‘आसमान का आयरन डोम’: भारत अब अपनी सुरक्षा रणनीति को नई ऊँचाइयों पर ले जा रहा है। जमीन और समुद्र के बाद अब फोकस पूरी तरह आसमान पर है।
इसी दिशा में देश एक महत्वाकांक्षी रक्षा परियोजना पर तेजी से काम कर रहा है, प्रोजेक्ट कुशा। इसे ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ भी कहा जा रहा है।
इसका उद्देश्य भारत के आसमान को इतना सुरक्षित बनाना कि दुश्मन की कोई भी मिसाइल, ड्रोन या फाइटर जेट भारतीय सीमा के भीतर प्रवेश करने से पहले ही नष्ट कर दिया जाए।
क्या है प्रोजेक्ट कुशा?
प्रोजेक्ट कुशा भारत का स्वदेशी लॉन्ग रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसे Defence Research and Development Organisation (DRDO) विकसित कर रहा है। यह सिस्टम दुश्मन की हवाई खतरों, जैसे बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल, ड्रोन और लड़ाकू विमान, को दूर से पहचान कर उन्हें बीच हवा में ही खत्म करने की क्षमता रखेगा।
इसे रूस के S-400 के समकक्ष माना जा रहा है, लेकिन अंतर यह है कि कुशा पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित होगा।
इससे भारत को भविष्य में किसी भी विदेशी निर्भरता से राहत मिलेगी।
थ्री-टियर सुरक्षा: तीन स्तरों पर ‘नो-फ्लाई जोन’
प्रोजेक्ट कुशा की सबसे बड़ी ताकत इसका ‘लेयर्ड डिफेंस’ मॉडल है। यह तीन अलग-अलग मिसाइलों के जरिए बहु-स्तरीय सुरक्षा प्रदान करेगा:
1. मार्क-1 (M1)
करीब 150 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम। मध्यम दूरी के खतरों को रोकने के लिए तैयार।
2. मार्क-2 (M2)
लगभग 250 किलोमीटर की रेंज। यह ऊँचाई और दूरी दोनों में अधिक सटीक इंटरसेप्शन करेगा।
3. मार्क-3 (M3)
350 से 400 किलोमीटर तक दुश्मन को निशाना बनाने की क्षमता। यह लंबी दूरी से आने वाले हाई-वैल्यू टारगेट्स, जैसे जासूसी विमान और उन्नत क्रूज मिसाइलों—को ट्रैक कर सकता है।
इन तीनों स्तरों के साथ भारत के आसमान में एक ऐसा ‘नो-फ्लाई जोन’ तैयार होगा, जिसे भेद पाना बेहद मुश्किल होगा।
मौजूदा सिस्टम के साथ मजबूत तालमेल
भारत के पास पहले से मध्यम दूरी के लिए ‘आकाश’ मिसाइल सिस्टम और लंबी दूरी के लिए S-400 मौजूद है। लेकिन इनके बीच एक रणनीतिक गैप था। प्रोजेक्ट कुशा उसी खाली स्थान को भरेगा।
जब ‘आकाश’, कुशा और S-400 एक साथ काम करेंगे, तो भारत के पास एक पूर्ण मल्टी-लेयर एयर डिफेंस नेटवर्क होगा। इसका अर्थ है, अगर दुश्मन की कोई मिसाइल पहली परत पार कर भी जाए, तो अगली परत उसे रोक लेगी।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम
अब तक लंबी दूरी के एयर डिफेंस के लिए भारत को विदेशी तकनीक पर निर्भर रहना पड़ता था। ऐसे सिस्टम की मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स और अपग्रेड के लिए दूसरे देशों की शर्तें माननी पड़ती थीं।
प्रोजेक्ट कुशा इस निर्भरता को खत्म करेगा। इसमें मिसाइल गाइडेंस, रडार तकनीक, सीकर सिस्टम और प्रोपल्शन जैसी जटिल तकनीकें देश में ही विकसित की जा रही हैं। यह न केवल रक्षा मजबूती का संकेत है, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक है।
ट्रायल और तैनाती का रोडमैप
‘आसमान का आयरन डोम’: यह परियोजना अब केवल अवधारणा तक सीमित नहीं है। यह डेवलपमेंटल ट्रायल के चरण में प्रवेश कर चुकी है। पहले तकनीकी परीक्षण होंगे, फिर भारतीय वायुसेना के साथ यूजर ट्रायल किए जाएंगे।
योजना के अनुसार 2030 से इसकी चरणबद्ध तैनाती शुरू हो सकती है, जबकि 2035 तक इसे पूरी तरह ऑपरेशनल बनाने का लक्ष्य रखा गया है। भारतीय वायुसेना इसके लगभग 10 स्क्वाड्रन शामिल करने पर विचार कर रही है।
रणनीतिक महत्व: भविष्य के युद्ध आसमान में
ड्रोन हमलों और हाई-स्पीड मिसाइलों के इस युग में हवाई सुरक्षा किसी भी देश की पहली ढाल है। हाल के वर्षों में बदले वैश्विक हालात ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य के संघर्षों में एयर डिफेंस की भूमिका निर्णायक होगी।
प्रोजेक्ट कुशा भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा कर सकता है, जिनके पास अपना मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम है। इससे परमाणु संयंत्रों, बड़े शहरों, सैन्य अड्डों और रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा और मजबूत होगी।
अभेद्य आकाश की ओर
‘आसमान का आयरन डोम’: प्रोजेक्ट कुशा सिर्फ एक रक्षा परियोजना नहीं, बल्कि भारत की बदलती सोच का प्रतीक है। यह दिखाता है कि देश अब केवल प्रतिक्रिया देने वाली नीति पर नहीं, बल्कि ‘प्रोएक्टिव डिफेंस’ रणनीति पर आगे बढ़ रहा है।
जब यह सिस्टम पूरी तरह तैनात होगा, तब भारत का आसमान सच मायनों में एक ‘अभेद्य किला’ बन चुका होगा, जहाँ दुश्मन के किसी भी हवाई खतरे की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी। यह आधुनिक भारत की तकनीकी क्षमता और आत्मविश्वास की नई पहचान है।
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