Monday, January 26, 2026

केरल का अपना कुम्भ: 250 वर्षों बाद महामाघ महोत्सव की ऐतिहासिक शुरुआत

केरल महामाघ महोत्सव

करीब ढाई सौ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद केरल में अपने प्राचीन कुम्भ के रूप में विख्यात महामाघ महोत्सव का पुनरारंभ हुआ है। इस आयोजन को दक्षिण भारत का कुम्भ कहा जाता है।

18 जनवरी 2026 से यह महोत्सव मलप्पुरम जिले के तिरुनावाया में भारथपुझा नदी के तट पर आरंभ हुआ, जिसे केरल के हिंदू समाज के लिए सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का प्रतीक माना जा रहा है।

महामाघ कुम्भ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

महामाघ महोत्सव की जड़ें प्राचीन ममंकम या महामखम् उत्सव में मिलती हैं, जो प्रत्येक बारह वर्ष में आयोजित होता था। इस कुम्भ सदृश आयोजन में पवित्र स्नान, यज्ञ, वैदिक अनुष्ठान और शास्त्रार्थ होते थे।

दक्षिण भारत के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु, साधु और विद्वान इसमें सम्मिलित होते थे, जिससे तिरुनावाया एक विशाल धार्मिक केंद्र बन जाता था।

सत्ता संघर्ष और महोत्सव का हिंसक पतन

कालांतर में यह धार्मिक आयोजन राजनीतिक सत्ता संघर्ष का अखाड़ा बन गया। वल्लुवनाडु के शासकों और कोझिकोड के सामुद्रि अर्थात जमोरिन के बीच वर्चस्व की लड़ाइयों ने ममंकम को हिंसक रूप दे दिया।

इन संघर्षों के कारण महोत्सव की धार्मिक गरिमा क्षीण होती चली गई और अंततः यह आयोजन रक्तपात की स्मृति बनकर रह गया।

औपनिवेशिक शासन और कुम्भ पर रोक

ब्रिटिश शासन के दौरान ममंकम अथवा महामाघ कुम्भ को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया। औपनिवेशिक प्रशासन ने इतने बड़े हिंदू धार्मिक समागम को कानून व्यवस्था के लिए खतरा बताया।

यह रोक केवल हिंसा के कारण नहीं थी, बल्कि भारतीय परंपराओं और सामूहिक धार्मिक चेतना को कमजोर करने की औपनिवेशिक नीति का हिस्सा मानी जाती है। इसके बाद यह परंपरा लगभग ढाई सौ वर्षों तक विस्मृत पड़ी रही।

पुनरुद्धार की लंबी और कठिन राह

महामाघ कुम्भ के पुनर्जीवन के प्रयास हाल के वर्षों में तेज हुए। हिंदू संगठनों और संत समाज ने इस प्राचीन परंपरा को पुनः स्थापित करने की मांग उठाई।

वर्ष 2016 में तिरुनावाया मंदिर में पुनः कुछ अनुष्ठानों की शुरुआत हुई, जिसे पूर्ण महोत्सव की भूमिका माना गया। 2026 का आयोजन 2028 में प्रस्तावित भव्य महाकुम्भ की पूर्वपीठिका के रूप में नियोजित किया गया।

प्रशासनिक रोक और विवाद

महोत्सव की तैयारियों के बीच 8 जनवरी 2026 को स्थानीय प्रशासन ने केरल नदी संरक्षण अधिनियम का हवाला देते हुए कार्य रोकने का नोटिस जारी कर दिया।

अस्थायी पुल निर्माण और नदी तल पर गतिविधियों को लेकर आपत्ति जताई गई। इस कदम से महोत्सव पर संकट गहरा गया और व्यापक विरोध शुरू हुआ।

संघर्ष, समर्थन और अनुमति की प्रक्रिया

महामाघ सभा और जूना अखाड़ा सहित कई अखाड़ों और हिंदू संगठनों ने प्रशासनिक रोक के खिलाफ मोर्चा खोला। लंबे संवाद और आश्वासनों के बाद आयोजन को सशर्त अनुमति दी गई।

पर्यावरण संरक्षण, स्थायी निर्माण से परहेज और नदी को नुकसान न पहुंचाने जैसी शर्तें तय की गईं। राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर द्वारा महोत्सव का उद्घाटन किया जाना आयोजकों के लिए महत्वपूर्ण नैतिक समर्थन माना गया।

2026 का महामाघ कुम्भ: स्वरूप और आयोजन

यह महोत्सव 3 फरवरी 2026 तक चलेगा। इसमें माघ स्नान, वैदिक मंत्रोच्चार, निला आरती, उपनिषदों पर प्रवचन, शोभायात्राएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

महामंडलेश्वर स्वामी आनंदवनम भारती के नेतृत्व में देशभर से साधु संत पहुंच रहे हैं। प्रतिदिन पचास हजार से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन का अनुमान है।

सांस्कृतिक चेतना और आर्थिक संभावनाएं

महामाघ कुम्भ को केरल में सनातन धर्म की जीवंतता का प्रतीक बताया जा रहा है। समर्थकों की दृष्टि में यह आस्था की उसी प्रकार वापसी है, जैसे अयोध्या में राम मंदिर।

साथ ही आयोजन से स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है, जिसकी तुलना उत्तर प्रदेश के कुम्भ से होने वाले व्यापक आर्थिक प्रभाव से की जा रही है।

250 वर्षों बाद केरल का कुम्भ और नई शुरुआत

ढाई सौ वर्षों की बाधाओं, प्रतिबंधों और संघर्षों के बाद महामाघ कुम्भ का पुनरारंभ केरल के हिंदू समाज के लिए ऐतिहासिक क्षण माना जा रहा है।

यह आयोजन केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति, पहचान और निरंतरता की पुनर्प्राप्ति के रूप में देखा जा रहा है।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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