दिल्ली दंगा 2020: फरवरी 2020 में दिल्ली के उत्तर-पूर्वी हिस्सों में भारी हिंसा भड़की, जिसमें कुल 53 लोगों की मौत हुई और 700 से अधिक लोग घायल हुए।
जाफराबाद और शाहीन बाग क्षेत्र हिंसा के सबसे गंभीर केंद्र बने।
यह हिंसा नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शन के बीच हुई।
पुलिस और जांच एजेंसियों का दावा है कि यह हिंसा महज साम्प्रदायिक झड़प नहीं थी, बल्कि इसे योजनाबद्ध तरीके से भड़काया गया।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस हिंसा का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को प्रभावित करना भी था, क्योंकि इसे तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के समय भड़काने की योजना बनाई गई थी।
मुख्य आरोपियों में छात्र नेता उमर खालिद और पूर्व छात्र एवं वक्ता शरजील इमाम शामिल हैं। इनके अलावा कुल सात अन्य आरोपियों पर भी केस दर्ज था, जिनमें गुलफिशा फातिमा, मीरण हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद प्रमुख हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपनाया सख़्त रुख
दिल्ली दंगा 2020: 05 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों से जुड़े इस मामले में बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं, जबकि पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे दी गई।
कोर्ट ने साफ किया कि सभी आरोपियों की भूमिका अलग है। मुख्य आरोपियों की भूमिका गंभीर और केंद्रीय मानी गई, इसलिए उन्हें फिलहाल जमानत नहीं दी जा सकती।
वहीं पांच अन्य आरोपियों को जमानत देने में अदालत ने यह देखा कि उनके खिलाफ उपलब्ध सबूत तुलनात्मक रूप से कम गंभीर हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि किसी आरोपी को लंबी हिरासत में रखने के लिए राज्य को ठोस और मजबूत सबूत पेश करने होते हैं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबी हिरासत मात्र आधार नहीं है, विशेष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों में बेल देने का निर्णय सतर्कता और सबूत पर आधारित होना चाहिए।
एक साल बाद फिर जमानत मांग सकेंगे दोनों आरोपी
दिल्ली दंगा 2020: अदालत ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम पर लगाए गए आरोप गंभीर हैं और प्राथमिक प्रमाण उनके खिलाफ स्पष्ट हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि दोनों आरोपी एक साल बाद पुनः बेल याचिका दाखिल कर सकते हैं या ट्रायल में कुछ “protected witnesses” के बयान सामने आने पर बेल याचिका दायर कर सकते है।
सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि इस मामले में देरी का तर्क बेल के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। लंबी हिरासत के बावजूद, गंभीर अपराधों की जांच और राष्ट्रीय हित की सुरक्षा प्राथमिकता हैं।
पांच अन्य आरोपियों को मिली बेल
दिल्ली दंगा 2020: पांच अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरण हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को 12 शर्तों के तहत जमानत दी गई।
अदालत ने कहा कि बेल मिलने का मतलब यह नहीं कि उनके खिलाफ आरोप कमजोर हो गए। यदि जमानत की शर्तों का उल्लंघन होता है, तो बेल रद्द की जा सकती है।
यह फैसला दर्शाता है कि न्यायपालिका बेल मामलों में लचीलापन अपनाती है, लेकिन आरोपों के स्तर और भूमिका के आधार पर अलग-अलग रुख अपना सकती है।
कानूनी लड़ाई का अगला चरण
दिल्ली दंगा 2020: यह मामला कानून, न्याय और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन की परीक्षा बन चुका है। सवाल उठते हैं कि क्या कानून सभी के लिए समान रूप से लागू होता है और गंभीर हिंसा के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया कितनी सक्षम है।
अनुच्छेद 21 के तहत कहा गया है कि किसी भी आरोपी को मनमाने तरीके से हिरासत में नहीं रखा जा सकता। साथ ही, UAPA जैसी विशेष कानून धाराओं में बेल देना साधारण अपराध की तुलना में अधिक संवेदनशील मामला है।
सामाजिक दृष्टि से, दिल्ली दंगों ने समाज में गहरी सांप्रदायिक खाई छोड़ी। 53 लोगों की मौत और लगभग 700 लोग घायल होने के कारण पीड़ित परिवारों के लिए न्याय की उम्मीद अभी भी जारी है।
न्यायिक फैसले का समाज पर गहरा असर
दिल्ली दंगा 2020: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 10 दिसंबर 2025 को वरिष्ठ वकीलों की दलीलें सुनीं और अब भी कई कानूनी पहलू और अपीलें लंबित हैं। मुख्य आरोपियों की जमानत न मिलने से ट्रायल जारी रहेगा।
यह मामला न केवल दो आरोपियों का, बल्कि पूरे देश की न्याय व्यवस्था और सामाजिक संतुलन की परीक्षा बन गया है। न्यायपालिका ने यह स्पष्ट किया कि हर आरोपी की भूमिका अलग है और हर बेल याचिका को सबूतों और आरोपों के स्तर के आधार पर तय किया जाएगा।
2020 दिल्ली दंगे केवल एक हिंसक घटना नहीं, बल्कि कानून, न्याय, राजनीतिक बयान और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन की परीक्षा हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने यह स्पष्ट किया कि गंभीर अपराधों में बेल के लिए सावधानी और सबूत सबसे अहम हैं।
मुख्य आरोपी अभी भी हिरासत में हैं और उनके खिलाफ जांच जारी है। वहीं पांच अन्य आरोपियों को जमानत मिलने से संवैधानिक प्रक्रिया और न्याय की जटिलता सामने आई है।
यह मामला साबित करता है कि सत्य और न्याय की तलाश अभी भी देश के सामने चुनौती बनी हुई है।

