Sunday, February 15, 2026

मिठनी: 65 साल बाद लौटी घर, शादी के बाद डकैतों ने कर लिया था किडनैप

65 साल बाद मायके लौटीं मिठनी की अद्भुत कहानी

उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले से छह दशक पुरानी एक घटना ने फिर लोगों को भावुक कर दिया है। वर्ष 1961 62 में पंद्रह वर्षीय बालिका मिठनी को डकैतों ने अगवा कर लिया था। अब अस्सी वर्ष की आयु में वह अपने मायके पहुंचीं तो पूरा गांव भावनाओं से भर उठा।

डकैती की रात और अपहरण की वारदात

जिला मुख्यालय से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर टोलवा आट गांव के बाहर पुरवा में रैदास बिरादरी के बलदेव परिवार के साथ यह घटना घटी। गांव के बाहरी हिस्से में कुछ ही मकान थे। उसी स्थान पर सौ से अधिक डकैतों ने धावा बोला और अंधाधुंध गोलियां चलाईं।

डकैतों ने बलदेव और उनके पुत्र शिवलाल को धारदार हथियारों से घायल किया। परिवार के पास लूटने लायक संपत्ति नहीं थी, फिर भी गिरोह का उद्देश्य घर की इज्जत पर हमला करना था। इसी दौरान पंद्रह वर्षीय मिठनी को जबरन उठा लिया गया और परिवार बिखर गया।

शादी के बाद बदल गई जिंदगी की दिशा

घटना से कुछ समय पहले ही मिठनी का विवाह सुरसा थाना क्षेत्र के पुनुआवर गांव में हुआ था। अगले महीने गौना होना था। लेकिन डकैती की उस रात ने उनकी जिंदगी का रास्ता बदल दिया। अपहरण के बाद डकैत उन्हें कई दिनों तक जंगलों में लेकर घूमते रहे।

जंगलों में प्रताड़ना और फिर सौंपा गया किसी को

अपहरण के दौरान मिठनी को मारपीट भी सहनी पड़ी। बाद में गिरोह उन्हें अलीगढ़ ले गया और किसी व्यक्ति को सौंप दिया। यह सूचना थाना दादों क्षेत्र के समेघा गांव के सोहनलाल यादव तक पहुंची, जो अपने इलाके में प्रभावशाली पहलवान माने जाते थे।

सोहनलाल ने साथियों संग छुड़ाया

जानकारी मिलते ही सोहनलाल यादव ने अपने साथियों के साथ कार्रवाई की और मिठनी को छुड़ा लिया। अपहरण के आघात से वह मानसिक रूप से अस्थिर हो चुकी थीं। परिस्थितियों को देखते हुए सोहनलाल ने उनसे विवाह किया और उन्हें अपने घर में स्थान दिया।

नई जिंदगी और आठ संतानों का परिवार

समेघा गांव में मिठनी ने नया जीवन शुरू किया। समय के साथ उनके आठ बच्चे हुए जिनमें पांच बेटियां और तीन बेटे शामिल हैं। हालांकि वह सुरक्षित थीं, लेकिन मायके की स्मृतियां उनके मन में लगातार जीवित रहीं और वह अपने बच्चों को अपहरण की कहानी सुनाती रहती थीं।

मायके की धुंधली यादें बनीं पहचान

मिठनी को याद था कि वह हरदोई जिले की रहने वाली हैं। घर के पास सकाहा गांव स्थित बड़ा शिव मंदिर था जहां वर्ष में दो बार मेला लगता था। उन्हें अपने पिता और भाइयों शिवलाल तथा सूबेदार के नाम भी स्पष्ट रूप से याद थे।

सीमा ने लिया मां को मायके पहुंचाने का संकल्प

नोएडा में रहने वाली सीमा यादव ने तय किया कि मां की यादों के आधार पर वह उन्हें मायके तक पहुंचाने का प्रयास करेंगी। उन्होंने अपनी अस्सी वर्षीय मां को साथ लिया और अलीगढ़ से एटा होते हुए फर्रुखाबाद मार्ग से बस द्वारा हरदोई पहुंचीं।

शिव मंदिर ने जगाई स्मृतियां

हरदोई पहुंचकर उन्होंने सकाहा स्थित शिव मंदिर का रास्ता पूछा और ऑटो से मंदिर पहुंचीं। मंदिर देखते ही मिठनी की स्मृतियां ताजा हो उठीं। उन्होंने विश्वास जताया कि यही उनके मायके के पास स्थित मंदिर है जहां वह बचपन में आती थीं।

भाई के घर पहुंचीं मिठनी

मंदिर से आगे बढ़ते हुए वह अपने पुराने गांव के आसपास पहुंचीं। स्थान की कुछ पहचान होते ही सीमा ने ग्रामीणों से शिवलाल और सूबेदार के बारे में पूछा। लोगों ने बताया कि दोनों का निधन हो चुका है, लेकिन उनके परिवार के सदस्य गांव में रहते हैं।

सीमा अपनी मां को लेकर शिवलाल के घर पहुंचीं जहां उनकी बहू से सामना हुआ। परिवार को वर्षों पहले बहन के अपहरण की जानकारी थी। जब मिठनी ने स्वयं को वही अगवा की गई बेटी बताया तो घर में आश्चर्य और भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा।

पैंसठ वर्षों बाद पूरा हुआ इंतजार

शिवलाल की पत्नी और परिवार की अन्य महिलाओं ने मिठनी को अंदर ले जाकर गले लगाया। थोड़ी ही देर में रिश्तेदारों और ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई। पैंसठ वर्षों का इंतजार आंसुओं के रूप में बह निकला और बिछड़ा परिवार फिर एकजुट हो गया।

मिठनी की बेटी सीमा के लिए यह क्षण संतोष से भरा था कि जीवन के अंतिम चरण में उनकी मां अपने मायके की देहरी तक पहुंच सकीं। जिस कहानी को परिवार ने पीढ़ियों तक सुना था, वह अब जीवित रूप में उनके सामने खड़ी थी।

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Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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