बंगाल चुनाव 2026: भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष ने हाल ही में एक बयान दिया।
उन्होनें कहा कि “अगर देश को बचाना है, तो बंगाल को बचाना होगा”। उनका ये यह बयान पश्चिम बंगाल को लेकर बीजेपी की उस सोच को सामने रखता है, जिसमें यह राज्य अब महज़ राजनीतिक रणभूमि नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान, जनसंख्या संतुलन और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।
बीएल संतोष के मुताबिक, बंगाल की लड़ाई सरकार बदलने की नहीं, बल्कि एक सभ्यता को बचाने की लड़ाई है।
उनका दावा है कि अवैध घुसपैठ और डेमोग्राफिक बदलाव ने राज्य की मूल पहचान को खतरे में डाल दिया है, जिसका असर पूरे देश पर पड़ सकता है।
बीएल संतोष ने क्या कहा और क्यों अहम माना जा रहा उनका बयान
बंगाल चुनाव 2026: बीएल संतोष ने साफ शब्दों में कहा कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए चुनाव सत्ता का साधन नहीं, बल्कि उद्देश्य है।
उनका मानना है कि बंगाल में तेजी से बदल रही जनसंख्या संरचना और राजनीतिक संरक्षण में हो रही घुसपैठ भारत के भविष्य के लिए गंभीर खतरा है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस बदलाव को अब नहीं रोका गया, तो इसका असर सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह देश की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करेगा।
राजनीति से आगे ‘सभ्यता’ का तर्क क्यों दे रही है बीजेपी
बंगाल चुनाव 2026: बीजेपी का दावा है कि पश्चिम बंगाल में बीते कुछ वर्षों में हिंदू समाज को लगातार असुरक्षा का सामना करना पड़ा है।
दुर्गापूजा विसर्जन की तारीखों में बदलाव, राम नवमी जुलूस पर रोक, होली और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान तनाव।
ये सभी उदाहरण पार्टी उस ‘सांस्कृतिक दमन’ के तौर पर पेश करती है, जिसे वह ममता सरकार की तुष्टिकरण नीति से जोड़ती है।
मार्च 2025 में शांतिनिकेतन के सोनाझुरी हाट में बसंत उत्सव और होली समारोह पर प्रतिबंध को भी इसी कड़ी में देखा गया।
पर्यावरण का हवाला देकर लगाए गए इस प्रतिबंध ने राज्य में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था।
डेमोग्राफी बदलाव, आंकड़ों में छुपी कहानी
बंगाल चुनाव 2026: बीजेपी अपने आरोपों के समर्थन में जनगणना के आंकड़ों का हवाला देती है।
2011 की जनगणना के अनुसार, जहां पूरे देश में हिंदू आबादी में लगभग 0.7% की गिरावट दर्ज की गई, वहीं पश्चिम बंगाल में यह गिरावट 1.94% रही।
इसके उलट, राज्य में मुस्लिम आबादी में लगभग 0.8% की वृद्धि दर्ज की गई।
2001 में जहां मुस्लिम आबादी 25% थी, वह 2011 तक 27% से अधिक हो गई।
बीजेपी का दावा है कि यह बदलाव प्राकृतिक नहीं, बल्कि संगठित घुसपैठ का परिणाम है।
सीमावर्ती जिलों में बदला समीकरण
बंगाल चुनाव 2026: बांग्लादेश से सटे मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी 50% से अधिक बताई जा रही है।
उत्तर और दक्षिण 24 परगना में भी यही स्थिति है।
पूर्व टीएमसी विधायक हुमायूँ कबीर ने एक बयां में कहा था कि मुर्शिदाबाद में मुस्लिम आबादी 70% तक पहुँच चुकी है।
उनका ये बयान बीजेपी के दावों को और बल देता है। पार्टी का आरोप है कि इन इलाकों में अवैध घुसपैठियों को वोटर के रूप में स्थापित किया गया, जिससे राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गया।
वोट बैंक की राजनीति और घुसपैठ का आरोप
बंगाल चुनाव 2026: बीजेपी का कहना है कि पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठ को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है।
आरोप है कि घुसपैठिए धीरे-धीरे पहचान पत्र बनवाते हैं और फिर वोट बैंक का हिस्सा बन जाते हैं।
पार्टी के अनुसार, राज्य के 46 विधानसभा क्षेत्रों में एक दशक के भीतर मतदाताओं की संख्या में 40% से अधिक की वृद्धि हुई है, जिनमें से अधिकांश क्षेत्र बांग्लादेश सीमा से लगे हुए हैं।
हिंदू पलायन और बढ़ता सामाजिक तनाव
बंगाल चुनाव 2026: डेमोग्राफिक बदलाव का सीधा असर सामाजिक संतुलन पर पड़ा है।
बीजेपी का दावा है कि कई इलाकों में हिंदू परिवारों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा है। धार्मिक आयोजनों के दौरान हिंसा, झड़पें और डर का माहौल इस पलायन की बड़ी वजह बताई जाती है।
इससे राज्य में ध्रुवीकरण और सामाजिक तनाव बढ़ा है, जो लंबे समय में बंगाल की सामाजिक संरचना को कमजोर कर सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा का एंगल
बंगाल चुनाव 2026: बीजेपी इस मुद्दे को सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं रखती। पार्टी का कहना है कि बंगाल के रास्ते हो रही घुसपैठ का असर असम, त्रिपुरा और पूरे पूर्वोत्तर भारत पर पड़ा है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी बंगाल-बांग्लादेश सीमा को “घुसपैठ का खुला द्वार” बताते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की है।
अवैध हथियार, नशा कारोबार और आतंकवाद से घुसपैठियों के कथित संबंधों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।
क्या बंगाल चुनाव वाकई देश का भविष्य तय करेगा?
बंगाल चुनाव 2026: बीएल संतोष का बयान यही संकेत देता है कि बीजेपी बंगाल चुनाव को 2026 के विधानसभा चुनाव से आगे, एक निर्णायक मोड़ के रूप में देख रही है।
पार्टी के लिए यह लड़ाई सत्ता परिवर्तन से ज्यादा, सांस्कृतिक पहचान, जनसंख्या संतुलन और राष्ट्रीय सुरक्षा को बचाने का मुद्दा बन चुकी है।

