हर्ष दुबे की कहानी
हर्ष दुबे अब तक चार बार नीट परीक्षा दे चुके हैं। पहले प्रयास में कुछ अंकों से चयन चूक गए। दूसरा प्रयास उन्होंने वर्ष 2024 में दिया, जब परीक्षा प्रक्रिया पर पेपर लीक और ग्रेस मार्क्स की धांधली के गंभीर आरोप सामने आए थे।
उस समय हर्ष दुबे कुछ साथी छात्रों के साथ विधिवत अनुमति लेकर जंतर मंतर पहुंचे थे। शाम चार बजे से पहले ही पुलिस ने प्रदर्शन स्थल खाली करा दिया। इसके बाद उन्होंने भीड़ जुटाकर हंगामा करने के बजाय न्याय की मांग को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया।
आर्थिक संकट के बीच भी नहीं छोड़ी तैयारी
इस वर्ष हर्ष दुबे के पास कोचिंग की फीस तक चुकाने के पैसे नहीं थे। इसके बावजूद उन्होंने तैयारी जारी रखी और परीक्षा दी, लेकिन पेपर लीक होने तथा परीक्षा निरस्त होने से उनकी मेहनत एक बार फिर प्रभावित हो गई।
21 जून को आयोजित पुनर्परीक्षा से एक शाम पहले उनके क्षेत्र की बिजली चली गई। वह बिजली विभाग भी पहुंचे, आधी रात तक जागते रहे और फिर परीक्षा देने पहुंचे। इस बार भी वह केवल तीन अंकों से चयन से चूक गए।
उनकी पीड़ा तब और बढ़ गई, जब उनसे कम अंक प्राप्त करने वाले कुछ साथियों को मेडिकल सीट मिल गई। विरोध प्रदर्शन के दौरान उनकी बात कुछ समाचार चैनलों तक पहुंची और स्टूडियो में उन्होंने भावुक होकर अपनी पूरी व्यथा सामने रखी।
आक्रोश में भी नहीं की व्यक्तिगत अभद्र टिप्पणी
हर्ष दुबे ने अपनी पीड़ा और व्यवस्था के प्रति गुस्सा खुलकर व्यक्त किया, लेकिन किसी नेता, उनके परिवार या किसी महिला के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं किया। दूसरी ओर कुछ युवाओं ने विरोध के नाम पर व्यक्तिगत और आपत्तिजनक टिप्पणियां कर दीं।
इसके बाद संबंधित नेता ने अपने रिकॉर्ड किए गए वीडियो संदेश में इन युवाओं का उल्लेख करते हुए उन्हें क्षमा करने और सही रास्ता दिखाने की बात कही। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सोशल मीडिया पर भी व्यापक बहस छिड़ गई।
दंड और क्षमा का संदेश
दंड व्यवस्था का उद्देश्य केवल दोषी को सबक सिखाना ही नहीं, बल्कि समाज को भी यह संदेश देना होता है कि अभद्र व्यवहार का परिणाम गंभीर हो सकता है।
यदि शालीनता से अपनी बात रखने वालों की तुलना में अभद्र भाषा बोलने वालों को अधिक राजनीतिक और सामाजिक महत्व मिलने लगे, तो इससे गलत संदेश जाता है और सभ्य संवाद की संस्कृति कमजोर पड़ती है।
शालीनता हर्ष दुबे जैसे छात्रों की गलती?
यदि हर्ष दुबे जैसे मेधावी छात्रों को अपनी बात सत्ता तक पहुंचानी है, तो शायद उन्हें भी पहले अपशब्द बोलने होंगे और बाद में माफी मांग लेनी होगी।
ऐसी स्थिति में नीट की सीट मिले या न मिले, नेता जरूर चक्कर लगाने लग जाएंगे। आखिर ऐसा प्रतीत होने लगा है कि देश में मेहनती विद्यार्थियों से अधिक विवाद खड़े करने वाले इन्फ्लुएंसर्स को महत्व मिल रहा है।

