Friday, August 14, 2026

गोरखपुर का तिवारी हत्याकांड जातीय संघर्ष नहीं, पुरानी रंजिश और प्रतिशोध की कहानी

गोरखपुर

गोरखपुर के तिवारी हत्याकांड को केवल ब्राह्मण बनाम कुर्मी संघर्ष के रूप में पेश करना घटनाक्रम को अधूरा समझना होगा। तथ्य बताते हैं कि इसके पीछे दो परिवारों के बीच वर्षों से चली आ रही रंजिश और हत्या के बदले हत्या की मानसिकता रही है।

इस विवाद की जड़ें सिकरीगंज के अहिरौली खुर्द गांव में पुराने पारिवारिक तनाव से जुड़ी हैं। बताया जाता है कि बच्चों के खेलने और क्रिकेट से शुरू हुए विवाद ने धीरे धीरे दोनों परिवारों के रिश्तों को कटु बनाया और दुश्मनी गहरी होती चली गई।

वर्ष 2024 में रंजिश ने लिया हिंसक रूप

पांच अगस्त 2024 को इसी पुरानी रंजिश की पहली गंभीर घटना सामने आई। विनोद चौधरी के साथ मारपीट की गई, जिसमें उनका हाथ टूट गया। घटना के बाद वह शिकायत दर्ज कराने थाने पहुंचे, लेकिन उसी दौरान विवाद ने और अधिक हिंसक रूप ले लिया।

इसी घटनाक्रम में विनोद चौधरी के भतीजे आदेश चौधरी के साथ भी मारपीट की गई और बाद में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई। पुलिस रिकॉर्ड और न्यायिक प्रक्रिया में आदर्श तिवारी उर्फ गोलू तिवारी, बृजेश तिवारी सहित कई लोग आरोपी बनाए गए।

इस प्रकार वर्ष 2024 में चौधरी परिवार का एक युवक मारा गया और हत्या का आरोप तिवारी परिवार से जुड़े लोगों पर लगा। यह घटना दोनों पक्षों के बीच पहले से मौजूद दुश्मनी को और गहरा करने वाली साबित हुई तथा प्रतिशोध की आशंका बनी।

वर्ष 2026 में सामने आई रंजिश की अगली कड़ी

दो वर्ष बाद वर्ष 2026 में इसी दुश्मनी की दूसरी भयावह कड़ी सामने आई। शिवकुमार तिवारी की हत्या को भी पुरानी रंजिश से जोड़कर देखा जा रहा है। अहिरौली खुर्द गांव में ब्रह्मभोज के दौरान शिवकुमार तिवारी पर पहले हमला किया गया।

हमले में घायल शिवकुमार तिवारी को अस्पताल ले जाया जा रहा था, तभी रास्ते में उन पर दोबारा हमला किया गया और दुस्साहसिक तरीके से हत्या कर दी गई। इस हत्या में चौधरी परिवार से जुड़े लोगों पर आरोप लगाए गए और जांच जारी है।

यहां से मूल सवाल उठता है कि दो परिवारों की लंबी दुश्मनी और प्रतिशोध से जुड़ी इस घटना को सीधे ब्राह्मण विरोधी सरकार या कुर्मी बनाम ब्राह्मण संघर्ष के रूप में क्यों पेश किया जाए। ऐसा करना अपराध की वास्तविक पृष्ठभूमि को पीछे धकेलता है।

दोनों हत्याओं को एक ही कसौटी पर देखना जरूरी

जब वर्ष 2024 में आदेश चौधरी की हत्या हुई, तब पूरे कुर्मी समाज ने सरकार को कुर्मी विरोधी घोषित नहीं किया था। इसलिए वर्ष 2026 में शिवकुमार तिवारी की हत्या के बाद घटनाक्रम को ब्राह्मण विरोधी सरकार का प्रमाण बताना समान रूप से अनुचित है।

हत्या के बदले हत्या की इस श्रृंखला को जाति के आधार पर नहीं, अपराध और कानून के आधार पर देखा जाना चाहिए। वर्ष 2024 में आदेश चौधरी की हत्या गलत थी और वर्ष 2026 में शिवकुमार तिवारी की हत्या भी उतनी ही गंभीर है।

दोनों में से किसी हत्या को सही साबित करने के लिए जातीय पहचान का सहारा लेना खतरनाक प्रवृत्ति है। असली प्रश्न यह है कि पहली हत्या के बाद उत्पन्न दुश्मनी और बदले की मानसिकता को कानून और प्रशासन समय रहते समाप्त क्यों नहीं कर सके।

बुलडोजर और एनकाउंटर को हर मामले का समाधान मानना भी गलत

इस घटनाक्रम पर सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले लोगों से सवाल बनता है। यदि वर्ष 2024 में आदेश चौधरी की हत्या के तुरंत बाद आरोपियों के घर बुलडोजर चल जाता या एनकाउंटर हो जाता, तो क्या वही लोग इसे न्यायपूर्ण कार्रवाई मान लेते।

संभावना यही है कि तब सरकार पर ब्राह्मणों के नाम पर निर्दोष लोगों को निशाना बनाने का आरोप लगाया जाता। आज शिवकुमार तिवारी की हत्या के बाद वही वर्ग पूछ रहा है कि बुलडोजर क्यों नहीं चला और आरोपियों का एनकाउंटर क्यों नहीं हुआ।

समस्या इसलिए केवल कानून की कार्रवाई में नहीं, बल्कि सुविधा के अनुसार कानून की परिभाषा बदलने की प्रवृत्ति में भी है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो कानून का उद्देश्य जाति देखकर बुलडोजर चलाना या जाति देखकर किसी आरोपी का एनकाउंटर करना नहीं होना चाहिए।

देश और प्रदेश में प्रतिदिन हत्या की घटनाएं होती हैं, लेकिन हर मामले में एनकाउंटर नहीं किया जाता। कानून का काम साक्ष्य जुटाना, दोषियों को गिरफ्तार करना, निष्पक्ष जांच कराना और अदालत के माध्यम से अपराधियों को कठोर तथा विधिसम्मत सजा दिलाना है।

पहली हत्या के बाद कठोर न्याय होता तो दूसरी शायद टल सकती थी

यदि वर्ष 2024 की हत्या के बाद दोषियों को कानून के अनुसार ऐसी कठोर सजा मिलती, जिससे दूसरी तरफ प्रतिशोध लेने का साहस समाप्त हो जाता, तो संभव है कि आज शिवकुमार तिवारी जीवित होते और एक पुरानी रंजिश दूसरी हत्या तक नहीं पहुंचती।

इसी तरह अब शिवकुमार तिवारी की हत्या के बाद भी कानून ने कठोर, निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई नहीं की, तो भविष्य में किसी अन्य परिवार के भीतर बदले की आग भड़क सकती है। कानून की कमजोरी कई बार प्रतिशोध की संस्कृति को बढ़ावा देती है।

इसलिए गोरखपुर की इस घटना को जातीय युद्ध में बदलने का प्रयास नहीं होना चाहिए। यह ब्राह्मण बनाम कुर्मी का संघर्ष नहीं, बल्कि अपराध बनाम कानून का प्रश्न है। यह वर्षों पुरानी दुश्मनी, प्रतिशोध की आग और न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता से जुड़ा मामला है।

आदेश चौधरी और शिवकुमार तिवारी दोनों के लिए समान न्याय

जिसने वर्ष 2024 में आदेश चौधरी की हत्या की, उसे कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए थी। जिसने वर्ष 2026 में शिवकुमार तिवारी की हत्या की, उसे भी उसी कानून के तहत निष्पक्ष जांच के बाद कठोर कार्रवाई और सजा का सामना करना चाहिए।

हत्या का उत्तर हत्या नहीं हो सकता। यदि जाति के नाम पर परिवार अपनी अदालत और बदला तय करने लगेंगे, तो कानून का अर्थ समाप्त हो जाएगा। जिस दिन समाज ने न्याय के लिए कानून छोड़कर जातीय शक्ति पर भरोसा किया, कोई सुरक्षित नहीं रहेगा।

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए जातीय चश्मा हटाकर वर्ष 2024 और वर्ष 2026 दोनों घटनाओं को साथ देखना होगा। तब तस्वीर साफ होगी कि यह किसी जाति की लड़ाई नहीं, बल्कि बदले की उस आग की कहानी है जिसे कानून बुझा नहीं पाया।

योगी सरकार के विरोध में राजनीतिक तर्क तलाशने वालों को सरकार से प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए। कानून व्यवस्था, जांच और कार्रवाई पर सवाल लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हर हत्या को योगी सरकार के प्रति जातीय घृणा या जातीय राजनीति का हथियार बनाना उचित नहीं है।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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