नेशन नहीं हमारे यहां नेशन स्टेट होता है।

हमारा स्टेट के बावजूद बना राष्ट्र है। क्योंकि जैसा मैंने कहा कि विकास के क्रम में खोजते खोजते दुनिया ने अंदर खोजना बंद कर दिया। भारत ने चालू रखा। बहुत प्राचीन समय की बात है। हिस्ट्री के पहले है और खोजते खोजते उनको अंदर एक तत्व मिल गया।

जो सबको जोड़ता है। सब स्तरों पर जोड़ने वाला चौथा तत्व शरीर मन बुद्धि सब जानते हैं। उनको जोड़ने वाला क्या है? व्यक्ति है, समूह है, सृष्टि है, व्यक्ति है, मानवता है, सृष्टि है। जोड़ने वाला क्या है? वो चौथा तत्व वो हमारे ऋषि मुनि पूर्वजों को मिल गया।

और उसके जरिए उनको एक तो पता चला कि वास्तविक और शाश्वत सुख इससे मिलेगा। उपभोग से नहीं मिलेगा। उपभोग इंद्रियां करती है। देह नश्वर है। वह समाप्त हो जाता है। और दुनिया अगर चलनी है तो सब लोग अगर उपभोग के पीछे लगे तो स्पर्धा होती है।

आपस में झगड़े होते हैं। दुनिया नष्ट होने की नौबत आती है। जैसा हम आज देख रहे हैं। और इसलिए इन उपभोगों पर बाहरी सुख के दौड़ पर संयम लगाकर हम लोग अंदर खोजे तो अंदर अपने को शाश्वत कभी फीके ना पड़ने वाले सुख का उगम मिल जाएगा।

स्रोत मिल जाएगा। उसको पाना यह मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है। और इससे सब लोग सुखी होंगे। सब लोग समन्वय के साथ बाकी सबके साथ रह सकेंगे। दुनिया के कलह समाप्त होंगे। दुनिया में शांति और सुख रहेगा। और दूसरी बात उस तत्व ने सिखाई कि दिखते सब अलग-अलग है।

लेकिन सब एक है। एक है यानी सब अपने हैं। तो हिंदुत्व क्या है? हिंदूनेस क्या है? हिंदू की विचारधारा क्या है? सारांश अगर एक कहना है तो दो शब्द है सत्य और प्रेम। अपनापन दुनिया अपनेपन से चलती है। सौदे पर नहीं चलती। कॉन्ट्रैक्ट पर नहीं चलती।

चल नहीं सकती। उस अपनेपन को सिखाना सारी दुनिया को यह उन्होंने तय किया। अब यह करना है तो एककेदुक्के का काम नहीं है। उसके लिए एक फुल फ्लेज अपेरेटस चाहिए। एक पूरा राष्ट्र इसमें लगना चाहिए। इसलिए उनकी तपस्या से अपने राष्ट्र का निर्माण हुआ।

ऐसा वेदों में वर्णन है। भद्रं इच्छंत ऋषयः स्वरविदः विश्व कल्याण की इच्छा रखने वाले सृष्टि के रहस्य को जानने वाले ऋषियों ने तपो दीक्षा उपासे दुरग्रे दुर्धर तप की दीक्षा धारण करके तप किया। ततो राष्ट्रं बलं ओजस् जातम हमारे राष्ट्र का हमारे बल का हमारी ओज का निर्माण हो।

और इसलिए परंपरा से हमारी संस्कृति ने सिखाया है हमको पूर्वजों का आदेश एतद् देश प्रसूतस्य सकाशात् जन्मात् स्वं स्वं चरित्रं शिक्षन् पृथिव्याः सर्वमानवाः प्राचीन देश होने के नाते बड़े भाई जैसा ऐसा इस देश के लोग ऐसा जीवन जिए कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति आए और जीवन की विद्या भारत के लोगों से सीखे।

ये जीवन की विद्या क्या है? तो जीवन में विविधता है। सृष्टि में विविधता है। परस्पर विरोध भी है। वह विविधताएं टकराती भी है। लेकिन यह सब विविधता एकता का ही आविष्कार है। तो उन सबको मानना उन सबको संभालना और संभालते हुए साथ लेकर सबको चलना।

सब सुखी हो। मैक्सिमम गुड ऑफ द मैक्सिमम पीपल नहीं। सर्वेपि सुखिनः संतु सब सुखी हो। सर्वत्र का भला हमारी विचारधारा में यही है और ऐसे चलना तो एक समन्वय स्थापित करना पड़ेगा उस समन्वय स्थापित करने के लिए मनुष्य को क्योंकि वह बुद्धिमान है।

सृष्टि का स्वामी वह बना है। सृष्टि उससे चलती है, बनती है, बिगड़ती है। उसको अपने ऊपर संयम लाना पड़ेगा। अपना कुछ छोड़ना पड़ेगा। कबूतर है और बाज है। बाज का भक्ष कबूतर है। बाज कबूतर का पीछा करने लगा। कबूतर शिबि नाम के राजा के पास जाकर बैठ गया।

राजा ने पहचान लिया। इसके पीछे बाज लगा है। डर गया है। उसको छुपा लिया। बाज आया। उसने राजा को कहा कि यहां एक कबूतर आया था। मुझे भूख लगी है। उसको खाने वाला हूं मैं। वो कहां है? तुमने छुपा के रखा है। उसको छोड़ो।

तो शिबि राजा ने कहा वह शरणागत है। उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है। मेरी प्रजा है। उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है। मैं तुमको उसे खाने नहीं दूंगा। अब देखो सृष्टि में विविधता है। परस्पर विरोधी भी है। एक तरफ बाज है, एक तरफ कबूतर है।

कानून से चलते केवल कानून से। तो बुद्धि का तर्क है। वो क्या कहेगा? या तो कबूतर को मारो या तो बाज को मारो। देयर इज नो सॉल्यूशन। वो बाज कहता है शिबि राजा को कि तुम धर्म की दुहाई दे रहे हो। लेकिन मुझे प्रकृति ने धर्म दिया है मांस खाना।

मैं उसको नहीं खाऊंगा तो तुम्हारे जैसे शाक सब्जी खा के नहीं जी सकता। तुम मेरे धर्म की हानि कर रहे हो और अपने धर्म की दुहाई दे रहे हो। यह धर्म नहीं है क्योंकि धर्म पहले मध्य में अंत में सदा सर्वदा सर्वत्र सबके लिए सुखदायी ही होता है।

जहां दुख पैदा होता है वो धर्म नहीं है। अब ये समस्या है। और इसका धार्मिक निदान क्या है? शिबि राजा कहेगा तुम्हारी बात ठीक है। तुमको मांस खाए बिना तुम्हारा जीवन नहीं चलेगा और अपना जीवन चलाना प्रत्येक का धर्म है। तो तुम्हारा भी धर्म रहे।

कबूतर भी बचे मेरा भी धर्म रहे। तो तुमको मांस खाना है। कबूतर का ही खाना यह नियम नहीं है। कबूतर के वजन के बराबर मेरा मांस काट के मैं देता हूं। तुम खाओ। मनुष्य को धर्म को रखना पड़ता है। उसके लिए त्याग करना पड़ता है।

और धर्म की रक्षा करने से सबकी रक्षा होती है। सारी सृष्टि ठीक चलती है। जो डायवर्सिटीज है उसका मैनेजमेंट ठीक से होता है। बिना किसी डायवर्सिटी को समाप्त किए होता है। आज का विश्व अगर हम देखते हैं तो यह बात अभी नहीं है विश्व के पास।

भूल गया है विश्व। 300 350 वर्षों के पहले से जो धीरे-धीरे जड़वाद बढ़ा और अति पर पहुंच गया। व्यक्तिवाद बढ़ा और अति पर पहुंच गया। केवल जड़वादी और उपभोगवादी विचारों के कारण कंज्यूमर और क्रश मटेरियलिज्म के कारण जो जीवन की विद्या बनी उसमें भद्रता नहीं रही।

संस्कार नहीं रहा तो हम देखते हैं आज विश्व के देशों की स्थिति समाज में धीरे-धीरे क्या बढ़ रहा है जो सात सामाजिक पाप गांधी जी ने कहे थे वह बढ़े सभी जगह हो रहा है। वेल्थ विदाउट वर्क प्लेजर विदाउट कंसाइंस नॉलेज विदाउट कैरेक्टर कॉमर्स विदाउट मोरालिटी।

साइंस विदाउट ह्यूमैनिटी रिलीजन विदाउट सैक्रिफाइस और पॉलिटिक्स विदाउट प्रिंसिपल्स महात्मा जी ने कहा है यह सात सामाजिक पाप है। यह पाप सर्वत्र बढ़ रहा है। उपाय क्या है? अगर उपभोग ही जीवन का लक्ष्य है और अगर जड़ दुनिया में सत्य कुछ नहीं है यह नष्ट होगा।

बाद में किसने देखा है? तो फिर जीवन का कुछ अर्थ ही नहीं रहता। क्योंकि जन्मे हम अपनी इच्छा से नहीं है और मरेंगे कैसे हमको पता नहीं है। इन दो पॉइंट्स के बीच में जीना है और खूब उपभोग करना है तो जैसे भी जीना है जी लो।

किसी को गला काट के किसी के पेट पर पैर देके बीच जी लो। उतना ही करना है ना। मृत्यु के बाद कुछ पता नहीं है। तो जंगल का राज होगा दुनिया में और होता है। यह हमने देखा है। अपना उपभोग ही प्रमुख है। बाकी लोगों का क्या होगा इसकी चिंता मत करो।

इसलिए विकास अमर्याद होता है तो पर्यावरण की खराबी होती है। ये जो सारी समस्या आज दुनिया में दिखती है। दुनिया में कलह दिखता है। पहले महायुद्ध युद्ध के बाद लीग ऑफ नेशंस बनी। दूसरा महायुद्ध फिर भी हुआ। यूएन बनी। तीसरा महायुद्ध सीधा वैसे नहीं होगा।

लेकिन नहीं चल रहा है आज ऐसा हम नहीं कह सकते दुनिया में अशांति है कलह है कट्टरपन बढ़ गया है जीवन में किसी प्रकार की भद्रता किसी प्रकार का संस्कार ना हो ऐसी इच्छा रखने वाले लोग वो इस कट्टरता का प्रचार करते हैं। हमारे मत के विरोधी जो बोलेगा।

उसको हम कैंसिल कर देंगे। यह जो नए शब्द आए हैं ना वो होकीज़्म वगैरह-वगैरह। ये बहुत बड़ा संकट है। सब देशों पर है। अगली पीढ़ी पर है। सब देशों के अभिभावक लोग चिंतित है। बड़े लोग चिंतित है। क्यों? क्योंकि संबंध ही नहीं कुछ।

हम सब अलग-अलग हैं। जोड़ने वाला तत्व नहीं है। पर्यावरण का नाश और विकास मेल कैसे बैठा? जानते नहीं। इसलिए चर्चा तो बहुत होती है। उपाय भी बहुत बताए जाते हैं। लेकिन हो रहा है क्या? नहीं हो रहा है। क्योंकि उपाय तब होगा जब हम अपनी आवश्यकताओं पर संयम नहीं डालेंगे।

नहीं होगा। संयम करना पड़ेगा। और इसलिए इस एक अधूरी दृष्टि से चल रही दुनिया को 180 डिग्री अपने आउटलुक को बदलना पड़ेगा। और वो आउटलुक है धर्म। धर्म यानी रिलीजन नहीं। पूजा पाती खानपान वगैरह इन सब से परे धर्म है।

मोक्ष के तरफ ले जाने वाला रास्ता यानी रिलीजन है। परंतु सभी रिलीजंस पर उनको चलाने वाला रिलीजन ऑन द टॉप ऑफ रिलीजन वो धर्म है। उसमें विविधता का स्वीकार है। वो धर्म एक संतुलन सिखाता है। हमको भी जीना है। प्रकृति को भी जीना है।

मुझे भी जीना है। समाज को भी जीना है। सबकी सत्ता है। अति व्यक्तिवाद नहीं चाहिए। लेकिन व्यक्ति का महत्व है। व्यक्ति की सत्ता है। व्यक्ति की सत्ता है। समाज की सत्ता है। सृष्टि की सत्ता है। उनकी अपनी-अपनी जगह है। अपनी-अपनी मर्यादा है।

उसको पहचान कर संतुलित ढंग से जीवन जीना, संतुलित ढंग से जीवन जीना सिखाना वो जो नियम है संतुलन का वो धर्म है। धर्म यह बैलेंस है। वह किसी एक्सट्रिमिटी पर जाने नहीं देता। इसलिए धर्म को हमारे यहां कहते हैं मध्यम मार्ग द मिडिल वे।

यह सारा जो आचरण है अपने जीवन को धार्मिक जीवन बनाकर सारी दुनिया को देना। इसकी आवश्यकता है। आज की दुनिया संबंधों को तरस रही है। और संबंध आज भी जतन किए जाते हैं, देखे जाते हैं, माने जाते हैं। ऐसा दुनिया का सबसे आगे देश कौन सा है?

वह भारतवर्ष है। और ऐसा क्यों है? क्योंकि भारतवर्ष की यह परंपरा है। स्वामी विवेकानंद कहते थे एवरी नेशन हैज़ अ मैसेज टू डिलीवर। अ मिशन टू अकंप्लिश अ डेस्टिनी टू फुलफिल। भारत की डेस्टिनी क्या है? वह कहते थे भारत धर्मप्राण देश है।

दुनिया को समय-समय पर धर्म देना यह भारत का कर्तव्य है। उसके लिए भारत को तैयार करना पड़ेगा। क्योंकि विश्व की आज इन समस्याओं का निदान अगर देना है तो हमको धर्म तत्व का विचार किए बिना हमारा काम नहीं होगा। कई प्रकार के प्रश्न आते हैं।

आर्थिक उन्नति के प्रश्न आते हैं। लेकिन आर्थिक उन्नति पर्यावरण के लिए नाशक बनती है। आर्थिक उन्नति के कारण गरीब और अमीरी इनमें जो दूरी है वह बढ़ रही है सर्वत्र और आर्थिक उन्नति में दक्षिण के देश शिकायत करते हैं कि हमको लूटा जा रहा है।

चर्चाएं होती है। उपाय सुझाए जाते हैं। कुछ लीपापोती के जैसे उपाय हो भी जाते हैं। परंतु समस्याएं गई नहीं है। इसकी चर्चा बहुत हो रही है इन सब बातों की। शांति की चर्चा हो रही, पर्यावरण की चर्चा हो रही। उदारता की चर्चा हो रही।

उपाय भी बहुत सुझाए जा रहे हैं। अच्छे-अच्छे लोगों ने इसमें काम किया है। परंतु रिजल्ट इज फार अवे एंड गोइंग फार अवे। क्योंकि प्रामाणिकता से इसको सोचकर इसके लिए आवश्यक संयम त्याग जीवन में लाना। इसके लिए आवश्यक संतुलित विचार अपने बुद्धि का बताना।

बजाना बनाना यह काम करना पड़ेगा उसके लिए धर्म दृष्टि को जानना पड़ेगा यह धर्म ये यूनिवर्सल है वो हम भारत के लोग धर्म की बात करते हैं तो भारतीय खोज नहीं है सृष्टि के प्रारंभ से वो अस्तित्व में है। जैसे गुरुत्वाकर्षण है। गुरुत्वाकर्षण है आप मानो या आप मत मानो।

वह तो आपकी मर्जी है। फिर गुरुत्वाकर्षण पहचान कर मानकर चलेंगे तो बहुत बातें आपकी सरल हो जाएगी। नहीं मानेंगे तो आपको ही ठोकर लगेगी। ऐसे एक छोटे से कण का विस्फोट होके इतना सारा विश्व बना। उसकी जो गति है उसको पहचान कर उसको ठीक से चलाने वाला।

जो एक प्राकृतिक नियम है वह धर्म है उसको पहचान कर अपने जीवन में एक अनुशासन लाना पड़ता है संयम लाना पड़ता है त्याग लाना पड़ता है और इसलिए यह धर्म विश्व धर्म है हिंदू समाज संगठित होगा तो क्यों होगा विश्व धर्म प्रकाशन विश्व शांति प्रवर्तक।

विश्व शांति का प्रवर्तन करने वाला विश्व धर्म दुनिया को देने के लिए धर्म सर्वत्र जाना चाहिए। इसका मतलब सब जगह जाकर कन्वर्शन नहीं करना है। धर्म में कन्वर्शन होता नहीं। धर्म एक सत्य तत्व है जिसके आधार पर सब चलता है। जिसके आधार पर सब चलता है वही धर्म है।

उसको स्वभाव कहते हैं। उसको कर्तव्य कहते हैं। और पानी का धर्म है बहना। अग्नि का धर्म है जलाना। ऐसा हम कहते हैं। तो एक प्राकृतिक गति जो है उसको पहचान के उसके आधार पर पुनरचना मनुष्य जीवन की करनी पड़ेगी। वो प्राकृतिक गति पहचान कर चलना यानी धर्म से चलना है।

इस धर्म जीवन को देना है और बाय नॉट बाय प्रीचिंग और कन्वर्शन नॉट बाय प्रीचिंग नॉट बाय कन्वर्शन बाय एग्जांपल बाय प्रैक्टिस। और इसलिए भारतवर्ष का जो लाइफ मिशन है वह ऐसा जीवन जीना है ऐसा मॉडल खड़ा करना है जिसका अनुकरण विश्व कर सके।

अपनेपन प्रकृति के आधार पर अपनेपन वैरायटी में उसका पुनरुत्पादन कर सके पुनर्निर्माण कर सके मुझे याद आता है 91 में मैंने लक्ष्मण राव भिड़े जी जो उस समय हमारे क्षेत्र के भी प्रचारक थे। उनका एक बौद्धिक वर्ग सुना एक संघ शिक्षा वर्ग के उद्घाटन में।

तो भारत के बाहर रहने वाले लोग थे। उनका था वर्ग। तो उन्होंने उनको कहा कि देखो सब जवान लोग थे। बिलो 30। उनको कहा कि यह बाहर जो हिंदू संगठन का काम चलता है उसमें आपकी यह तीसरी पीढ़ी है। पहली पीढ़ी ने यह दिखा दिया कि संघ की शाखा सब जगह चल सकती है।

जहाज पर शुरू हुई और आज विदेशों में संघ के स्वयंसेवक वहां के हिंदुओं को संगठित करने का काम अलग-अलग संगठनों के माध्यम से कर रहे हैं। यह शाखा पद्धति ही लेकर चलते हैं। वह सब जगह अच्छा जीवन उत्पन्न कर सकती है। दूसरा उन्होंने कहा कि दूसरी पीढ़ी ने यह सिद्ध किया।

कि संघ के स्वयंसेवक बनने के बाद शाखा ट्रेनिंग है उससे मनुष्य अतिरेकी उपभोग व्यसन आदि आदि बुरी आदतों से दूर रहता है। उसका परिवार अपने प्रकृति के अनुसार चल सकता है। उन्होंने कहा आपकी तीसरी पीढ़ी आपके कंधे पर यह दायित्व आ रहा है अब कि आपको ऐसा संघ वहां वहां अपने देश का खड़ा करना है।

जिसको देख के उस देश के वासी जो है वह कहेंगे हमारा ऐसा एक आरएसएस होना चाहिए और अपने मूल पर खड़े होकर अपने प्रकृति के आधार पर अपने परिस्थिति और प्रकृति के अनुसार वह अपने देश का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बनाएं। यह प्रोसेस होगा और मुझे बड़ा आनंद है।

मैं समझता था एक थ्योराइजेशन है। कहां होगा लेकिन पिछले बार हमारा संघ शिक्षा वर्ग नागपुर का देखने के लिए कुछ लोग आए थे। उन्होंने जाते समय ये कहा हमारा भी एक आरएसएस होना चाहिए। वो सब देख के। [प्रशंसा] यह भारत को करना है। भारत को करना है क्योंकि भारत उस प्रकृति में अभी भी चलता है।

भारत ने सदा अपने नुकसान की अनदेखी करते हुए संयम बरता है। अपने नुकसान की अनदेखी करते हुए मदद की है। जिन्होंने नुकसान किया उनको भी संकट में मदद की है। व्यक्ति का अहंकार उसके कारण शत्रुता बनती है। राष्ट्रों के अहंकार के कारण शत्रुता राष्ट्रों की बनती है।

और कायम रहती है। उस अहंकार के परे हिंदुस्तान है। लेकिन व्यक्ति जीवन से लेकर तो पर्यावरण तक सारी बातों में कैसा रास्ता हो यह दिखाने के लिए भारत के समाज को अपना उदाहरण पेश करना पड़ेगा। अब यह बात 40 साल पहले भी हमारे द्वितीय सरसंघचालक पूजनीय गुरु जी उनके भाषणों में कई बार आई है।

रज्जू भैया सरसंघचालक थे। उसके बाद उन्होंने सुदर्शन जी को सरसंघचालक बनाया। उसके पहले एक दो प्रति सभा पहले उनका प्रति सभा में उन्होंने कहा था कि अब हमको विश्व की बात करनी चाहिए। तो विचार तो पहले से था। परंतु यह विचार बोलने में तो था हमारे लेकिन हम कहते किसी को।

आज जो मैं बोल रहा हूं वो उस समय अगर मैं बोलता एक तो वो बुलाने से आप आते नहीं क्योंकि हमारी वो स्थिति नहीं थी और आकर भी आप सुनते नहीं। अगर सुनते तो कहते कि ये कुछ सपना देख रहे हैं। ये होने वाला है नहीं। भारत की भी वैसी स्थिति नहीं थी।

आज है आज भारत की वैसी स्थिति है आज संघ की ऐसी स्थिति है जो मैंने कहा अनुकूलता है क्यों है सारा समाज मानता है विचार को मानता होगा नहीं मानता होगा परंतु हमारी साख को मानता है उसका विश्वास है और इसलिए हम कुछ बात कहते हैं तो समाज सुनता है।

और इसलिए 100 साल पूरे हो रहे हैं। आगे का पड़ाव क्या है? तो आगे का यह पड़ाव रहेगा हमारा कि जो हम संघ में कर रहे हैं वह सारे समाज में हो। चरित्र निर्माण का काम, देशभक्ति जगाने का काम और सारे समाज में हो नहीं रहा ऐसा नहीं है।

करने वाले लोग हैं। यही काम अन्य पद्धति से करने वाले लोग हैं। व्यक्ति शाह करने वाले लोग हैं। संगठन भी है। उत्तम चरित्र संपन्न जीवन निर्माण करना अपने उदाहरण से। ऐसा जीवन जीने वाले व्यक्ति है। यह है सामने नहीं आए। जो हम सुनते हैं, जो हम पढ़ते हैं, जो हम देखते हैं, वो क्या होता है?

कभी-कभी एयरपोर्ट पर बैठने का मौका होता है। टीवी पर वह आता है। क्या हाफ मिनट एक-एक न्यूज़ 100 न्यूज़ लगातार उसमें 80% होती है। यह घर जल गया। वहां बच्चा मर गया। यहां एक्सीडेंट हो गया। इसने उसको मारा। उसने इसको मारा। यही सब होता है।

अब ये न्यूज़ है। कुत्ता आदमी को काटे तो न्यूज़ नहीं है। आदमी काटे तो न्यूज़ है। तो न्यूज़ वही आती है। हमको लगता है कि बहुत खराब हो रहा है। बहुत खराब हो रहा है। खराब तो हो रहा है। ये जो सारे सात पापों के संकट है भारत सहित सब पर है।

और सबको चिंता करनी पड़ेगी। परंतु भारत में आज जितना बुरा दिखता है उससे 40 गुना ज्यादा अच्छा समाज में है। कोई केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर भारत का मूल्यांकन करेगा तो वो गलत ही होगा। यह हम प्रत्यक्ष जानते हैं मिलते हैं हमको लोग।

तो अपना कुछ बिना लाभ के सेवा कर रहे हैं। गरीब लोग सेवा कर रहे हैं। अरे भाई तुम्हारे अपने खाने के लाले ये क्यों करता है तू? पूछा मैंने एक को प्राइमरी टीचर था। नौकरी छोड़ दी। उसकी पत्नी नौकरी करके घर चलाती थी। और यह क्या करता था?

रास्ते पर कोई अनाथ मिला। किसी भी आयु का हो उसको घर में ले आता था और वह अच्छा बन जाए अथवा वह समाप्त हो जाए तब तक उसकी सेवा करता था। हमने उनको पूछा कि आप तो लोअर इकोनॉमिक ग्रुप में हो आय की दृष्टि से कैसे चलता और 40 लोग उसके घर में पड़े थे उस दिन।

तो ये क्यों करते हो? तो बोले मुझे अच्छा लगता है। मुझे समाधान मिलता है। ऐसे बहुत लोग हैं भारत में। धर्म का व्याख्यान मैं यहां दे रहा हूं। लेकिन धर्म को जीने वाले गांव-गांव में मिलेंगे आपको। शहरों की झुग्गी झोपड़ियों में भी मिलेंगे।

यह सारा जो भारत का बल है जो आज बिखरा है लेकिन सक्रिय है उसको एक पूरक रचना में बांधना है और इसलिए क्या होना चाहिए 100 साल के बाद अब जो मैं कहूंगा वह तो पहले संघ में अप्रूव होना पड़ेगा वो संघ की प्रतिनिधि सभा तय करती है मैं तय नहीं करता हूं।

लेकिन उनके सामने क्या है? यह मैं बता सकता हूं। उनके विचार में क्या है? यह अगर हमको करना है तो हमको समाज के कोने-कोने में पहुंचना पड़ेगा। कोई व्यक्ति, कोई कुटुंब अनटच्ड ना रहे। ऐसा हमारे कार्य का विस्तार हमको करना पड़ेगा। भौगोलिक दृष्टि से सब तरफ।

एक-एक गांव में, एक-एक गली मोहल्ले में, एक-एक घर तक समाज के सब वर्गों में और समाज के सब स्तरों में गरीबी रेखा के नीचे वालों से लेकर तो अमीरी रेखा के ऊपर वालों तक और अपने समाज की इतनी विविधताएं जाति पंथ संप्रदाय सबकी उन सब तक।

यह विस्तार द्रुत गति से करना जल्दी से जल्दी संपूर्ण समाज में समाज को संगठित करने वाला संघ का उपकरण शाखा पहुंच जाए। वह शाखाएं अपनेपन बस्ती की अपनेप गांव की संभाल करें इस दृष्टि से। ऐसा एक संगठन का जाल जल्दी से जल्दी उत्पन्न करना यह पहली बात रहेगी।

उसी के भरोसे सब होगा। और यह जो सज्जन शक्ति बिखरी पड़ी है समाज के सब वर्गों में सब स्तरों में है उनको संपर्कित करना हम उनसे संपर्क करेंगे और उनका आपस में संपर्क भी बनाएंगे ताकि वह लोग करें काम अपना-अपना काम करें अपनेप रीति से करेंगे।

संघ में आकर ही उनको करना चाहिए ऐसा नहीं है केवल नेटवर्किंग रखें उनको पता रहे कि और भी लोग हैं और भी लोग हैं। यह पता रहने से और उत्साह बढ़ता है। आदमी काम करता है। और इन सबका करना परस्पर पूरक हो जाए। बाधक तो होता ही नहीं।

अच्छा ही काम करते हैं सब लोग। लेकिन कॉन्शियसली एक कॉम्प्लीमेंटेशन उनका हो जाए। उनमें कोऑर्डिनेशन आ जाए ताकि सब लोग मिलकर समाज के परिवर्तन के काम में अग्रसर हो जाए। दूसरी बात है कि यह होना है तो इतना बड़ा समाज है। इतनी सारी विविधताएं हैं।

और जैसा मैंने कहा कि सृष्टि की विविधताएं परस्पर विरोधी भी होती है। किसी कारण टकराव भी पैदा होते हैं। तो समाज में अविश्वास और दुर्भावना है तो समाज इकट्ठा होकर कोई काम डिलीवर नहीं कर सकता। इतना बड़ा काम समाज को करना है। तो उसको तैयार होना पड़ेगा।

उसके लिए आपस में सद्भावना अतिशय आवश्यक काम है। तो हम प्रयास करेंगे कि समाज के ऐसे सब जो वर्ग हैं उनको चलाने वाले लोग होते हैं। उनके मुखिया लोग होते हैं। उनके ओपिनियन मेकर्स होते हैं। ऐसे लोगों में परस्पर नित्य संबंध बना रहे।

और परस्पर नित्य संबंध के चलते वह मिलते रहे और मिलकर वह तीन काम करें। जिस वर्ग से वह संबंधित है उस वर्ग की उन्नति भौतिक और नैतिक दोनों प्रकार की रूढ़ कुरीतियों से उनकी मुक्ति उनके जीवन में सुधार उसके साथ-साथ उनको यह एहसास हो।

सबको अपने वर्ग के लोगों को कि हमारा एक वर्ग है समाज का हमारी एक विशिष्टता है। लेकिन उसके बावजूद हम इस पूरे समाज के अंग हैं। पार्ट एंड पार्सल यह पूरा समाज रहेगा तो हमारा अस्तित्व रहेगा और हमारा बढ़ना पूरे समाज के बढ़ने का कारण होना चाहिए।

यह एक समझदारी उनकी बने। यह पहला विषय है। दूसरा विषय है कि ऐसे सब वर्गों के लोग मिलकर जब बात करेंगे तो सोचेंगे कि जिस भौगोलिक कार्य क्षेत्र में हम हैं उस कार्य क्षेत्र में अगर कोई अभाव है और अगर कोई समस्या है तो उस समस्या का निरसन और अभाव की पूर्ति।

हम अपने बलबूते कितनी कैसी कर सकते हैं उसको तय करना और अगले मिलने के पहले उसको पूरा करना। तो जो पहली बात कही मैंने कि हम पूरे समाज के अंग है। यह भाव और पक्का होगा। वह अनुभूत बात हो जाएगी। और तीसरी बात है कि हम सब लोग मिलते हैं आपस में।

हम वर्गों में कोई दुर्बल वर्ग अगर है तो उसके लिए हम सब मिलकर अगली बैठक के पहले क्या करेंगे? क्या आवश्यक है? वह हमारे बलबूते कितना और कैसा कर सकते हैं? वह तय करके उसको पूरा करना। यह एक समाज के स्वभाव में आ जाए। वह एक सहज स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाए।

इसका प्रयास हम लोग करेंगे। सद्भावना सकारात्मकता की बात आती है। सकारात्मकता भी चाहिए क्योंकि सारा सुन के समाज भी कभी-कभी निराश हो जाता है। निराशा नहीं आनी चाहिए। इन दोनों बातों को जब सोचते हैं तो और एक विषय आता है कि अपने देश में अपने समाज के इतने सारे परंपरा से ही वर्ग है।

और बाहर से भी वर्ग आए हैं। विशेषकर रिलीजियस वर्ग है तो बाहर से विचारधाराएं आई आक्रमण के नाते आई लेकिन किसी कारण उनको स्वीकार जिन्होंने किया वह तो यहीं के हैं। और आज है यही है तो विचारधारा भले रहे विदेशी क्योंकि हिंदू विचार तो वसुधैव कुटुंबकम वाला होता है।

हर रास्ते को अच्छा मानता है। बोलने की बात नहीं है। संतों ने साधना करके दिखा दिया। रामकृष्ण परमहंस ने और इस्लाम की ईसाइयत की भी साधना की और कह दिया कि वो भी वहीं पहुंचते हैं। जो तो मत तो पथ। यह समाज का सामान्य स्वभाव ऐसे विचार करने का है।

लेकिन जो दूरियां बनी है वह दूरियां पाटने के लिए दोनों ओर से कुछ करने की आवश्यकता है। वो होने के लिए कुछ संवाद बने। परस्पर दर्द समझ ले। परस्पर के प्रति दूरी विश्वास दूरी बनी है। अविश्वास जो है उसको पाटकर निशंक होकर सब लोग एक देश के एक समाज के।

एक राष्ट्र के अंग के नाते अपनी विविधताओं के बावजूद समान पूर्वजों के अंश समान संस्कृति की विरासतदार बनकर आगे बढ़े। यह तो सद्भावना और सकारात्मकता के लिए अत्यंत आवश्यक बात है। उसमें भी हम संभलकर सोच समझ के एक-एक कदम आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं।

ये सब संयोजकों के विचार में है। और अभी मैंने इतना दिया कि धर्म दृष्टि लेके ऐसा विकास होगा वैसा तो भाई होगा यह थ्योरी ठीक है। उदाहरण दिखा दूं। तो हम जो बोल रहे हैं उसके आधार पर हमको चिंतन करना पड़ेगा बहुत। क्योंकि ये दृष्टि तो एक जनरल ठीक है।

उसको अब अप्लाई करना है। तो परिस्थितियां क्या है? समय क्या है? देशकाल परिस्थिति के अनुसार क्या बदलना है? क्या नहीं बदलना है? यह सब सोच के आज के परिस्थिति में आज के समाज में यह कैसे हो सकता है? इसके उदाहरण खड़े करने पड़ेंगे। यह अपने देश को भी करना पड़ेगा राष्ट्रीय स्तर पर।

क्योंकि अगर विश्व को यह रास्ता मिलना है तो एक पूरा देश इन तत्वों के आधार पर कैसे चल सकता है? इन मूल्यों को कायम रख के उसका देशकाल परिस्थिति रूप प्रतिमान क्या होगा? अर्थनीति की बात आती है। हम कहते हैं कि हमारी अर्थनीति तो विकेंद्रित उत्पादन वाली होगी।

अबंडेंट उत्पादन वाली होगी। मास प्रोडक्शन नहीं प्रोडक्शन बाय मासेस होगा। लेस एनर्जी कंजमशन। पर्यावरण के लिए हितकारी होगी। रोजगार देने वाली होगी। मानवीय होगी। तकनीकी भी होगी तो मानवीय होगी। होगी होगी ठीक है लेकिन अभी बताओ इसके प्रतिमान खड़े करने में स्वयंसेवक लगे हैं पहले से।

पूरे देश के लिए कैसा हो सकता है इसका पहले चिंतन होना चाहिए उस चिंतन में केवल संघ वाले रहे ऐसा नहीं है बहुत सारे आर्थिक दृष्टि से प्रवीण लोग हैं जानने वाले लोग हैं। अलग-अलग मत होते ही हैं। इश्यूज पर मत हमेशा अलग-अलग होते हैं।

मूल्यों इन मूल्यों के बारे में किसी का मतभेद नहीं रहता है। लेकिन इसका एप्लीकेशन कैसा करें? इसके हजार तरीके हो सकते हैं। हजार मत हो सकते हैं। उन सब ने बैठकर इसकी चर्चा चलाकर एक प्रतिमान खड़ा करना जो व्यावहारिक है और जो एक रास्ता दिखाएगा।

यह राष्ट्रीय स्तर पर भी होने की बात है। स्थानीय स्तर पर भी होने की बात है। छोटे-छोटे स्थानीय प्रतिमान खड़े करने में तो अब स्वयंसेवक आगे बढ़े हैं। यश है। अब केवल स्वयंसेवक नहीं और भी लोगों ने ऐसे प्रतिमान खड़े किए। उन सब से नेटवर्किंग करना, एक्सचेंज करना यह सब चल रहा है।

परंतु इन सबके एक सुसूत्रता के आधार पर पूरे देश का ऐसा चिंतन बनाना, एक प्रतिमान प्रस्तुत करना इसकी आवश्यकता है। इस दिशा में हमको आगे बढ़ना पड़ेगा। हम लोग आगे आगे बढ़ेंगे। फिर ये हम बोल रहे हैं लेकिन ये बात समझ में तब आएगी क्योंकि अपरिचित आदमी बोलता है तो लोग सोचते हैं।

बोल तो ठीक रहा है इसके अंदर क्या है। और अपरिचित आदमी बोलता है तो परिचय तो होता है। जैसे मंच से मेरा परिचय हुआ। अब उन्होंने जो बताया वह आपको पता है लेकिन मैं कैसा हूं यह आपको अभी पता नहीं है। वो आप मिलेंगे 10 बार मिलेंगे इस स्थिति में क्या-क्या ऐसा सब देखेंगे।

तब आपको पता चलेगा कई सालों के बाद तो बताया जाता है लेकिन बताया जो जाता है उसका विचार हो जिनको सुनाते हैं उनसे इसके लिए भी एक संबंधों की स्थिति आवश्यक है। तो इस विचार के आधार पर सर्वत्र संपर्क होना पड़ेगा और सबसे पहले पड़ोसी देशों में होना पड़ेगा।

भारत के अधिकांश और पड़ोसी देश पहले कभी भारत ही थे। लोग वही है। जग्राफी वही है। नदियां वही है, जंगल वही है। सब कुछ वही है। बस नक्शे पर रेखाएं खींची गई। तो पहला तो कर्तव्य बनता है कि यह जो अपने ही है वह अपनत्व की भावना से जुड़ जाए।

देश रहेंगे अलग-अलग पहले भी थे। लेकिन जो विरासत में मूल्य मिले हैं उनके आधार पर इन सब की प्रगति हो। इन सब की प्रगति हो। इसमें भारत का अवदान हो। कुछ योगदान हो। सबसे बड़ा भारत है और इसलिए उनको जोड़ना, उनके यहां ध्यान देना, वहां शांति रहे।

वहां स्थिरता रहे, वहां विकास हो, वहां का पर्यावरण ठीक रहे। वहां लोगों में संस्कार हो। पंथ संप्रदाय अलग-अलग होंगे। परंतु संस्कार के बारे में किसका मतभेद है क्या? ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसके लिए हम प्रयास करते हैं तो सभी जाति वर्ग के सभी पंथ संप्रदायों के लोग इसमें सहमत है।

ये सब हो इस दृष्टि से जिसको आज की भाषा में आउट रीच कहते हैं। हम कहते हैं संपर्क जीवंत संपर्क। मनुष्यों का मनुष्यों से मिलना। हृदय से हृदय की बात करना। मैन टू मैन कांटेक्ट आर टू हार्ट टॉक यह शुरू होना चाहिए। उसमें से जो विकसित होगा उस वातावरण के चलते यह संबंध परस्पर पूरक बनेंगे।

अच्छे बनेंगे। विश्व के लिए उपकारक बनेंगे। इस दृष्टि से हम क्या कर सकते हैं? यह भी संयोजकों के मन में चलता है। अब यह सब करना है तो मुख्यतः जो भारतवर्ष आज है उसके समाज की गुणवत्ता काम करेगी। उसका जो चित्र दिखेगा नहीं तो हम यह भाषण तो हम कर सकते हैं।

लेकिन लोग कहेंगे आपके यहां क्या है? आपके यहां कैसा है? तो शुरू तो अपने घर से करनी पड़ेगी। इसलिए इस हमारे विस्तार के आधार पर हमने सोचा है कि एक संगठित कार्य शक्ति खड़ी हो और संगठित कार्य शक्ति के आधार पर समाज का परिवर्तन हो।

समाज का परिवर्तन यानी व्यवस्थाओं का परिवर्तन नहीं होता है। समाज का परिवर्तन यानी समाज के आचरण का परिवर्तन होता है। समाज की संगठित अवस्था का निर्माण होता है। उसके आधार पर व्यवस्था बदलती है। नहीं तो व्यवस्था बदलती नहीं है। कोई व्यवस्था अपने आप को बदलती नहीं है।

समाज तब बदल सकता है जब वो गुण संपन्न हो, संगठित हो। उसके सामने एक स्पष्ट दृष्टि हो। उसका आचरण वैसा हो। तो आचरण से बात शुरू करनी है। तो इस आचरण में परिवर्तन लाने वाले कुछ काम हमने शुरू किए हैं। आपके कान पर आए भी होंगे।

लेकिन फिर एक बार मैं उल्लेख करता हूं क्योंकि अब हम स्वयंसेवक और उनके घरों में यह काम हो उसके आधार पर अड़ोस पड़ोस के समाज को उसमें सहभागी करते हुए समाज में यह प्रवर्तित हो। उन पांच कामों को हम कहते हैं पंच परिवर्तन। बहुत सरल काम है।

कोई साधन नहीं चाहिए, कुछ नहीं चाहिए। करने की इच्छा चाहिए। करने कैसा है? उसका एक उदाहरण चाहिए। उदाहरण स्वयंसेवक बने। एकदम 100% नहीं बन सकते। 100% बनते तक रुक भी नहीं सकते क्योंकि अर्जेंट नीड है। इसलिए स्वयंसेवक पांच कदम आगे जाए। आज है।

और समाज को हम साथ में बुलाए। का एक फायदा है। स्वयंसेवक 10,000 कदम आगे जाकर समाज को बुलाएंगे समाज आएगा नहीं। हमारे बस की बात नहीं कहेगा। लेकिन पांच कदम आ गया तो आसानी से आता है। ऐसे ये पांच काम है। आपको पता है जो सामाजिक पापों की बात है।

संस्कारहीनता के कारण संबंधों के अज्ञानता के कारण जो होती है उसको ठीक करने के लिए कुटुंब प्रबोधन बच्चे विशेषकर नई पीढ़ी पढ़ी लिखी उसका माइंडसेट इंडिविजुअलिस्टिक बनते चला जा रहा है। उसका मोबाइल क्या कर रहा है वो मोबाइल में देखने के लिए परमिशन लेनी पड़ती है आजकल।

ऐसा है? सब प्राइवेट रहता है। वो क्या कर रहा है वो बताता नहीं। हम पूछेंगे तो लिमिटेड बताता है। ज्यादा पूछेंगे तो उसको लगता है कि यह टरनी है। जो उसको फीड किया गया है वैसा कर रहे हैं। अब यह संबंधहीनता की ओर जाने वाला रास्ता है।

जिसके दुष्परिणाम हम देख रहे हैं सर्वत्र। उसको ठीक करना है तो बचपन से अपने परिवार में उसको इसका ज्ञान होना चाहिए। और इसलिए परिवार के सब लोगों ने सप्ताह में एक बार बैठना निश्चित समय पर घर पर रहना श्रद्धानुसार भजन करना घर में बनाया हुआ भोजन मीन में निकाले बिना करना।

और उसके बाद तीन-चार घंटा गपशप करना डिक्टेशन कुछ नहीं देना गपशप करना और उसमें हम कौन है हमारे पूर्वज कौन थे हमारी कुल रीति क्या है अपने घर की रीति क्या है क्या भद्र है क्या अभद्र है? यह जो चलता आया है उसमें आज के समय में क्या-क्या टिक सकता है?

क्या-क्या हो सकता है? क्या-क्या आवश्यक है? जो बदलना चाहिए वो क्या है? इसके आधार पर अपने घर में आज कैसा है? उसको कैसा होना चाहिए? इसकी कुछ सहमति बनी तो उतनी बात को लागू करना। हर हफ्ते बैठना। सबने बैठना। दूध पीता बच्चा भी है उसको कुछ समझ में नहीं आएगा।

पहले वो वहां रहे। श्रवण संस्कार भी एक होता है। माता-पिता में ध्यान नहीं रखना कि जो अपने को चाहिए वो होना है तो पहले खुद को वैसा बनना पड़ेगा। बच्चे इस चर्चा में प्रश्न पूछेंगे। उत्तर देने के लिए अपनी तैयारी चाहिए। लेकिन बैठना गपशप करना।

दूसरी बात अपना देश, अपना राष्ट्र हमारा सबका मिलकर एक सत्व है। उसका परिचय हमारे पूर्वजों के आदर्श क्या थे? यह जो सारी दृष्टि है वो तो हमारी परंपरा की दृष्टि है। उसका काल सुसंगत विवरण इतिहास आदि बताना, अच्छी कहानियां बताना। हमारे घर में हम इसमें से क्या लागू कर सकते हैं?

इसकी सहमति बनाना और लागू करना। और तीसरी बात है कि रोज मैं मेरे लिए कमाता हूं। मेरे परिवार के लिए कमाता हूं। खर्चा भी करता हूं। रोज मेरा समय भी मैं मेरे लिए परिवार के लिए खर्चा करता हूं। मैं और मेरा परिवार जिसके कारण है उस अपने राष्ट्र के लिए समाज के लिए धर्म के लिए हम क्या करते हैं?

रोज। छोटे-छोटे काम है। बच्चे भी कर सकते हैं। ऐसे काम है। नौवीं में पढ़ने वाली लड़की वो अपने कॉलोनी में जो काम करने के लिए कर्मचारी आते हैं उनके बच्चों को वो सिखाती है। छोटा बच्चा भी कर सकता है। घर में एक पौधा लगाना उसकी चिंता करना।

छोटा बच्चा भी कर सकता है। सोचना क्या-क्या हो सकता है? कौन क्या कर सकता है? कौन कितना समय देता है समाज के लिए? यह चर्चा करना और चर्चा में से सहमति बनाना, सहमति लागू करना। जब ऐसे काम बच्चे करने लगेंगे तो अपने आप उनको संबंधों का महत्व ध्यान में आएगा।

भाषण से नहीं आएगा। अनुभूति देनी पड़ेगी। अनुभूति देनी पड़ेगी। कभी जाते हैं घूमने के लिए तो जैसे सिंगापुर जाते हैं, पेरिस जाते हैं वैसे कभी ले जाओ कुंभलगढ़ में ले जाओ। कारगिल की सीमा दिखा के लाओ। अपने शहर में कोई झुग्गी झोपड़ी है वहां लोग रहते कैसे रहते दिखा के लाओ।

सेंसिटाइज करने से बच्चे इन बातों को बहुत मूलतः सत्प्रवृत्त होते हैं। वो इधर ही जाएंगे। 12 साल तक उसकी अपने घर में एक मेंटल पोजीशन बन जाती है। वह बननी चाहिए। यह है कुटुंब प्रबोधन। दूसरा जो सबको समझ में आता है और तुरंत लोग उसका अनुकरण भी करते पकड़ लेते वो पर्यावरण।

अब नीतिगत बातें तो बड़ी है। उसको बदलने में बहुत समय लगेगा। इतने आगे बढ़ गए हम लोग कि अगर तुरंत मुड़ेंगे तो गाड़ी उलट जाएगी। वह तो एक लंबा घुमावदार आर्क ले धीरे-धीरे घूमना पड़ेगा। लेकिन अपने जीवन में कुछ करने की छोटी बातें तो हम कर सकते हैं।

अभी तीन बताई है। पानी बचाओ, सिंगल यूज़ प्लास्टिक हटाओ और हरियाली पेड़ लगाओ। और उत्साह से लोग करते हैं। इससे मनुष्यों में एक मानवीयता भी आती है। पर्यावरण का सुधार भी होता है। इसके सामूहिक उपक्रम चलते हैं उसमें भाग लेना। अपने घर में यह करना।

तीसरी बात है सामाजिक समरसता। जो करने में कठिन है लेकिन करनी ही पड़ेगी। समानता समता की बात करना तो आसान है। लेकिन यह विषमता कहां है? व्यवस्थाएं विषमता वाली क्यों बन जाती है? मनुष्य बनाता है। ये विषमता मनुष्य के मन में है।

मुझे किसी मनुष्य को देखकर या उसका नाम सुनकर अच्छा यह जाती होगी ऐसा लगता है। यह गड़बड़ है। मनुष्य को देखकर मैं एक मनुष्य को देख रहा हूं। ऐसा मुझे नहीं लगता। मैं एक जाति वाले को देख रहा हूं। ऐसा मुझे लगता है।

क्लास वन है कि क्लास फोर है। ऐसा मुझे लगता है। इसको मन से जाना चाहिए। तो इसके लिए कुछ व्यवहार करना पड़ेगा। और इसलिए जिस इलाके में हम रहते हैं, हमारा संचार है, जाना आना है, उठना बैठना है, कार्यालय हो, अपना ऑफिस हो।

अपनी बस्ती हो, वहां जितने प्रकार के लोग रहते हैं, हम तो पूरे समाज को एक ही मानते हैं। लेकिन लोग उसमें प्रकार मानते हैं। जातपात मानते हैं। सब बातें मानते हैं। जातिगत विषमता का की समस्या है। सब प्रकार के लोगों में अपने मित्र होने चाहिए।

व्यक्तिगत और उनके कुटुंबों में अपने कुटुंब की मित्रता होनी चाहिए। उनका घर में आना जाना उठना बैठना पर्व त्योहारों पर सुखदुख में सहभागी होना जैसे मित्रों का चलता है वैसे हमारा और हमारे परिवार का सब प्रकार के परिवारों में सब प्रकार के लोगों में होना चाहिए।

आज शुरू करो तीन-चार साल में पूरा बन जाएगा। लेकिन शुरू करना पड़ेगा। सबको करना पड़ेगा और जहां अपना एक ऐसा समूह बन जाता है उसकी साख है वो कहेगा तो बातें होती है वहां पर मंदिर पानी श्मशान में कोई भेद नहीं होना चाहिए वो सबके लिए है।

मंदिर मंदिर के भक्तों के लिए है भक्त किस जात का है वगैरह नहीं पूछा जाता पानी सब मनुष्यों के लिए उसमें भेद नहीं होता। मरने के बाद भी श्मशान में भेद क्यों होना चाहिए? यह करना अपने गांव में अपनी बस्ती में और चौथी बात है कि आत्मनिर्भरता।

सब बातों की कुंजी है। विकास भी करना है। तो हर बात में अपना देश आत्मनिर्भर होना चाहिए। अपने घर से शुरू करना। जब यह स्वदेशी की बात करते हैं तो लगता है कि विदेशों से संबंध नहीं रहेंगे व्यापक ऐसा नहीं है। आत्मनिर्भर होना यानी बाकी लोगों को बंद करना नहीं है।

आत्मनिर्भर होना है। लेकिन दुनिया परस्पर निर्भरता पर चलती है। कुटुंब भी परस्पर निर्भरता पर चलता है। और इसलिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार तो चलेगा और उसमें लेनदेन होगी। बस इसमें दबाव नहीं होना चाहिए। स्वेच्छा होनी चाहिए। और इसलिए स्वदेशी का पालन करना।

यानी क्या है? जो घर में बनता है वो बाहर से नहीं लाना। गर्मी के दिनों में आप अच्छा नींबू की शिकंजी बनाकर खा सकते हो। पी सकते हो। C कोला वगैरह क्यों लाना? या स्प्राइट भी बाहर का पेय क्यों लाना अपने घर का लाना।

पिज़्ज़ा वगैरह के घर में बहुत अच्छा भोजन मिलता है। पोषक भोजन मिलता है। उसके अच्छे परिणाम स्वास्थ्य पर होते हैं। सारे डॉक्टर लोग जानते हैं और बताते भी हैं। लेकिन बार-बार हां एक आध बार गए मजा करने के लिए पिज़्ज़ा खाया। चल सकता है।

उतना उसमें लचीलापन रखना चाहिए। लेकिन हर इतवार को बाहर जाकर खाना। क्यों खाना? ऐसा नहीं करना है। ऐसी कुछ बातें और जो अपने गांव में होता है बाहर से लाने से अपने गांव के रोजगार को मार पड़ती है। अपने गांव का खरीदो।

अपने राज्य में कार्य बनती है। वहीं से खरीदो। सस्ती मिलती है इसलिए बाहर के राज्य से क्यों खरीदते हो? हरियाणा से सस्ता पेट्रोल ऐसा बोर्ड मिलता है कभी-कभी। अरे भाई हम जहां के हैं वहां का खरीदो। क्योंकि उस पर पेट चलता है।

ऐसे ही अपने देश में जो बनता है वह बाहर से लाने की जरूरत नहीं है। जीवन आवश्यक है और अपने देश में नहीं बनता। बाहर से लेंगे। देश की नीति में स्वेच्छा से अंतरराष्ट्रीय व्यवहार होना चाहिए। दबाव में नहीं जाना चाहिए। [प्रशंसा] यह स्वदेशी है।

क्या लेना, कितना लेना, बाहर से इन्वेस्टमेंट लाना नहीं लाना ये इश्यूज है। उस उस समय के प्रश्न है। परंतु तत्व यह होना चाहिए। यह स्वदेशी है। और दूसरी भाषा बात है। अपने घर के चौखट के अंदर अपनी भाषा चाहिए। अपनी वेशभूषा चाहिए।

स्वभाषा स्वभूषा भाषा भूषा भजन भोजन अपने घर के अंदर अपना चाहिए। अपनी परंपरा का चाहिए। भ्रमण और भवन भी अपना भवन अपनी परंपरा से होना चाहिए। बहुत अच्छा घर बनाया और पूजा घर नहीं बनाया तो हिंदू परंपरा का घर नहीं होगा।

पूजाघर रहता है। अच्छे स्थान पर रहता है। नहीं पूजा घर बनाने को कहा तो कर तो सीढ़ी के नीचे तो त्रिकोणिक आता है ना उसमें बना दिया। ऐसा नहीं करना। ठीक से भाषा, भूषा, भजन, भवन, भ्रमण, भोजन। भ्रमण यानी वही मैंने कहा।

कि कुंभलगढ़ लेके जाओ लोगों को। जाओ पेरिस, सिंगापुर भी देखो। दुनिया देखनी चाहिए। लेकिन कुंभलगढ़ भी देखो और झुगी झोपड़ी भी देखो। अपने लोग हैं वहां रहने वाले। अपने बंधु हैं। कल हो सकता है उसमें से एक आधा अरबपति बने।

और अपने सामने बड़ी बिल्डिंग बनाएं। इस अपनत्व के साथ अपने घर के चौखट के अंदर अपना व्यवहार करना। ठीक है? फुलपमेंट में रहना पड़ता है। पाश्चात्य वेश में रहना पड़ता है। कोई विरोध नहीं। वैसे देखा जाए तो अपनावेश परावेश नहीं होता।

जो विधिवत कन्वीनिएंट है वो पहनना। परंतु हमको धोती पहनने आती ही नहीं। ऐसा नहीं होना चाहिए। हमारे देश के आबोहवा के अनुसार हमारे यह परंपरागत वेश बने हैं। कम से कम पर्व त्योहारों पर उसको पहनना चाहिए। यह स्वबोध है।

अपना हस्ताक्षर हम कर नहीं सकते। अपनी भाषा में छोटी बात है। बदल दो। अगर अंग्रेजी में करते हो तो। अपनी भाषा में करो। जहां आवश्यक है वहां अपनी भाषा के शब्द प्रयोग करो। यह वृत्ति है। स्व का बोध होने से जो आदमी बनता है स्व के आधार पर ही प्रगति होती है।

यह चौथा है और पांचवां है हर हालत में संविधान नियम कानून इसका पालन करके चलना। कोई भड़काऊ बात हो गई कानून हाथ में नहीं लेना उसने हमको चिढ़ाया उसमें हमारा अपमान किया उसने हमारे श्रद्धा को गाली दी इसलिए हम उसको ये नहीं ये है ना तो ये गुनाह है।

गुनाह है पुलिस में जाओ पुलिस कुछ करे इसके लिए थोड़ा सा छोटा सा आंदोलन करना पड़े करो तरीके हैं। ये सारे विरोध करने के तरीके हैं। अपवाद केवल एक है। अभी सामने प्राण पर ही संकट है। कुछ किया नहीं तो मारा ही देगा।

तब तो आत्म संरक्षण का अधिकार सबको है। परंतु ऐसा बहुत कम बार होता है। ऐसा एकाद मौका एकाधे की जिंदगी में आता है। तब की बात होती है। लेकिन सामान्य रूप से कुछ भी प्रोवोकेशन हुआ कि तुरंत टायर जलाओ, पत्थर फेंको। ये नहीं होना चाहिए।

हाथ में कानून लेके बात नहीं करनी चाहिए। इसका लाभ लेते हैं। उपद्रवकारी लोग इसका लाभ लेते हैं। हमको तोड़ने में इसका उपयोग करते हैं। और प्रोवोक नहीं होना और गैर कानूनी आचरण नहीं करना। अपने बिल समय पर भरना लाइसेंस आदि एक्सपायर होने के पहले रिन्यू करना।

ये सब अपने देश के लिए करने के काम है। दैनंदिन जीवन में देशभक्ति क्या होती है? एक जमाना था तब देश के लिए फांसी झूलना पड़ता था। तो हंसते-हंसते फांसी गए अपने पूर्वज। लेकिन आज देश के लिए 24 घंटा जीने की जरूरत है।

और वो जीना ऐसे होता है छोटी-छोटी बातों में भी समाज का देश का सबका ख्याल करके अपने आप को रखना। मैंने एक लोटा पानी डाला तो क्या होगा? अकाल पड़ा तो राजा ने कहा कि शिवजी का अभिषेक करो दूध से। सब लोग एक-एक लोटा दूध लेके आओ।

तो एक चतुर आदमी था। उसने सोचा सब लोग दूध डालेंगे। मैं एक लोटा पानी डालूंगा। किसको समझ में आएगा? तो गया देखता है तो सब पानी ही है वहां। क्योंकि सभी लोग अकलमंद थे। ऐसे विचार नहीं करना है। मेरे से शुरू होगा।

मेरे घर से शुरू होगा। समाज में जाएगा। समाज में जाएगा तो भारत में आएगा। भारत दिखेगा। तो फिर दुनिया देखेगी तो फिर हमारी इन बातों में कुछ दम है ऐसा उनको लगेगा। इस दिशा में समाज को अग्रेसर करने का काम करना हमारे संघ ने यह करना चाहिए।

हम इसको करेंगे। इस प्रकार की चर्चा स्वयंसेवकों में चल रही है। उस चर्चा के बाद निर्णय होगा और निर्णय में इतना लग रहा है लोगों को इसमें से कई बातें तो होगी। पंच परिवर्तन बात तो होगी ही होगी। लेकिन बाकी भी बातें मैंने की है।

उस दिशा में आज नहीं कल होना है। आज होना है कि नहीं उसका निर्णय हमारी प्रति सभा करेगी। हमारी सरकार आज ही बताएंगी। परंतु यह सब करना है क्योंकि भारत बने। हम रहे या ना रहे। भारत यह रहना चाहिए। यह मेरे लिए भी रहना चाहिए।

आपके लिए भी रहना चाहिए। यह भारत के अपने लिए भी चलना। ये दुनिया के लिए भी रहना चाहिए। क्योंकि इस धर्म को देने वाला दूसरा नहीं है। हमको देना पड़ेगा। ये हमारा काम है। अहंकार नहीं इसमें करना। हम कोई तिस्मार खा है।

सारी दुनिया को छड़ी लेके सिखाएंगे। यह विश्व गुरु पद नहीं है। विश्व गुरु पद है। अत्यंत विनम्रता से जाना। अपने आचरण से सिखाना एक बंगाली कविता में कहा है हिंदू कीर्ति सिंधु मति अमृत भांड हाथी बाहिरे विश्व तव वीर श।

तो आशीष मांगे हे भारत माता तुम्हारी कीर्ति से मथित यह पात्र लेकर बाहर विश्व में तुम्हारे जो लोग हैं तुम्हारे जो पुत्र है वह तुमको आशीर्वाद मांग तादेर मुखेर मधुमय बानी सुने थेमे जाए शोभा उनकी मधुर वाचा सुनकर विश्व के कला समाप्त हो रहे हैं।

श्री महादिनर महा इतिहास चित्त भोरिया ऐसा इतिहास जिस दिन बनेगा उसको चित्त भर के श्रवण करो भारत का यह विश्व में समय-समय पर अवदान होना यह ईश्वरीय योजना है उसके लायक हम सबको बनना है। अपने देश को बनाना है।

और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसीलिए है द इवोल्यूशन ऑफ लाइफ मिशन ऑफ हिंदू नेशन। और इसलिए यह किसी का है और किसी का नहीं ऐसा नहीं है। सबका है। मत मतांतर अनेक होते हैं। पार्टियां अनेक होती है। स्वार्थ अलग-अलग होते हैं।

इन सब से परे जाकर केवल और केवल देश का तेरा वैभव अमर रहे मा हम चार रहे ना रहे। इस प्रकार का विचार करके अपनी सारी योजना करके संपूर्ण समाज को ही संघ बनाने का ये काम है। संघ को ये अहंकार नहीं है।

संघ को ये चाहिए भी नहीं कि कल क्रेडिट बुक में लिखा जाए कि यह संघ के कारण हुआ। संघ चाहता है कि इस देश के समाज ने एक ऐसी छलांग लगाई, ऐसी छलांग दिखाई जिसके चलते भारत का कायापलट तो हुआ ही। संपूर्ण विश्व में एक सुख शांतिपूर्ण नई दुनिया खड़ी हो गई।

यह करने के लिए संघ का काम है। इसको आप संघ के अंदर आकर देख सकते हैं। जो मैं बोल रहा हूं वह सारा वहां है। कभी भी बताकर बिना बताए संघ के घरों में जाइए, शाखा में जाइए, संघ के कार्यक्रमों में रहिए। आपको यह सारी बातें वहां बीज रूप में।

या धीरे-धीरे विकसित होते हुए मिलेगी। मैं यह जो सब बता रहा हूं, संघ का प्रचार करने के लिए नहीं बता रहा हूं। मैं यह सब बता रहा हूं। संघ क्या है? आपको बता रहा हूं। यह फैक्ट्स है। आप जो भी सोचेंगे संघ के बारे में वो फैक्ट्स पर आधारित होना चाहिए।

कन्विंस आप हो यह मेरा आग्रह नहीं है। यह सब सुनकर आप विपरीत मत भी बना सकते हैं। लेकिन सर संघ चालक ने ये जो बताया या संघ में हमने जो जाकर देखा उसके आधार पर हम यह कर रहे हैं। ऐसा कहने की आपको मोहलत होनी चाहिए।

इसलिए यह आपने सुना है। यहां रुकिए नहीं समय-समय पर एकदम सब लोग आएंगे तो हमारे पास जगह नहीं है। बारी-बारी आप सब लोग आके संघ को अंदर से देखिए। संघ को समझिए और अगर यह बात आपको ठीक लगती है जो मैंने बताई वहां मिलती है।

तो अपने व्यक्तिगत जीवन से लेकर तो सारे विश्व के जीवन को संभालने वाला विश्व धर्म विकसित करने के इस काम में भारत को तैयार करने वाला यह अभियान उसके आप सहयोगी कार्यकर्ता बनिए। इतनी एक बात आपके सामने अनुरोध के रूप में रखता हूं।

दो दिन लंबे भाषण आपने मेरी सुन लिए। इसलिए आपका धन्यवाद करता हूं और कल आपसे प्रश्नों को आमंत्रित करता हूं। इतने सारे प्रश्न आएंगे तो उसको थोड़ा बनाना पड़ेगा। छूटेगा कुछ नहीं। विषय सब आएंगे लेकिन प्रश्न कंडेंस्ड होंगे। इतनी एक बात बताता हूं और मेरे चार शब्द समाप्त करता हूं।

– सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी

संघ शताब्दी पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का संपूर्ण व्याख्यान: 26 अगस्त 2025, विज्ञान भवन, नई दिल्ली

संघ शताब्दी पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का संपूर्ण व्याख्यान: 28 अगस्त 2025, विज्ञान भवन, नई दिल्ली

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