Tuesday, January 27, 2026

सड़क दुर्घटना: दो साल में लगभग 9 लाख सड़क हादसों के साथ भारत ने किया टॉप, चीन-अमेरिका को भी छोड़ा पीछे

भारत में सड़क दुर्घटनाओं को अक्सर मानवीय भूल से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा गहरी और चिंताजनक है।

जानें क्यों भारत की सड़कें नियम मानने वालों के लिए भी जानलेवा साबित हो रही हैं और कैसे व्यवस्था की कमजोरियां लोगों की जान ले रही हैं।

जब नियम टूटे नहीं, फिर मौत क्यों हुई

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय तथा सेव लाइफ फाउंडेशन के संयुक्त अध्ययन ने सड़क सुरक्षा को लेकर एक नई तस्वीर पेश की है।

रिपोर्ट के अनुसार, सड़क हादसों में जान गंवाने वाले करीब 59 प्रतिशत लोग ऐसे मामलों में मारे गए, जहां किसी बड़े ट्रैफिक नियम के उल्लंघन का कोई प्रमाण नहीं मिला।

यह संकेत करता है कि समस्या सिर्फ ड्राइवर की नहीं, बल्कि सड़क व्यवस्था की भी है।

दिन ढलते ही बढ़ जाता है जोखिम

अध्ययन में सामने आया है कि शाम 6 बजे से रात 12 बजे के बीच दुर्घटनाओं में सबसे ज्यादा मौतें होती हैं।

इस समय कम रोशनी, थकान और तेज गति मिलकर जोखिम को कई गुना बढ़ा देते हैं।

चिंताजनक बात यह है कि इन हादसों का शिकार वे लोग भी बने, जो नियमों का पालन कर रहे थे।

देश के सबसे खतरनाक सड़क क्षेत्र

रिपोर्ट ने देश के 100 ऐसे जिलों की पहचान की है, जहां सड़क दुर्घटनाओं में मौतों का आंकड़ा सबसे ज्यादा है।

महाराष्ट्र का नासिक ग्रामीण जिला इस सूची में शीर्ष पर है, इसके बाद पुणे ग्रामीण, पटना और अहमदनगर का स्थान आता है।

केवल इन 100 जिलों में ही 2023 और 2024 के दौरान 89 हजार से अधिक लोगों की जान गई, जो कुल राष्ट्रीय आंकड़े का चौथाई से ज्यादा है।

वैश्विक स्तर पर भारत की चिंताजनक स्थिति

वैश्विक स्तर पर देखें तो सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों के मामले में भारत पहले स्थान पर है।

तुलना करें तो चीन में भारत से लगभग एक तिहाई और अमेरिका में करीब एक चौथाई सड़क मौतें दर्ज होती हैं।

बीते दो वर्षों में देशभर में लाखों दुर्घटनाओं में लाखों लोगों की जान जाना एक गंभीर चेतावनी है।

ये राज्य बने सबसे बड़े हॉटस्पॉट

सबसे ज्यादा खतरनाक जिलों की संख्या उत्तर प्रदेश में दर्ज की गई है, जहां 20 जिले इस सूची में शामिल हैं।

इसके बाद तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक और राजस्थान का नंबर आता है। यह साफ दर्शाता है कि सड़क सुरक्षा की समस्या पूरे देश में फैली हुई है।

सड़कें फैलीं, सुरक्षा पीछे रह गई

भारत का सड़क नेटवर्क दुनिया में दूसरे नंबर पर है, जिसकी कुल लंबाई 63 लाख किलोमीटर से अधिक है।

बावजूद इसके, सड़क हादसों में होने वाली करीब 63 प्रतिशत मौतें राष्ट्रीय राजमार्गों के बाहर होती हैं।

यानी स्थानीय और संपर्क सड़कें ज्यादा जोखिम भरी साबित हो रही हैं।

वही जगहें, वही हादसे

रिपोर्ट बताती है कि कई दुर्घटनाएं एक ही स्थान पर बार-बार होती हैं।

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और राज्य पीडब्ल्यूडी की 18 प्रमुख सड़कों पर ही आधे से ज्यादा मौतें दर्ज की गईं।

इन मार्गों पर 379 स्थानों को अत्यधिक खतरनाक माना गया है।

कैसे होती है टक्कर और क्यों जाती है जान

कुल मौतों में से 72 प्रतिशत मामले पीछे से टक्कर, आमने-सामने की भिड़ंत और पैदल यात्रियों को कुचलने से जुड़े हैं।

नियमों की बात करें तो तेज रफ्तार से 19 प्रतिशत, लापरवाही से 7 प्रतिशत और गलत ओवरटेक से 3 प्रतिशत मौतें हुईं।

इंजीनियरिंग की गलतियां बनीं जानलेवा

अध्ययन में सड़क इंजीनियरिंग से जुड़ी 20 सामान्य खामियों की पहचान की गई है।

इनमें कमजोर या टूटी क्रैश बैरियर, मिटे हुए रोड मार्किंग, बिना सुरक्षा के खड़े कंक्रीट ढांचे, गलत या टूटे साइन बोर्ड और स्ट्रीट लाइट की कमी शामिल है।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी कई बार खराब सिविल इंजीनियरिंग और कमजोर डीपीआर को हादसों का मुख्य कारण बता चुके हैं।

अगर जान बचानी है तो क्या बदलना होगा

रिपोर्ट के अनुसार, नई योजनाएं बनाने से ज्यादा जरूरी है कि मौजूदा नीतियों को जमीन पर सही तरीके से लागू किया जाए। सड़क एजेंसियों, पुलिस और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच बेहतर समन्वय, खतरनाक सड़कों का नियमित सुरक्षा ऑडिट, पुलिस व्यवस्था को मजबूत करना और एंबुलेंस सेवाओं की गुणवत्ता सुधारना जैसे कदम हजारों जानें बचा सकते हैं।

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Karnika Pandey
Karnika Pandeyhttps://reportbharathindi.com/
“This is Karnika Pandey, a Senior Journalist with over 3 years of experience in the media industry. She covers politics, lifestyle, entertainment, and compelling life stories with clarity and depth. Known for sharp analysis and impactful storytelling, she brings credibility, balance, and a strong editorial voice to every piece she writes.”
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