Thursday, June 18, 2026

NCERT की ‘डांसिंग गर्ल’ पर विवाद: जानें 4500 साल पुरानी इस प्रतिमा की कहानी!

NCERT की ‘डांसिंग गर्ल’ पर विवाद: करीब 4500 साल पुरानी एक छोटी-सी कांस्य प्रतिमा अचानक देशभर में चर्चा का विषय बन गई है।

सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध ‘डांसिंग गर्ल’ प्रतिमा को लेकर तब विवाद खड़ा हो गया, जब NCERT की कक्षा 9 की नई पाठ्यपुस्तक ‘मधुरिमा’ में इसकी तस्वीर को बदले हुए रूप में प्रकाशित किया गया।

किताब में प्रतिमा के नग्न धड़ को ढककर दिखाया गया, जिससे ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसे वस्त्र पहनाए गए हों। इतिहासकारों, शिक्षाविदों और कला विशेषज्ञों ने इसे ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई।

विवाद बढ़ने के बाद NCERT को अपना फैसला बदलना पड़ा और उसने घोषणा की कि प्रतिमा की मूल तस्वीर को डिजिटल और आगामी प्रिंट संस्करणों में बहाल किया जाएगा।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया कि क्या हम अपने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को उसके वास्तविक स्वरूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हैं?

आखिर कौन है ‘डांसिंग गर्ल’?

‘डांसिंग गर्ल’ सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे प्रसिद्ध और पहचान योग्य कलाकृतियों में से एक है। यह लगभग 10.5 सेंटीमीटर ऊंची कांस्य प्रतिमा है, जिसे 1926 में ब्रिटिश पुरातत्वविद अर्नेस्ट मैके ने मोहनजोदड़ो की खुदाई के दौरान खोजा था।

माना जाता है कि यह प्रतिमा लगभग 2500 ईसा पूर्व की है और हड़प्पा सभ्यता की उन्नत कला एवं तकनीकी क्षमता का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है।

प्रतिमा में एक किशोरी जैसी आकृति दिखाई देती है, जिसने कई चूड़ियां और एक हार पहन रखा है। उसका एक हाथ कमर पर टिका है, जबकि दूसरा हाथ नीचे की ओर है।

उसकी मुद्रा में ऐसा आत्मविश्वास दिखाई देता है, जिसने दुनिया भर के कला प्रेमियों और इतिहासकारों को दशकों से आकर्षित किया है।

एक छोटी प्रतिमा, लेकिन तकनीक थी बेहद उन्नत

‘डांसिंग गर्ल’ केवल एक कलात्मक रचना नहीं है, बल्कि यह उस समय की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का भी प्रमाण है।

इस प्रतिमा को ‘लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग’ तकनीक से बनाया गया था, जिसे आज भी धातु ढलाई की सबसे जटिल प्रक्रियाओं में गिना जाता है।

इस तकनीक में पहले मोम से आकृति बनाई जाती है, फिर उसे मिट्टी से ढक दिया जाता है। गर्म करने पर मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है और उसकी जगह बने खाली हिस्से में पिघला हुआ कांस्य भरा जाता है।

इससे स्पष्ट होता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग धातु विज्ञान और शिल्प कला में अत्यंत दक्ष थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी उन्नत तकनीक का प्रयोग चार हजार साल पहले होना उस सभ्यता के उच्च स्तर के ज्ञान और कौशल को दर्शाता है।

क्या वह वास्तव में नर्तकी थी?

NCERT की ‘डांसिंग गर्ल’ पर विवाद: दिलचस्प बात यह है कि जिस प्रतिमा को दुनिया ‘डांसिंग गर्ल’ के नाम से जानती है, उसके बारे में इतिहासकार आज भी पूरी तरह सहमत नहीं हैं।

अर्नेस्ट मैके और बाद के कई पुरातत्वविदों ने उसकी मुद्रा को देखकर उसे नर्तकी माना था, लेकिन आधुनिक शोधकर्ताओं का मानना है कि यह जरूरी नहीं कि वह वास्तव में कोई नृत्यांगना ही रही हो।

कुछ विद्वान उसे किसी कुलीन परिवार की युवती, धार्मिक महिला, योद्धा या सामाजिक प्रतिष्ठा रखने वाली महिला का प्रतीक मानते हैं। चूंकि सिंधु लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी है, इसलिए प्रतिमा की वास्तविक पहचान रहस्य बनी हुई है।

यही कारण है कि ‘डांसिंग गर्ल’ केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि एक अनसुलझी ऐतिहासिक पहेली भी है।

NCERT की किताब में बदलाव क्यों बना विवाद का कारण?

विवाद की जड़ NCERT की नई पाठ्यपुस्तक में प्रकाशित वह तस्वीर बनी, जिसमें प्रतिमा के खुले धड़ को छाया के माध्यम से ढक दिया गया था।

आलोचकों का कहना था कि यह इतिहास को बदलने और छात्रों को वास्तविक कलाकृति से दूर रखने जैसा कदम है।

विशेषज्ञों ने सवाल उठाया कि जब यह प्रतिमा लंबे समय से NCERT की विभिन्न पुस्तकों में अपने मूल स्वरूप में प्रकाशित होती रही है, तो अब इसके स्वरूप में बदलाव की आवश्यकता क्यों महसूस की गई।

कई शिक्षाविदों का मानना है कि इस तरह के बदलाव इतिहास और कला की मूल प्रस्तुति को प्रभावित करते हैं।

उनका तर्क है कि प्राचीन कलाकृतियों और ऐतिहासिक धरोहरों का मूल्यांकन उनके समय और संदर्भ के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि वर्तमान सामाजिक मानदंडों के अनुसार।

विरोध बढ़ने के बाद NCERT ने स्पष्ट किया कि तस्वीर को उसके मूल स्वरूप में वापस लाया जाएगा और भविष्य के संस्करणों में कोई बदलाव नहीं रहेगा।

विभाजन के समय भारत और पाकिस्तान के बीच भी बनी थी विवाद की वजह

NCERT की ‘डांसिंग गर्ल’ पर विवाद: ‘डांसिंग गर्ल’ की कहानी केवल पुरातत्व तक सीमित नहीं है। 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान भी यह प्रतिमा विवाद का विषय बनी थी। चूंकि मोहनजोदड़ो वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित है, इसलिए पाकिस्तान ने इस प्रतिमा पर दावा जताया था।

उस समय सिंधु घाटी सभ्यता की कई महत्वपूर्ण कलाकृतियों के बंटवारे को लेकर दोनों देशों के बीच लंबी बातचीत हुई। अंततः समझौते के तहत पाकिस्तान को प्रसिद्ध ‘प्रीस्ट किंग’ प्रतिमा मिली, जबकि ‘डांसिंग गर्ल’ भारत के पास रही।

आज यह प्रतिमा नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है और वहां आने वाले लाखों पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

क्यों आज भी दुनिया को आकर्षित करती है ‘डांसिंग गर्ल’?

इतिहासकारों के अनुसार इस प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी मुद्रा और आत्मविश्वास है। हजारों वर्ष पुरानी होने के बावजूद उसकी बॉडी लैंग्वेज आज भी आधुनिक प्रतीत होती है।

यही कारण है कि दुनिया भर के संग्रहालय, शोधकर्ता और कला विशेषज्ञ इसे मानव सभ्यता की सबसे प्रभावशाली कलाकृतियों में गिनते हैं।

इसके गहने, केश विन्यास और शारीरिक मुद्रा उस समय के सामाजिक जीवन, फैशन और सांस्कृतिक विकास की झलक भी देते हैं।

यह प्रतिमा हमें बताती है कि सिंधु घाटी सभ्यता केवल विकसित शहरों और व्यापार तक सीमित नहीं थी, बल्कि कला, शिल्प और रचनात्मकता में भी बेहद समृद्ध थी।

विरासत को समझने का समय, छिपाने का नहीं

NCERT की ‘डांसिंग गर्ल’ पर विवाद: ‘डांसिंग गर्ल’ पर उठा विवाद केवल एक तस्वीर का विवाद नहीं है। यह इस बात की परीक्षा भी है कि हम अपनी ऐतिहासिक धरोहरों और सांस्कृतिक विरासत को किस नजर से देखते हैं।

क्या इतिहास को उसके वास्तविक स्वरूप में स्वीकार किया जाना चाहिए या आधुनिक मान्यताओं के अनुसार उसे बदलना चाहिए?

NCERT के इस निर्णय से फिलहाल विवाद की तीव्रता भले ही कम हो गई हो, लेकिन इसने एक अहम चर्चा को जन्म दिया है। यह चर्चा इतिहास, शिक्षा, कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़ी हुई है।

लगभग 4500 वर्ष पुरानी यह छोटी-सी प्रतिमा आज भी हमें यह संदेश देती है कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक शक्ति उसकी विरासत और ऐतिहासिक सच्चाइयों को सुरक्षित रखने में निहित होती है, न कि उन्हें बदलने या छिपाने में।

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