Saturday, February 21, 2026

केरल में गौमांस भक्षण का सच, हिन्दुओं पर थोपा गया बीफ

केरल में बीफ परोटा का षड्यंत्र

​वामपंथ द्वारा थोपी गई संस्कृति का सच

​आज केरल में गौमांस की सब्जी यानि बीफ करी और परोटा को बड़े गर्व के साथ केरल की मूल संस्कृति और पहचान के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।

राजनीतिक दलों के नेताओं के भाषणों से लेकर मुख्यधारा के मलयालम सिनेमा तक, हर जगह इसे एक विशेष और अनिवार्य पहचान के रूप में स्थापित करने का भ्रामक कुप्रयास हो रहा है।

लेकिन जब हम इतिहास के पन्नों को पलटकर देखते हैं तो यह प्रश्न उठता है कि क्या ऐतिहासिक रूप से केरल की संस्कृति हमेशा ऐसी ही थी?

इसका उत्तर स्पष्ट रूप से नहीं है, क्योंकि यह खानपान केरल के समाज और अंततः यहाँ की तथाकथित संस्कृति में जबरन और योजनाबद्ध तरीके से थोपा गया एक एजेंडा है।

इस पूरे षड्यंत्र को समझने के लिए हमें केरल के गौरवशाली अतीत, विदेशी आक्रमणों और वामपंथी राजनीति के गठजोड़ का गहराई से विश्लेषण करना होगा।

​भारतीय संस्कृति में गौमाता का सर्वोच्च स्थान और ऐतिहासिक साक्ष्य

​संपूर्ण भारतवर्ष की तरह केरल के मूल सनातन समाज में भी गौमाता के प्रति अगाध श्रद्धा और असीम सम्मान की भावना सदियों से रची बसी थी।

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इतिहास के पन्ने इस बात के अकाट्य प्रमाण देते हैं कि केरल का हिंदू समाज गाय को अत्यंत पवित्र मानता था और गौहत्या की कल्पना करना भी उनके लिए एक महापाप था।

इब्न बतूता और अब्दुर रज्जाक जैसे प्रसिद्ध विदेशी यात्रियों ने अपने यात्रा वृत्तांतों में स्पष्ट रूप से लिखा है कि तत्कालीन केरल में गाय की हत्या करना सबसे बड़ा और जघन्य अपराध माना जाता था।

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इब्न बतूता द्वारा लिखित वृत्तान्त

उस कालखंड में गौहत्या करने वाले अपराधी को सबसे भयानक और क्रूर मृत्युदंड दिया जाता था, जो दर्शाता है कि समाज और राज्यसत्ता दोनों ही गौवंश की रक्षा के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध थे।

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अब्दुर रज्जाक द्वारा लिखित

​औपनिवेशिक विष और प्राचीन मान्यताओं का क्षरण

​विदेशी आक्रमणकारियों और औपनिवेशिक शक्तियों के आगमन से पहले केरल में सांप्रदायिक सद्भाव की एक अलिखित मर्यादा थी, जिसमें गैर हिंदू समुदाय भी गाय का मांस नहीं खाते थे।

वास्तव में केरल में बसने और व्यापार करने के लिए यह एक अनिवार्य शर्त हुआ करती थी कि कोई भी बाहरी व्यक्ति स्थानीय मान्यताओं का अपमान नहीं करेगा।

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जब पुर्तगाली पहली बार केरल के तटों पर आए, तो वे यह देखकर पूरी तरह से स्तब्ध रह गए थे कि केरल के प्राचीन सनातनी ईसाई भी गाय के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे और बीफ का सेवन नहीं करते थे।

हिंदू और मुस्लिम समुदाय भी एक दूसरे की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए क्रमशः सूअर और गाय के मांस से पूरी तरह परहेज करते थे।

लेकिन समय के साथ पुर्तगाली, डच और ब्रिटिश औपनिवेशिक आकाओं की नकल करते हुए कुछ वर्गों ने अपनी इस प्राचीन और सम्मानजनक परंपरा को त्यागना शुरू कर दिया।

​ब्रिटिश षड्यंत्र और मोपला हिंदू नरसंहार

​केरल में गौहत्या के सामान्यीकरण की जड़ें मुख्य रूप से मुस्लिम बहुल मालाबार क्षेत्र के रक्तरंजित इतिहास में गहराई से छिपी हुई हैं।

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के ब्रिटिश दस्तावेजों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि मालाबार में मोपला मुसलमानों द्वारा की जाने वाली गौहत्या उस समय लगातार होने वाले हिंदू मुस्लिम दंगों का सबसे बड़ा कारण हुआ करती थी।

ब्रिटिश शासक अपनी कुटिल फूट डालो और राज करो की नीति के तहत हिंदुओं के पक्ष में हस्तक्षेप करने से हमेशा इनकार कर देते थे, जिससे कट्टरपंथियों का दुस्साहस और अधिक बढ़ जाता था।

उन्नीस सौ बीस के दशक के भयानक मोपला हिंदू नरसंहार के दौरान अनगिनत ऐसी घटनाएं हुईं जहां उन्मादी भीड़ ने पवित्र हिंदू मंदिरों के प्रांगण में गायों की क्रूरतापूर्वक हत्या की।

गज़नवी से लेकर औरंगजेब तक अनेक विदेशी लुटेरों का एक मुख्य लक्ष्य था, किसी भी हद तक जाकर हिन्दुओं को, उनके मन्दिरों को और उनकी मूर्तियों को नष्ट करना।

1024 में गज़नवी ने मन्दिर पर अपने लुटेरे दल के साथ मंदिर पर धावा बोला और पचास हज़ार हिन्दुओं का कत्लेआम किया।

मालाबार में भी ठीक इसी जेहादी मानसिकता का प्रदर्शन करते हुए मंदिरों को अपवित्र किया गया और हिंदुओं का धर्म भ्रष्ट करने के लिए उन्हें बलपूर्वक बीफ खिलाया गया।

​जनसांख्यिकीय बदलाव और वामपंथी वैचारिक प्रहार

​चूंकि मालाबार क्षेत्र में हिंदू ज़ामोरिन राजाओं का शासन बहुत पहले समाप्त हो गया था और हिंदू आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से का जबरन धर्मांतरण कर दिया गया था, इसलिए इस क्षेत्र में गौहत्या और बीफ का सेवन एक आम बात बन गई।

इसके ठीक विपरीत, त्रावणकोर जैसी रियासतों में जहां हिंदू राजाओं का शासन लंबे समय तक रहा, वहां गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लागू था और कोचीन राज्य में भी इसे कड़ाई से नियंत्रित किया गया था।

उन्नीस सौ बीस के दशक तक ब्रिटिश संरक्षण और जहाज निर्माण के लिए लकड़ी के व्यापार में वर्चस्व के कारण केरल के मोपला मुसलमान आर्थिक रूप से बेहद शक्तिशाली होने लगे थे।

तटीय क्षेत्र होने के कारण ये लोग शुरुआत से ही बर्मा और मलेशिया में व्यापार करते थे और साठ के दशक के खाड़ी देशों के तेल बूम के साथ उन्होंने न केवल अथाह संपत्ति अर्जित की बल्कि अपनी धार्मिक कट्टरता को भी बहुत मजबूत कर लिया।

इसी दौरान केरल के हिंदुओं के साथ इसके ठीक विपरीत घटनाक्रम चल रहा था, जहां भारत की पहली गैर कांग्रेसी कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आई।

​संस्थागत पतन और सूडो सेक्युलरिज्म का नंगा नाच

​सत्ता में आते ही वामपंथियों ने हिंदुओं की पवित्र धार्मिक मान्यताओं पर लगातार वैचारिक और संस्थागत हमले शुरू कर दिए और सभी पारंपरिक संस्थाओं को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर नष्ट करना प्रारंभ कर दिया।

चूंकि ईसाई और मुस्लिम समुदायों ने जबरन और प्रलोभन वाले धर्मांतरण के कारण जनसांख्यिकीय लाभ प्राप्त कर लिया था, इसलिए उन्होंने हिंदू मान्यताओं को कमजोर करने के लिए कम्युनिस्ट राज्यसत्ता के साथ एक अघोषित गठबंधन कर लिया।

सत्तर के दशक के भूमि सुधार कानूनों ने पारंपरिक हिंदू कुलीन वर्ग के आर्थिक और सामाजिक वर्चस्व को बुरी तरह से तोड़ कर रख दिया।

ऐतिहासिक पैटर्न का पालन करते हुए, कट्टरपंथी ताकतों ने पूर्ण राज्य समर्थन के साथ मालाबार में गौहत्या और बीफ का उपयोग करके हिंदुओं को खुलेआम अपमानित और आहत करना शुरू कर दिया।

यह सब एक गहरी साजिश का हिस्सा था ताकि बहुसंख्यक समाज के स्वाभिमान को पूरी तरह से कुचला जा सके।

​सिनेमा और पॉप कल्चर का वैचारिक प्रदूषण

​इस सांस्कृतिक क्षरण और मानमर्दन का एक सबसे प्रमुख उदाहरण आधुनिक मलयालम सिनेमा में बीफ का महिमामंडन है।

जब तक मलयालम सिनेमा उद्योग पर मध्यम वर्गीय और सवर्ण हिंदुओं का प्रभाव था, तब तक फिल्मों में कभी बीफ को नहीं दिखाया जाता था क्योंकि यह उनकी मूल संस्कृति का हिस्सा ही नहीं था।

हालांकि वर्ष दो हजार के बाद जैसे ही मुस्लिम और ईसाई निर्माताओं, निर्देशकों और लेखकों ने फिल्म उद्योग में अपना मजबूत वर्चस्व स्थापित किया, उन्होंने बीफ परोटा की थोपी गई वास्तविकता को केरल की खाद्य संस्कृति के प्रतीक के रूप में स्थापित करना शुरू कर दिया।

फिल्मों में जानबूझकर ऐसे दृश्य डाले जाने लगे जिनका कहानी से कोई लेना देना नहीं होता था, बल्कि उनका एकमात्र उद्देश्य सनातनी भावनाओं को आहत करना और एक विशेष खानपान को सामान्य बनाना था।

​प्रोपेगेंडा का प्रभाव और युवा पीढ़ी का भटकाव

​इस्लामो मार्क्सवादी गठजोड़ द्वारा लोकप्रिय संस्कृति जैसे सिनेमा, थिएटर और मीडिया में बीफ के इर्द गिर्द रचे गए इस निरंतर प्रोपेगेंडा के परिणामस्वरूप एक औसत मलयाली हिंदू यह मानने लगा कि गाय का मांस खाना केरल की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा है।

पर्दे पर दिखाए जाने वाले इस योजनाबद्ध और अतिरंजित दुष्प्रचार ने वास्तविक जीवन को काफी हद तक प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

यह एक ऐतिहासिक विडंबना ही है कि जो परंपरा केवल दस पंद्रह साल पहले कुछ भटके हुए हिंदुओं के बीच गैर हिंदुओं और कम्युनिस्टों के साथ घुलने मिलने की मजबूरी के तहत शुरू हुई थी, उसे आज एक शाश्वत मलयाली परंपरा के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।

हालांकि आज भी केरल में बहुसंख्यक हिंदू बीफ नहीं खाते हैं और इसका सेवन मुख्य रूप से एक वामपंथी राजनीतिक कृत्य बनकर रह गया है, लेकिन इसके सामान्यीकरण ने एक खतरनाक प्रवृत्ति को जन्म दे दिया है।

​भविष्य की चुनौतियां

​यह पूरा घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे कम्युनिस्ट और अब्राहमिक विचारधाराएं बहुत ही कम समय में किसी भी देश की मूल और शाश्वत संस्कृति को नष्ट कर सकती हैं।

आज रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में केरल के युवा बड़ी संख्या में भारत के अन्य शहरी केंद्रों की ओर पलायन कर रहे हैं।

जिस प्रकार पूर्वी एशियाई लोग पश्चिमी देशों में जाकर कुत्तों का मांस खाने से बचते हैं ताकि स्थानीय लोगों की भावनाएं आहत न हों, उसी प्रकार मलयाली युवाओं को भी शेष भारत में अपने वामपंथी अहंकार का प्रदर्शन करने से बचना चाहिए।

इस बीफ महिमामंडन का दुष्परिणाम यह हो रहा है कि अब पूरे भारत में मलयाली समुदाय के लोगों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है और उन्हें अपने खानपान को लेकर स्पष्टीकरण देना पड़ता है।

यह समय केरल के हिंदू समाज के लिए गहन आत्ममंथन का है, क्योंकि वे मूल रूप से भगवान कृष्ण के उपासक हैं जिन्हें इतिहास और शास्त्रों में सदैव गौ रक्षक या गोपाल कहा गया है।

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Samudra
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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