Friday, February 6, 2026

सदानंदन मास्टर: जिस वामपंथ ने काटे संघ कार्यकर्ता के पैर, उसके आका को ही पद्म विभूषण!

सदानंदन मास्टर के कटे पैरों और वी.एस. अच्युतानंदन को पद्म विभूषण की राजनीति: रक्तरंजित बलिदानों का अपमान और सत्ता का ‘मास्टरस्ट्रोक’

​लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर राज्यसभा में हाल ही में एक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ जिसने सदन में मौजूद हर संवेदनशील व्यक्ति की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया।

यह दृश्य उस रक्तरंजित विचारधारा के नग्न तांडव का प्रमाण था जिसने दशकों से केरल की पवित्र भूमि को देशभक्तों के रक्त से लाल कर रखा है।

जब राज्यसभा सांसद सदानंदन मास्टर ने अपने दोनों कृत्रिम पैरों को निकालकर सदन की मेज पर रखा, वह वामपंथी हिंसा के उस क्रूर इतिहास का जीवंत दस्तावेज था जिसे तथाकथित बौद्धिक समाज अक्सर अपनी सुविधानुसार भुला देता है।

उनकी यह दास्ताँ उन हजारों स्वयंसेवकों के संघर्ष का प्रतीक है जिन्होंने अपनी देह के टुकड़े करवाकर भी राष्ट्रवाद की लौ को बुझने नहीं दिया।

किन्तु, इस भावुक और रोंगटे खड़े कर देने वाले दृश्य के पीछे एक अत्यंत कड़वा और चुभने वाला प्रश्न भी छिपा है जो वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान के दोहरे चरित्र को उजागर करता है।

राज्यसभा में गूंजी कन्नूर के रक्तरंजित इतिहास की चीख

​केरल का कन्नूर जिला, जिसे वामपंथी हिंसा की प्रयोगशाला कहा जाता है, वहां के 61 वर्षीय सदानंदन मास्टर की कहानी किसी भी पत्थर दिल इंसान को पिघलाने के लिए पर्याप्त है।

सदानंदन मास्टर, जो पेशे से एक शिक्षक थे और विचारों से एक तपस्वी स्वयंसेवक, का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ पिता और भाई कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुयायी थे।

किशोरावस्था से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारों में ढले सदानंदन ने जब राष्ट्रवाद का मार्ग चुना, तो यह वहां के असहिष्णु वामपंथी गुंडों को रास नहीं आया।

25 जनवरी 1994 का वह काला दिन, जब वे मट्टनूर के एक सरकारी स्कूल में बच्चों को शिक्षा देकर और अपनी बहन के विवाह की तैयारियों में व्यस्त होकर लौट रहे थे, तभी मानवता के शत्रुओं ने उन्हें घेर लिया।

यह हमला एक संदेश देने के लिए था कि जो भी उस ‘लाल गढ़’ में भारत माता की जयकार करेगा, उसका हश्र यही होगा।

​मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रशिक्षित गुंडों ने जिस बर्बरता से सदानंदन मास्टर पर हमला किया, वह किसी युद्ध क्षेत्र में भी दुर्लभ ही देखने को मिलता है।

उन्होंने कुल्हाड़ियों से वार करके मास्टर के दोनों पैरों को शरीर से अलग कर दिया, मानो वे किसी वृक्ष की शाखाएं काट रहे हों।

उनकी क्रूरता की पराकाष्ठा यहीं समाप्त नहीं हुई, बल्कि हमलावरों ने बम धमाके करके वहां ऐसा भय का वातावरण निर्मित किया कि कोई भी उस तड़पते हुए स्वयंसेवक की सहायता के लिए आगे न आ सके।

सड़क पर खून से लथपथ पड़े सदानंदन मास्टर को जब तक अस्पताल पहुँचाया गया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और उनके कटे हुए अंगों को पुनः जोड़ा नहीं जा सका। यह घटना उस विचार को अपंग करने का कुत्सित प्रयास था जो राष्ट्र को सर्वोपरि मानता है।

परन्तु, सदानंदन मास्टर ने अपनी शारीरिक अक्षमता को अपनी मानसिक शक्ति के आड़े नहीं आने दिया और छह माह के भीतर ही कृत्रिम पैरों के सहारे खड़े होकर पुनः संघ कार्य में जुट गए, जो उनकी अदम्य जिजीविषा का परिचायक है।

शीर्ष नेतृत्व का विरोधाभास: आँसू कार्यकर्ताओं के लिए और सम्मान अत्याचारियों को?

​आज जब भाजपा का शीर्ष नेतृत्व, केरल में वामपंथियों द्वारा संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं पर किए गए अत्याचारों की लंबी-चौड़ी दास्ताँ सुनाते हैं, तो वह निस्संदेह सत्य होती है।

वे भावुक पोस्ट लिखते हैं, भाषण देते हैं कि किस प्रकार दशकों से हमारे कार्यकर्ताओं ने बलिदान दिया है। यह सब सुनकर कार्यकर्ता को लगता है कि दिल्ली में बैठा नेतृत्व उनके दर्द को समझता है, उनके घावों पर मरहम लगा रहा है।

किन्तु, राजनीति की विडंबना देखिए कि वही नेतृत्व जो सुबह कार्यकर्ताओं के बलिदान पर आंसू बहाता है, शाम को उसी अत्याचारी विचारधारा के शीर्ष पुरुषों को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत करता है।

यह विरोधाभास इतना गहरा और पीड़ादायक है कि एक निष्ठावान कार्यकर्ता ठगा सा महसूस करता है।

प्रश्न यह उठता है कि क्या कार्यकर्ताओं का बलिदान केवल चुनावी रैलियों में सहानुभूति बटोरने का साधन मात्र रह गया है, जिसका वास्तविक सम्मान और न्याय से कोई सरोकार नहीं है?

​यह प्रश्न तब और विकराल हो जाता है जब हम देखते हैं कि मोदी सरकार ने केरल के वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता वी.एस. अच्युतानन्दन को पद्म विभूषण जैसे अति-प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा।

वी.एस. अच्युतानन्दन भारत की वामपंथी राजनीति के संस्थापक सदस्य हैं जिसकी वैचारिक छत्रछाया में सदानंदन मास्टर जैसे हजारों स्वयंसेवकों के घर उजड़े, शरीर काटे गए और हत्याएं हुईं। यह 2006 से 2011 तक केरल का मुख्यमंत्री भी रहा है।

जिस विचारधारा ने संघ के कार्यकर्ताओं को ‘वर्ग शत्रु’ मानकर उनका सफाया करने का अभियान चलाया, उसी विचारधारा के सबसे बड़े चेहरे को जब एक ‘राष्ट्रवादी’ सरकार पद्म विभूषण देती है, तो यह उस कटे हुए पैर पर नमक छिड़कने जैसा प्रतीत होता है जो सदानंदन मास्टर ने राज्यसभा की मेज पर रखे थे।

क्या यह सम्मान उन हत्यारों का मनोबल बढ़ाने वाला कदम नहीं है? क्या इससे यह संदेश नहीं जाता कि आप चाहे कितने भी देशभक्तों का रक्त बहा लें, यदि आप राजनीति के शीर्ष पर हैं तो दिल्ली दरबार आपको सम्मानित ही करेगा?

पद्म विभूषण का औचित्य और सिद्धांतविहीन राजनीति का नग्न प्रदर्शन

भाजपा के रणनीतिकारों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर इस ‘दरियादिली’ का आधार क्या है। क्या वी.एस. अच्युतानन्दन को पद्म विभूषण देना कोई कूटनीतिक ‘मास्टरस्ट्रोक’ था?

यदि हाँ, तो यह कैसा मास्टरस्ट्रोक है जो अपने ही परिवार के सदस्यों के बलिदान का मजाक उड़ाता हो? राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, शिष्टाचार हो सकता है, किन्तु विचारधारा के हत्यारों को महिमामंडित करना ‘सबका साथ, सबका विकास’ नहीं बल्कि ‘अपनों का विनाश और शत्रुओं का सम्मान’ प्रतीत होता है।

जब आप एक ओर यह कहते हैं कि केरल में लोकतंत्र की हत्या हो रही है और दूसरी ओर उसी हत्यारी व्यवस्था के संरक्षक को गले लगाते हैं, तो आप अपनी ही विश्वसनीयता को संदिग्ध बना देते हैं।

यह पाखण्ड है जिसे जनता अब समझने लगी है। कार्यकर्ता जमीन पर लाठियां खाता है, अपने अंग गंवाता है, और उसका नेतृत्व वातानुकूलित कमरों में बैठकर ‘राजनीतिक सौहार्द’ के नाम पर उन्हीं अत्याचारियों के साथ पुरस्कारों का आदान-प्रदान करता है।

​यह केवल केरल तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल में भी इसी पटकथा को दोहराने का प्रयास किया गया जब वामपंथी नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य को पद्म भूषण देने की घोषणा की गई।

यह अलग बात है कि उन्होंने अपने वैचारिक अहंकार में इसे अस्वीकार कर दिया, किन्तु भाजपा सरकार ने तो अपनी ओर से थाली परोस ही दी थी। और इस तरह भाजपा ने प्याज भी खाई और जूते भी खाई वाली कहानी को सार्थक कर दिया।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और वामपंथियों के विरुद्ध लड़ते हुए सैकड़ों भाजपा कार्यकर्ताओं ने अपनी जान गंवाई है। उनके परिवार आज भी न्याय की आस में भटक रहे हैं।

ऐसे में, यदि कल को किसी ‘मास्टरस्ट्रोक’ के तहत ममता बनर्जी को भी पद्म सम्मान दे दिया जाए, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यह प्रवृत्ति यह दर्शाती है कि सत्ता के लिए सिद्धांतों की बलि देना अब एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है।

कार्यकर्ता केवल ‘भीड़’ है जिसका उपयोग सत्ता तक पहुँचने के लिए सीढ़ी की तरह किया जाता है और शीर्ष पर पहुँचते ही उस सीढ़ी को लात मार दी जाती है।

​आज जब सदानंदन मास्टर के कटे हुए पैर देश की संसद में रखे गए, तो वे केवल वामपंथी हिंसा की गवाही नहीं दे रहे थे, बल्कि वे उस राजनीतिक पाखण्ड को भी चुनौती दे रहे थे जो दिल्ली में बैठकर राष्ट्रवाद की परिभाषा तय करता है।

एक स्वयंसेवक के लिए, एक संघ निष्ठ कार्यकर्ता के लिए, संगठन और विचारधारा किसी भी व्यक्ति या सरकार से ऊपर होती है।

“हमारे लिए आरएसएस पहले” यह भावना ही उस कार्यकर्ता को जीवित रखती है जो विपरीत परिस्थितियों में भी ध्येय पथ पर अडिग रहता है।

जब उस कार्यकर्ता को लगता है कि उसकी निष्ठा का मोल तोल-मोल की राजनीति में लगाया जा रहा है, तो उसका हताश होना स्वाभाविक है।

सत्ता को यह समझना होगा कि पद्म पुरस्कारों की चमक उन रक्त के धब्बों को नहीं छिपा सकती जो उनके ‘तुष्टीकरण’ के निर्णयों के कारण कार्यकर्ताओं की आत्मा पर लगे हैं।

​अतः, यह आवश्यक है कि भाजपा नेतृत्व इस आत्मघाती और पाखंडपूर्ण नीति का त्याग करे। आप एक ही समय में पीड़ित और पीड़िता के भक्षक, दोनों के साथ खड़े नहीं हो सकते।

यदि सदानंदन मास्टर का बलिदान पूजनीय है, तो वी.एस. अच्युतानन्दन को दिया गया सम्मान एक ऐतिहासिक भूल है, एक अपराध है। इतिहास गवाह है कि जब-जब नेतृत्व ने अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के स्वाभिमान के साथ समझौता किया है, तब-तब उसे काल के गाल में समाना पड़ा है।

यह समय है कि ‘मास्टरस्ट्रोक’ के मोहपाश से बाहर निकलकर वास्तविकता को देखा जाए। सदानंदन मास्टर के कृत्रिम पैर आज भी प्रश्न पूछ रहे हैं कि उनके असली पैरों की कीमत क्या एक पद्म विभूषण थी जो उनके वैचारिक शत्रु की छाती पर सजा दिया गया?

इस प्रश्न का उत्तर मौन रहकर नहीं, बल्कि प्रायश्चित करके ही दिया जा सकता है, अन्यथा यह पाखण्ड राष्ट्रवाद की नींव को खोखला कर देगा।

सदानंदन मास्टर, स्वयंसेवक जिनके पैर वामपंथियों ने काटे, वे क्यों हैं चर्चा में ?

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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