Eye Floaters: कई लोगों को साफ आसमान, सफेद दीवार या मोबाइल-लैपटॉप की स्क्रीन देखते समय आंखों के सामने छोटे-छोटे काले धब्बे,
धागे या मकड़ी के जाले जैसे निशान दिखाई देते हैं। ये निशान आंखों के साथ इधर-उधर तैरते हुए महसूस होते हैं, इसलिए इन्हें आई फ्लोटर्स कहा जाता है।
अधिकांश मामलों में ये नुकसानदायक नहीं होते, लेकिन यदि इनकी संख्या अचानक बढ़ने लगे तो यह आंखों से जुड़ी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है।
आंख के अंदर कैसे बनते हैं फ्लोटर्स?
आंख के अंदर एक पारदर्शी जेली जैसा पदार्थ होता है, जिसे विट्रियस कहा जाता है। यह आंख के लेंस और रेटिना के बीच की जगह को भरता है।
उम्र बढ़ने के साथ विट्रियस की बनावट बदलने लगती है। इसके अंदर मौजूद कोलेजन फाइबर आपस में चिपककर छोटे-छोटे गुच्छे बना लेते हैं।
जब रोशनी इन गुच्छों से होकर गुजरती है, तो उनकी छाया रेटिना पर पड़ती है और यही छाया फ्लोटर्स के रूप में दिखाई देती है।
कुछ लोगों में विट्रियस धीरे-धीरे रेटिना से अलग होने लगता है। इस स्थिति को पोस्टेरियर विट्रियस डिटैचमेंट कहा जाता है। इसी प्रक्रिया के दौरान फ्लोटर्स दिखाई देना आम बात है।
अब युवाओं में भी तेजी से बढ़ रहे हैं मामले
पहले आई फ्लोटर्स को बढ़ती उम्र की समस्या माना जाता था, लेकिन अब युवाओं और यहां तक कि बच्चों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं।
डॉक्टरों के मुताबिक इसका एक बड़ा कारण मायोपिया यानी आंखों का माइनस नंबर बढ़ना है।
जिन लोगों का नंबर ज्यादा होता है, उनमें रेटिना कमजोर होने, उसमें छेद बनने या रेटिना डिटेचमेंट होने का खतरा बढ़ जाता है।
यही वजह है कि ऐसे लोगों में फ्लोटर्स की समस्या भी ज्यादा देखने को मिलती है।
क्या स्क्रीन टाइम है जिम्मेदार?
विशेषज्ञों का कहना है कि मोबाइल, लैपटॉप या अन्य डिजिटल डिवाइस सीधे तौर पर फ्लोटर्स पैदा नहीं करते हैं।
हालांकि लंबे समय तक चमकदार स्क्रीन देखने से पहले से मौजूद फ्लोटर्स ज्यादा स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं।
इसके अलावा लगातार स्क्रीन पर समय बिताने और बाहर कम समय गुजारने से मायोपिया बढ़ सकता है, जो आगे चलकर फ्लोटर्स और रेटिना से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ा देता है।
किन कारणों से बढ़ सकता है खतरा?
कुछ शारीरिक गतिविधियां भी आंख के अंदर मौजूद विट्रियस पर असर डाल सकती हैं। भारी वजन उठाना,
बहुत जोर से खांसना, लगातार तेज छींक आना या कब्ज के दौरान ज्यादा जोर लगाना कुछ मामलों में पोस्टेरियर विट्रियस डिटैचमेंट को ट्रिगर कर सकता है।
इसके अलावा आंख में चोट लगना या किसी दुर्घटना के कारण ट्रॉमा होना भी फ्लोटर्स की समस्या को बढ़ा सकता है।
हालांकि ऐसे सभी मामले खतरनाक नहीं होते, लेकिन इनके साथ अन्य लक्षण दिखाई दें तो तुरंत जांच करवानी चाहिए।
ये संकेत दिखें तो तुरंत डॉक्टर से मिलें
अधिकांश फ्लोटर्स समय के साथ कम परेशान करते हैं और दिमाग धीरे-धीरे उन्हें नजरअंदाज करना सीख जाता है,
लेकिन कुछ संकेत ऐसे हैं, जिन्हें बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अगर अचानक बड़ी संख्या में नए फ्लोटर्स दिखाई देने लगें, आंखों में बिजली चमकने जैसी फ्लैश महसूस हो या नजर के किसी हिस्से पर पर्दे जैसी छाया दिखाई दे, तो यह रेटिना में गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है।
रेटिना डिटेचमेंट ऐसी ही एक गंभीर स्थिति है, जिसमें आंख की रेटिना अपनी सामान्य जगह से अलग होने लगती है।
समय पर इलाज न मिलने पर यह स्थायी रूप से नजर जाने की वजह भी बन सकती है।
क्या है इसका इलाज?
डॉक्टरों के मुताबिक हर फ्लोटर का इलाज जरूरी नहीं होता। यदि जांच में रेटिना पूरी तरह स्वस्थ पाई जाती है और उसमें कोई छेद या डिटेचमेंट नहीं होता, तो केवल नियमित निगरानी की सलाह दी जाती है।
समय के साथ दिमाग फ्लोटर्स को नजरअंदाज करना सीख जाता है और वे कम महसूस होने लगते हैं,
लेकिन अगर फ्लोटर्स की वजह रेटिना में छेद, रेटिना टियर या रेटिना डिटेचमेंट हो, तो डॉक्टर लेजर ट्रीटमेंट या सर्जरी की सलाह दे सकते हैं।
इन दावों से रहें सावधान
विशेषज्ञों का कहना है कि आई फ्लोटर्स को खत्म करने के नाम पर किए जाने वाले कई दावे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हैं।
आई एक्सरसाइज, विटामिन सप्लीमेंट्स या विशेष डाइट फ्लोटर्स को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकतीं।
आंखों की सुरक्षा के लिए नियमित नेत्र जांच कराना, स्क्रीन इस्तेमाल करते समय बीच-बीच में ब्रेक लेना, बाहर पर्याप्त समय बिताना और आंखों को चोट से बचाना सबसे प्रभावी उपाय माने जाते हैं।
आंखों की अनदेखी पड़ सकती है भारी
अगर आपकी आंखों के सामने भी बार-बार तैरते हुए काले धब्बे, धागे या जाले जैसे निशान दिखाई देते हैं, तो इसे सामान्य समझकर अनदेखा न करें।
कई बार यह केवल उम्र या मायोपिया का असर होता है, लेकिन कुछ मामलों में यह आंखों की गंभीर बीमारी का शुरुआती संकेत भी हो सकता है।
समय पर जांच और सही इलाज आपकी आंखों की रोशनी को सुरक्षित रख सकता है।

