Monday, January 26, 2026

कबीलों से निकला 2000 साल पुराना खेल पोलो: कैसे बन गया रॉयल गेम?

कबीलों से निकला 2000 साल पुराना खेल पोलो: घोड़े पर बैठकर खेले जाने वाले खेलों में पोलो को दुनिया का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित टीम स्पोर्ट माना जाता है।

यह खेल न केवल घुड़सवारी कौशल की माँग करता है, बल्कि इसमें रणनीति, संतुलन और अनुशासन का भी अहम रोले होता है।

पोलो की उत्पत्ति ईरान में छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास हुई थी, जहाँ इसे चौवगन के नाम से जाना जाता था।

लगभग 2000 वर्ष पहले पर्शियन सभ्यता में खेले जाने वाला यह घुड़सवारी खेल धीरे-धीरे पश्चिमी दुनिया तक पहुँचा और फिर भारत में आकर विकसित हुआ।

जहाँ राजाओं, शासकों और कुलीन वर्ग द्वारा खेले जाने के कारण पोलो को आज भी ‘द स्पोर्ट ऑफ़ किंग्स’ कहा जाता है।

पोलो क्या है

पोलो एक घुड़सवारी खेल है, जिसे खिलाड़ी घोड़े पर सवार होकर, स्टिक (मैलेट) और बॉल की मदद से खेलते हैं।

यह खेल आज भी बड़े स्तर पर स्पॉन्सरशिप के माध्यम से संचालित होता है और इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक मैदानों में पहुँचते हैं।

इन दर्शकों में इक्वेस्ट्रियन स्पोर्ट्स के शौकीन और हाई सोसाइटी से जुड़े लोग भी शामिल होते हैं।

इतिहास और प्रारंभिक विकास

कबीलों से निकला 2000 साल पुराना खेल पोलो: पोलो और इसके विभिन्न रूप 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 1वीं शताब्दी ईस्वी तक एक घुड़सवारी खेल के रूप में मौजूद थे, जो मुख्य रूप से पर्शिया में खेले जाते थे।

उस समय यह खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि सैन्य प्रशिक्षण और शारीरिक दक्षता का भी माध्यम माना जाता था।

समय के साथ पोलो दुनिया के कई हिस्सों में फैलता गया और आज यह खेल वैश्विक स्तर पर पहचाना जाता है।

वर्तमान में लगभग 100 देश फेडरेशन ऑफ़ इंटरनेशनल पोलो (FIP) से जुड़े हुए हैं। इनमें से 16 देशों में पोलो को प्रोफेशनली खेला जाता है।

इसके अलावा, 1900 से 1936 तक पोलो ओलंपिक खेलों का भी हिस्सा रहा।

खेल की कठिनाई और जोखिम

कबीलों से निकला 2000 साल पुराना खेल पोलो: चूँकि पोलो घोड़े पर बैठकर तेज़ गति में खेला जाता है, इसलिए इसमें घुड़सवारी में महारत होना बेहद ज़रूरी है।

खेल के दौरान घोड़े से गिरने और चोट लगने का खतरा भी रहता है। इसी कारण पोलो खिलाड़ियों का शारीरिक रूप से फिट, मज़बूत और एक्टिव होना अनिवार्य माना जाता है।

पोलो का ओरिजिन

पोलो का आविष्कार मूल रूप से ईरानियों द्वारा किया गया था। इस खेल का एक पुराना और क्षेत्रीय रूप, जिसे बुज़काशी या कोकपार कहा जाता है, आज भी सेंट्रल एशिया के कुछ हिस्सों में खेला जाता है।

प्राचीन ईरान में चौवगन (पोलो) को राष्ट्रीय खेल के रूप में बड़े पैमाने पर खेला जाता था। इस खेल में पुरुषों के साथ-साथ महिलाएँ भी भाग लेती थीं।

यह खेल ‘Persian Ball Game’ के नाम से भी जाना जाता था और ससानीयन साम्राज्य के शाही दरबारों में मनोरंजन के रूप में खेला जाता था।

भारत और ब्रिटिश प्रभाव

भारत में पोलो का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र मणिपुर माना जाता है। यहाँ इसे टिबेटिक नाम ‘पुलु’ या ‘पोलो’ से जाना जाता है।

लकड़ी की गेंद के उपयोग के साथ यह नाम धीरे-धीरे प्रसिद्ध होता गया और लोगों ने इसे अपनाना शुरू कर दिया।

1859 में, असम के सिलचर शहर में एक यूरोपियन पोलो क्लब की स्थापना हुई, जहाँ अंग्रेज़ों ने मणिपुर के स्थानीय खिलाड़ियों से यह खेल सीखा। यहीं से पोलो का आधुनिक स्वरूप दुनिया के सामने आया।

इसके बाद पोलो का खेल मणिपुर की परंपराओं से निकलकर धीरे-धीरे भारत के अन्य हिस्सों और फिर पूरी दुनिया में फैलने लगा।

मणिपुर में खेले जाने वाले पोलो की सबसे खास बात यह थी कि यह खेल तेज़, रोमांचक और पूरी तरह घुड़सवारी कौशल पर आधारित था।

मणिपुर पोलो की खासियत

कबीलों से निकला 2000 साल पुराना खेल पोलो: मणिपुर में पोलो पहले भी और आज भी 7 खिलाड़ियों के साथ खेला जाता है।

यहाँ इस्तेमाल होने वाले घोड़े अपेक्षाकृत छोटे कद के होते हैं, जिनकी ऊँचाई 13 हाथ (52 इंच या 132 सेमी) से कम होती है।

इस संस्करण में कोई गोल पोस्ट नहीं होती। खिलाड़ी गेंद को मैदान के किसी एक छोर से बाहर मारकर स्कोर करता है। गेंद को मैलेट के सिरे से नहीं, बल्कि उसके लंबे हिस्से से मारा जाता है।

खिलाड़ियों को गेंद उठाकर ले जाने की अनुमति नहीं होती, लेकिन खुले हाथ को छोड़कर शरीर के किसी भी हिस्से से गेंद को रोकना मना नहीं है।

स्टिक आमतौर पर बेंत की बनी होती है और गेंदें बाँस की जड़ों से तैयार की जाती हैं। खिलाड़ी अपनी सुरक्षा के लिए काठी और पट्टियों पर चमड़े की ढाल भी लगाते थे, ताकि खेल के दौरान पैरों को चोट न लगे।

शाही पोलो ग्राउंड और परंपरा

मणिपुर के राजाओं के कांगला किले के अंदर एक शाही पोलो ग्राउंड था, जहाँ राजा और दरबारी खेला करते थे। इसे मनंग कांगजेई बंग, यानी ‘अंदर का पोलो ग्राउंड’ कहा जाता था।

वहीं आम जनता के लिए किले के बाहर अलग पोलो ग्राउंड बनाए गए थे, जहाँ नियमित रूप से सार्वजनिक मैच खेले जाते थे।

इससे यह साफ़ होता है कि पोलो मणिपुर में सिर्फ़ शाही खेल नहीं था, बल्कि आम लोगों से भी जुड़ा हुआ था।

दुनिया का सबसे पुराना पोलो ग्राउंड

मणिपुर का इम्फाल पोलो ग्राउंड दुनिया का सबसे पुराना पोलो ग्राउंड माना जाता है। इसका उल्लेख शाही इतिहास ग्रंथ Cheitharol Kumbaba में 33 ईस्वी से मिलता है।

1850 के दशक में ब्रिटिश अधिकारी जोसेफ फोर्ड शेरर, जिन्हें आधुनिक पोलो का जनक माना जाता है, ने यहीं पर पोलो खेला था। बाद में 1901 में भारत के वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने इस ग्राउंड का मापन भी कराया।

पोलो का अंतरराष्ट्रीय फैलाव

19वीं सदी के दौरान भारतीय रियासतों की कई पोलो टीमों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। इस दौर में भारत पोलो की दुनिया में एक मजबूत ताकत बनकर उभरा।

धीरे-धीरे यह खेल यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों तक पहुँचा। आज पोलो लगभग 100 देशों में खेला जाता है और कई देशों में इसे प्रोफेशनल स्पोर्ट के रूप में अपनाया गया है।

आधुनिक दौर में पोलो

कबीलों से निकला 2000 साल पुराना खेल पोलो: समय के साथ पोलो में बदलाव भी आए। मैच का समय कम किया गया, मैदान छोटे किए गए और दर्शकों की सुविधा पर ज़्यादा ध्यान दिया गया।

इसी सोच के साथ 2016 में जयपुर में वर्ल्ड चैंपियंस पोलो लीग की शुरुआत की गई, जो क्रिकेट के T20 फॉर्मेट से प्रेरित है।

इस नए फॉर्मेट का मकसद पोलो को ज़्यादा दर्शक-फ्रेंडली और रोमांचक बनाना था।

पोलो के नियम

पोलो के नियम खिलाड़ियों और घोड़ों दोनों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। मैच की निगरानी अंपायर करते हैं और नियम तोड़ने पर पेनल्टी दी जाती है।

इस खेल का सबसे अहम नियम “लाइन ऑफ़ द बॉल ” यानी गेंद की दिशा से जुड़ा होता है। जो खिलाड़ी गेंद को मारता है, उसे आमतौर पर रास्ते का अधिकार मिलता है।

दूसरे खिलाड़ी उसकी लाइन को गलत तरीके से पार नहीं कर सकते। डिफेंस में खिलाड़ी राइड-ऑफ और हूकिंग जैसे तरीकों से गेंद छीनने की कोशिश करते हैं,

लेकिन यह सब सुरक्षित तरीके से करना ज़रूरी होता है। असुरक्षित खेल को फाउल माना जाता है।

पोलो सिर्फ़ एक खेल नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और घुड़सवारी कौशल का अनोखा संगम है।

ईरान से शुरू होकर मणिपुर और फिर पूरी दुनिया तक पहुँचा यह खेल आज भी अपनी शाही पहचान और रोमांच को बनाए हुए है।

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Karnika Pandey
Karnika Pandeyhttps://reportbharathindi.com/
“This is Karnika Pandey, a Senior Journalist with over 3 years of experience in the media industry. She covers politics, lifestyle, entertainment, and compelling life stories with clarity and depth. Known for sharp analysis and impactful storytelling, she brings credibility, balance, and a strong editorial voice to every piece she writes.”
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