Monday, June 29, 2026

कमल हासन का विवादित बयान: शिक्षा से ‘सनातन की जंजीर तोड़ने’ की अपील

राज्यसभा सांसद और अभिनेता कमल हासन ने चेन्नई के एक कार्यक्रम में सनातन परंपरा को लेकर विवादास्पद बयान देते हुए कहा कि केवल शिक्षा ही वह हथियार है।

जिससे सनातन की जंजीरों को तोड़ा जा सकता है। उनके इस बयान पर हिन्दू संगठनों ने तीव्र विरोध दर्ज कराया है।

NEET पर बोले हासन, बहुसंख्यकों को बताया ‘मूर्ख’

NEET परीक्षा के संदर्भ में बोलते हुए कमल हासन ने कहा कि “केवल शिक्षा को अपने हाथ में लो, बहुसंख्यक मूर्ख तुम्हें हरा देंगे, लेकिन शिक्षा उन्हें नहीं हरा सकती।”

इसी क्रम में उन्होंने कहा कि शिक्षा तानाशाही और सनातन की जंजीरों को तोड़ने का एकमात्र उपाय है।

बीजेपी ने किया तीखा विरोध, ‘धर्म के नाम पर बाँटने’ का आरोप

तमिलनाडु बीजेपी नेता तमिलसाई सुंदरराजन ने हासन के बयान पर नाराजगी जताते हुए कहा कि एक राज्यसभा सांसद के रूप में कमल हासन को जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि हासन DMK से भी ज्यादा स्टालिन के वफादार हैं और धर्म के नाम पर समाज को बाँटने का प्रयास कर रहे हैं।

अरुण गोविल का पलटवार: ‘सनातन से बड़ी कोई शिक्षा नहीं’

लोकसभा सांसद अरुण गोविल ने भी इस बयान की निंदा की और कहा कि “सनातन से बड़ी कोई और शिक्षा नहीं हो सकती।” उन्होंने कमल हासन के विचारों को भटकाव पैदा करने वाला करार दिया।

पहले भी सनातन पर हमलावर रहे हैं कमल हासन

कमल हासन का सनातन विरोध कोई नई बात नहीं है। इससे पहले उन्होंने नाथूराम गोडसे को ‘पहला हिंदू आतंकी’ बताया था और हिन्दू शब्द को मुगलों से जोड़कर विवाद खड़ा किया था। वे महाभारत पर भी आपत्तिजनक बयान दे चुके हैं।

उदयनिधि स्टालिन के बयान का किया था बचाव

कमल हासन ने सनातन धर्म को डेंगू-मलेरिया से तुलना करने वाले उदयनिधि स्टालिन का बचाव करते हुए उन्हें ‘युवा बच्चा’ कहा था।

उन्होंने इसे उदयनिधि का निजी बयान बताकर समर्थन देने की कोशिश की थी, जिस पर भी व्यापक आलोचना हुई थी।

जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह की भी कर चुके हैं वकालत

2019 में पुलवामा हमले के कुछ दिनों बाद कमल हासन ने कश्मीर में जनमत संग्रह की माँग की थी। उन्होंने पूछा था कि “भारत सरकार जनमत संग्रह से डर क्यों रही है?”

साथ ही उन्होंने POK को ‘आज़ाद कश्मीर’ कहने का दुस्साहस भी किया था।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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