Thursday, June 18, 2026

गौरक्षा बनी अपराध? 14 गौरक्षकों को आजीवन कारावास की सजा!

गौरक्षा के खिलाफ बनाया जा रहा माहौल?

नर्मदापुरम के सिवनी मालवा में आए एक न्यायिक फैसले ने मध्य प्रदेश से लेकर देशभर के गौसेवा से जुड़े लोगों के बीच नई बहस खड़ी कर दी है।

बराखड़ गांव के वर्ष 2022 के मामले में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय ने 14 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।

अदालत ने इन सभी को हत्या, हत्या के प्रयास, दंगा और अन्य धाराओं में दोषी माना। फैसला अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान की अदालत से आया।

मामला उस घटना से जुड़ा है, जिसमें महाराष्ट्र के अमरावती निवासी नजीर अहमद की कहासुनी के बाद उपचार के दौरान मौत हो गई थी।

घटना 3 अगस्त 2022 की रात की बताई जाती है। नजीर अहमद दो अन्य लोगों के साथ गौवंश को लेकर जा रहा था। सिवनी मालवा क्षेत्र के बराखड़ गांव के पास वाहन रोका गया। इसके बाद विवाद बढ़ा, कहासुनी हुई और मामला एक व्यक्ति की मृत्यु तक पहुंच गया।

गौरक्षा के मूल प्रश्न को क्यों दबाया गया

इस पूरे मामले में एक बात लगातार दबाई जाती दिखी। वाहन में गौवंश क्यों ले जाए जा रहे थे, उनका उद्देश्य क्या था, परिवहन वैध था या नहीं, इन सवालों पर उतनी तेज चर्चा नहीं हुई, जितनी पूरे घटनाक्रम को केवल मॉब लिंचिंग बताने में हुई।

कानून हाथ में लेना किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता। यह स्पष्ट बात है। पर इससे यह सवाल खत्म नहीं हो जाता कि गौवंश की अवैध ढुलाई, पशु क्रूरता और गौहत्या की आशंका पर प्रशासन पहले से सक्रिय क्यों नहीं रहता।

जहां कानून मौजूद हो, वहां उसका पालन भी दिखाई देना चाहिए। यदि गौवंश की रक्षा के कानून केवल कागज पर रहें और जमीन पर अवैध परिवहन चलता रहे, तो समाज में आक्रोश पैदा होगा। यह आक्रोश फिर गलत दिशा ले सकता है।

गौरक्षकों को ही कटघरे में खड़ा करने की आदत

बराखड़ मामले में दोषियों के परिजनों ने लगातार कहा कि उनके बच्चे गौसेवा की भावना से मौके पर पहुंचे थे। उनका दावा रहा कि उन्हें गलत तरीके से बहुत कठोर सजा दी गई। अदालत का निर्णय अपनी जगह है, लेकिन समाज में उठती शंकाओं को भी अनसुना नहीं किया जा सकता।

आज स्थिति यह बनती दिखती है कि गौवंश की रक्षा के नाम पर सक्रिय कोई भी व्यक्ति पहले से संदेह के घेरे में डाल दिया जाता है।

गौतस्करी या अवैध पशु परिवहन की पृष्ठभूमि पीछे चली जाती है और पूरा ध्यान केवल गौरक्षकों पर केंद्रित हो जाता है।

इससे एक खतरनाक संदेश जाता है। गौरक्षा अपराध बना दी जाती है, जबकि अवैध पशु परिवहन के नेटवर्क पर उतनी कठोरता नजर नहीं आती। यही असंतुलन समाज के एक बड़े वर्ग को बेचैन करता है।

सजा की कठोरता पर स्वाभाविक सवाल

इस मामले में 14 लोगों को आजीवन कारावास की सजा मिली है। समर्थकों और परिजनों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सभी आरोपियों की भूमिका एक जैसी थी।

क्या हर व्यक्ति ने समान अपराध किया था। क्या सजा तय करते समय यह अंतर पर्याप्त रूप से देखा गया।

किसी सामूहिक घटना में मौजूद हर व्यक्ति की भूमिका अलग हो सकती है। किसी ने वाहन रोका होगा, किसी ने भीड़ में उपस्थिति दर्ज की होगी, किसी ने मारपीट की होगी, कोई रोकने की कोशिश भी कर सकता है। न्याय की कसौटी इन्हीं अंतरों पर की जाती है।

जब सभी को एक जैसी कठोर सजा दी गई है, तो यह सवाल उठता ही है कि क्या व्यक्तिगत भूमिका, परिस्थिति, उद्देश्य और घटना की वास्तविकता पर गहराई से विचार हुआ कि नहीं?

जस्टिस तबस्सुम खान पर उठे सवाल

फैसले के बाद न्यायाधीश तबस्सुम खान का नाम चर्चा में आ रहा है। कई गौरक्षा कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि फैसला एक तरफा है और बहुसंख्यक वर्ग के प्रति भेदभाव की दृष्टि से दिया गया है। अदालत परिसर में हंगामा भी हुआ, परिजन रोए, विरोध हुआ और सुरक्षा बढ़ानी पड़ी।

किसी भी न्यायिक फैसले पर सवाल उठाना नागरिक अधिकार है। फैसला साक्ष्यों, धाराओं और अपराध के आधार पर समानुपातिक होना चाहिए, किसी विशेष वर्ग के खिलाफ दुर्भावना से नहीं होना चाहिए।

समाज में यदि यह धारणा बनती है कि किसी संवेदनशील धार्मिक मामले में निर्णय असंतुलित है, तो उस धारणा का समाधान कानूनी पारदर्शिता से ही होगा।

पिछड़े वर्ग से आते हैं आरोपी

इस मामले में ज्यादातर दोषी पिछड़ा व दलित वर्ग के अत्यंत साधारण परिवारों से आते हैं। पिछड़े, वंचित या दलित समाज से जुड़े होने के कारण क्या उनके प्रति भेदभाव किया जा रहा है? ऐसे लोगों के लिए लंबी कानूनी लड़ाई बेहद कठिन होती है।

यही बात सबसे अधिक चिंताजनक है। मजबूत आर्थिक स्थिति वाले लोग बड़े वकील खड़े कर सकते हैं, दस्तावेज जुटा सकते हैं, लंबी अपील लड़ सकते हैं।

गरीब या पिछड़े परिवार अदालत की भाषा, प्रक्रिया और खर्च के सामने ही टूटने लगते हैं।

यदि कोई आरोपी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी या आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आता है, तो राज्य की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उसे निष्पक्ष सुनवाई, सक्षम पैरवी और न्यायिक प्रक्रिया में बराबर अवसर मिलना ही चाहिए।

गौरक्षकों पर हमला हो तो चुप्पी क्यों

गौरक्षा से जुड़े मामलों में विमर्श अक्सर एकतरफा होता है। जब गौतस्करी रोकने की कोशिश करने वाले लोगों पर हमले होते हैं, जब ग्रामीणों या कार्यकर्ताओं को पीटा जाता है, तब उतनी आवाज नहीं उठती।

यह दोहरापन क्यों? एक घटना को राष्ट्रीय शर्म बताया जाता है, पर दूसरी घटना स्थानीय विवाद कहकर छोड़ दी जाती है। अगर पीड़ा दोनों तरफ होती है। तो कानून दोनों तरफ लागू होना चाहिए।

यदि भीड़ की हिंसा गलत है, तो गौतस्करी भी अपराध है। यदि किसी की जान जाना दुखद है, तो गौवंश बचाने निकले व्यक्ति की हत्या या पिटाई भी उतनी ही गंभीर है। न्याय का संतुलन हर मामले में होना चाहिए।

प्रशासन पहले जागे

बराखड़ जैसे मामलों की जड़ में केवल भीड़ का आक्रोश नहीं, प्रशासनिक विफलता भी है। यदि पुलिस, पशु संरक्षण विभाग और स्थानीय प्रशासन समय पर सक्रिय रहें, तो नागरिकों को सड़क पर वाहन रोकने या हस्तक्षेप करने की नौबत ही नहीं आएगी।

गौवंश की अवैध ढुलाई रोकने के लिए स्पष्ट और तेज व्यवस्था चाहिए। सूचना मिले तो तत्काल कार्रवाई हो। वाहन की जांच हो। पशुओं की स्थिति देखी जाए। दोष मिले तो मुकदमा बने। इससे जनता का भरोसा व्यवस्था पर लौटेगा।

जब नागरिकों को लगता है कि प्रशासन आंख बंद किए बैठा है, तब वे स्वयं आगे आते हैं। तब टकराव बढ़ता है और बाद में वही लोग सबसे बड़े अपराधी की तरह पेश कर दिए जाते हैं।

फैसले के बाद कोर्ट परिसर में तनाव

फैसला सुनाए जाने के बाद अदालत परिसर में भारी तनाव का माहौल पैदा हुआ। दोषियों के परिजन रोने लगे। विरोध हुआ।

जब पुलिस दोषियों को जेल ले जाने लगी, तो कुछ परिजन वाहन के सामने लेट गए। पुलिस को काफी मशक्कत के बाद हालात संभालने पड़े।

इसके बाद अदालत परिसर में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया। बताया गया कि परिसर में ही न्यायाधीश का आवास भी है, इसलिए सुरक्षा को लेकर प्रशासन ने अतिरिक्त सावधानी बरती। बाद में दोषियों को सिवनी मालवा उपजेल से नर्मदापुरम जिला जेल भेजा गया।

स्थानीय स्तर पर मामला शांत जरूर दिख रहा है, पर भीतर असंतोष है। लोग खुले सड़क आंदोलन में नहीं उतरे, लेकिन कस्बे में चर्चा जारी है। परिवारों में दुख है। समर्थकों में नाराजगी है। और पूरे मामले को लेकर कानूनी अपील की संभावना देखी जा रही है।

आगे की राह उच्च न्यायालय में है

इस फैसले से असहमति रखने वालों के लिए अगला रास्ता उच्च न्यायालय है। परिवारों, समर्थकों और सामाजिक संगठनों को मजबूत कानूनी तैयारी करनी होगी। फैसले की प्रति, साक्ष्य, गवाही और धाराओं की व्याख्या पर गंभीर समीक्षा आवश्यक है।

गौरक्षा से जुड़े ऐसे मामलों में सक्षम कानूनी सहायता तंत्र भी होना चाहिए। केवल भावनात्मक समर्थन पर्याप्त नहीं है। जिन परिवारों के सदस्य जेल गए हैं, उन्हें कानून की पूरी प्रक्रिया समझाने और अपील में मदद देने की जरूरत है।

नर्मदापुरम का यह मामला केवल 14 दोषियों की सजा का मामला नहीं है। यह उस बड़े सामाजिक तनाव का को दिखाता है, जहां गौवंश की रक्षा, अवैध पशु परिवहन, प्रशासनिक शिथिलता, न्यायिक कठोरता और सार्वजनिक विमर्श सब आपस में टकरा रहे हैं।

यह भी उतना ही स्पष्ट होना चाहिए कि गौतस्करी और अवैध पशु ढुलाई को नजरअंदाज कर गौरक्षकों को ही स्थायी अपराधी बना देना न्यायपूर्ण दृष्टि नहीं है।

गौवंश भारत के बड़े समाज के लिए आस्था, अर्थव्यवस्था और संवेदना का विषय है। इस विषय को केवल कानून व्यवस्था की समस्या बनाकर नहीं देखा जा सकता। इसके लिए संवेदनशील प्रशासन, निष्पक्ष न्याय और संतुलित सार्वजनिक विमर्श तीनों जरूरी हैं।

गौरक्षा अपराध नहीं

गौरक्षा अपने आप में अपराध नहीं है। गौवंश की रक्षा के लिए समाज में चिंता होना स्वाभाविक है। पर यह चिंता कानून के भीतर संगठित होनी चाहिए। सूचना, शिकायत, पुलिस कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया ही स्थायी रास्ता बना सकते हैं।

राज्य की जिम्मेदारी है कि वह गौतस्करी रोकने में कमजोर न दिखे। न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि वह हर आरोपी की भूमिका को अलग अलग कसौटी पर परखे।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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