Thursday, June 25, 2026

दान चोरी के षड्यन्त्र की खुली पोल! झूठे निकले सारे आरोप ?

दैत्यराज बलि ने वामन भगवान् को दान में तीन पग भूमि दे दी। गुरु शुक्राचार्य ने रोका, “यह छल है, मत दो।” पर बलि ने कहा, “जो दे दिया, वह वापस नहीं ले सकता।” तीन पग में तीन लोक दे दिए। पर बलि ने कभी “हिसाब” नहीं माँगा कि “मेरी पृथ्वी पर क्या हो रहा है, मेरे स्वर्ग की रसीद बुक कहाँ है?”

सूर्यपुत्र कर्ण ने इन्द्र को दान में वो कवच-कुंडल दे दिए जिनके बिना वह युद्ध में मारा जाता, यह निश्चित था। फिर भी काटकर दे दिया। पर कर्ण ने न इन्द्र से रसीद माँगी, न कवच कुंडल किस अलमारी में रखे हैं यह पूछा, न मीडिया में जाकर रोया कि “मेरा 3 किलो चांदी का कवच अब कहाँ है।”

महाराज हरिश्चन्द्र ने राज्य दान कर दिया विश्वामित्र को। पत्नी और पुत्र बेचने पड़े। श्मशान में डोम के यहाँ नौकरी की। पर कभी विश्वामित्र से नहीं पूछा, “मेरे राज्य का क्या हुआ?, अब वहां के राजकोष की ऑडिट का मुझे इंचार्ज बनाओ”

महर्षि दधीचि से देवताओं ने वज्र बनाने के लिए हड्डियाँ माँगीं। दधीचि ने प्राण त्यागकर अस्थियाँ दे दीं। पर कभी हिसाब नहीं माँगा, “मेरी हड्डियों का वज्र कहाँ है, क्या अभी भी इन्द्र के पास है?, कहीं इंद्राणी तो उसे उपयोग नहीं करतीं!”

महाराज शिबि ने कबूतर की रक्षा के लिए अपने शरीर का मांस तौलकर दान दे दिया। उन्होंने कभी नहीं कहा, “मेरा मांस कहाँ गया, कितने ग्राम था, कबूतर ने सच में खाया या नहीं? दिया तो 50 ग्राम था, बीट कितने ग्राम की की!”

200 किलोमीटर पदयात्रा करने वाला सज्जन, चार वर्ष बाद चैनल पर है, हाथ में दान की तस्वीर लिए, माँग रहा है, “रसीद कहाँ है? चाँदी कहाँ है? हिसाब दो।”

हम केवल इन कथाओं से दुनिया को अपनी महानता दिखाकर ठगते हैं, उन कथाओं के आचरण का अनुकरण नहीं करते।” चन्द हिन्दुओं ने दान देने को व्यापार समझ लिया। और जब व्यापार में घाटा दिखा, तो श्रीराममंदिर को कटघरे में खड़ा कर दिया।

बहुत विवाद किया जा रहा है कि दान की चोरी हो गई। दान की चोरी क्या होती है? किसी ने कहा कि हमने 200 किलो चाँदी की ईंटें मंदिर को दीं, अब हिसाब दो। कोई कह रहा है 60 किलो चाँदी की ईंट दीं, अब दिखाओ कहाँ रखी हैं? किसी ने कहा 3 किलो चाँदी की माला दी, 1 किलो चरण पादुका अर्पित की, अब रसीद दो। अब यही लोग, जिन्होंने स्वयं दिया था, गबन का आरोप लगा रहे हैं।

क्या अब दान का अर्थ “अमानत” हो गया है? क्या समर्पण का मतलब “रसीद” होता है? यदि उत्तर “हाँ” है, तो अपने दिए को दान मत कहना। और यदि उत्तर “नहीं” है, तो जो आज राममंदिर पर कीचड़ उछाल रहे हैं, उनको आइना जरूर दिखाना।

दान की परिभाषा कही गई है, “स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकं परस्वत्वोत्पादनं दानम्।” अपनी वस्तु पर अपना स्वत्व, अपना अधिकार छोड़कर दूसरे का अधिकार उत्पन्न करना। श्रीरामानुजाचार्य ने भी गीताभाष्य में यही कहा है, “आत्मीयस्य द्रव्यस्य परस्वत्वापादनपर्यन्तः त्यागः।” केवल कहने मात्र से अपने अधिकार की निवृत्ति नहीं होती, मन, कर्म और वचन से दान की वस्तु से अपना अधिकार पूर्णतः हटाना पड़ता है।

और भी कहा है, “स्वपरानुग्रहार्थं अर्थिने दीयते इति दानम्।”, अपने और दूसरे के ऊपर अनुग्रह के लिए जो याचक को दिया जाए, वह दान है। यानि दान देना किसी पर एहसान नहीं है, यह खुद पर ही एहसान है, अनुग्रह है। किसको? याचक को। और यहाँ तो रामजन्मभूमि मंदिर ने याचक के रूप में किसी से चाँदी की ईंट माँगी नहीं थी।

क्या मंदिर ने ईंट माँगी थी ? काक भुसुंडी मांगे थे ? यह तथ्य रेखांकित होना चाहिए।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने अनेक बार सार्वजनिक घोषणा की थी, चाँदी की ईंटें न भेजें। बनते मंदिर के बीच चाँदी के फूल, चाँदी के काग-भुसुंडि जैसी चीजें न भेजें। हमारे पास इनके भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं है। चंपत राय जी बार बार ऐसी चीजें देने के लिए मना करते रहे, कहते रहे कि इन चीजों का क्या करेंगे? यह पूछा था, उसका वीडियो है, किसी के पास जवाब नहीं था।

28 जुलाई 2020 को टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में रिपोर्ट छपी हुई है, “अयोध्या: राम मंदिर ट्रस्ट ने उन भक्तों से अपील की है जो राम मंदिर के लिए दान देना चाहते हैं कि वे दान सिर्फ़ बैंक में जमा करके ही दें, न कि कीमती चीज़ों के रूप में। ट्रस्ट ने खास तौर पर भक्तों से कहा है कि वे चांदी या सोने की ईंटें या कोई कीमती रत्न या गहने दान न करें, क्योंकि ट्रस्ट के पास इन धातुओं की असलियत जांचने की कोई सुविधा नहीं है और न ही ऐसी कीमती चीज़ों को रखने की जगह है।

राम मंदिर ट्रस्ट के सचिव चंपत राय ने कहा कि बड़ी संख्या में भक्त राम मंदिर के लिए चांदी की ईंटें दान कर रहे थे, लेकिन इससे ट्रस्ट के लिए मुश्किलें पैदा हो रही थीं क्योंकि वह उनकी कीमत का पता नहीं लगा पा रहा था और न ही उन्हें रख पा रहा था। उन्होंने कहा, “अब तक ट्रस्ट को 1 क्विंटल से ज़्यादा चांदी और दूसरी धातुओं की ईंटें दान में मिल चुकी हैं।” राय ने आगे कहा कि, “भक्तों को सिर्फ़ बैंक में जमा करके ही दान करना चाहिए।” ट्रस्ट ने दान में एक बार 3 mm पतली कॉपर की पत्तियां मांगी थीं, या बैंक ड्राफ्ट और चैक मांगे थे।

तब उन्हें अपशब्द कहे गये कि भक्तों का अपमान कर रहे हैं। पर फिर भी मंदिर ने न सिर्फ ऐसी भेंटें सम्मानपूर्वक रखीं, बल्कि वे सभी सुरक्षित भी हैं, बकायदा रजिस्टर में दर्ज की गई थीं, सभी को रसीद दी गई थीं व यथायोग्य मंदिर के कार्य में उपयोग ले ली गईं। काग भुशुण्डी और चांदी के फूल कारसेवकपुरम भगवान के मंदिर में सुरक्षित और पूजित हैं और 200 किलो चांदी की ईंटों को SBI ने मिंट नाम की संस्था की मदद से गलवा कर आधा-आधा किलो की ब्रिक के रूप में बदलवाकर अपने पास लॉकर में रखा है। जब मंदिर नहीं बना था यह कारसेवकपुरम ही मंदिर था।

फिर भी किसी ने चांदी के फूल भेज दिए, किसी ने चांदी के काक भुसुंडी दिए, किसी ने कई किलो की ईंट भेज दी। किसी समूह ने 60 किलो चांदी की ईंट दे दी आदि आदि आदि।

मंदिर ने मना किया। फिर भी ठूँसा गया। कोई व्यक्ति किसी के घर ज़बरदस्ती कोई वस्तु रख आए, और फिर दो वर्ष बाद आकर पूछे, “मेरी वस्तु कहाँ है?”, तो उसका क्या अर्थ है? सावन में कोई रुद्राभिषेक कराए और चांदी के दो छोटे सर्प चढ़ाए, फिर 3 साल बाद पंडित जी से पूछे कि मेरे चांदी के दो सर्प कहाँ रखे हैं? उनका क्या किया? रसीद दो!

निधि समर्पण अभियान का उद्देश्य केवल अधिकाधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना था, किसी पर कोई दबाव नहीं दिया गया था कि यह दो वह दो, बल्कि कहा गया था आप सिर्फ 1 रूपए दें, 10 रूपए दें या सौ रूपए दें, पर रामकार्य से अवश्य जुड़ें। तो किसी को ऐसा लगता है कि आपने दान देकर राममंदिर पर एहसान कर दिया तो अपने आप को धोखा न दें, आपने अपने ही कल्याण के लिए दान दिया था।

अब कूर्म पुराण में क्या कहा है? “दान का अर्थ है देना, अर्थात् किसी स्थान, गौ, विद्या, द्रव्य, अन्न आदि का देना जिसको वापस लेने की अपेक्षा न हो।”

दोहराने की आवश्यकता नहीं, जिसको वापस लेने की अपेक्षा न हो। यह कूर्मपुराण कह रहा है। पर यहाँ तो दूसरा ही नजारा दिख रहा है, इन्हें भव्य मंदिर नहीं दिख रहा, अपनी चंद किलो की ईंटें शिखर पर सजी देखनी हैं? ऐसी 500-500 किलो चांदी आगरा के एक एक चांदी व्यापारी के घर में रहती है। जिस मंदिर का निर्माण 500 साल बाद हजारों करोड़ से हुआ है उसमें इन्हें अपना योगदान नहीं दिख रहा, इन्हें मंदिर के स्वर्णमण्डित शिखर पर देवध्वज देखना था या चांदी की ईंट?

दानदाताओं के धन से नहीं तो किस धन से बना है ये विराट भव्य श्रीराममंदिर? एक एक हिन्दू के एक एक रूपये से ही बना है, सबके दान से और संकल्प से ही बना है, दिख रहा है, पर कुछ लोगों को भव्य मंदिर के ऊंचे शिखरों में, सुंदर स्तम्भों में, धवल फर्शों में, खुले मंडपों में, देवमूर्तियों के अलंकरणों में, श्रीरामलला के श्रीचरणों में अपना योगदान नहीं दिख रहा।

मंदिर ट्रस्ट द्वारा सभी को जिसने १०० रुपए भी दिए थे उन्हें हाथों हाथ रसीदें दी गई थीं, और ये इतने मूर्ख थे कि अपने “इन्वेस्टमेंट” की रसीदें ही नहीं लीं? इस झूठ का कोई अंत नहीं है। देश भर में हजारों कार्यकर्ताओं द्वारा घर घर जाकर रसीदें दी गयीं थीं बकायदा, और कुछ प्रचार के भूखों को रसीदें नहीं मिलीं। इस बात का क्या प्रमाण है कि इन चंद लोगों को रसीदें नहीं मिलीं? करोड़ों ने दान दिया और 3-4 कुबेर जैसे दानियों को रसीदें नहीं मिलीं? इनको रसीद छिपाने के कितने रुपए रामद्रोहियों ने खिलाए?

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इन प्रचार के भूखों की असली परेशानी बता देता हूँ। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा, सात्त्विक दान वह है जो अनुपकारिणे दिया जाए, जिससे बदले में अपने उपकार की कोई आशा न हो(17.20)। प्रत्युपकार माने केवल पैसा नहीं, कोई भी बदले का फल। यहाँ तक कि “मेरा नाम लिया जाए”, “मेरा सम्मान बढ़े”, “मुझे रसीद मिले”, यह सब प्रत्युपकार की लालसा है।

फिर दूसरे श्लोक में इससे निम्नकोटि का राजस दान बताया, “जो दान किसी चीज के बदले में, फल की कामना के लिए, या क्लेश सहित हो।(17.21)” इनकी लालसा थी, मेरा नाम राममंदिर के पिलर पर खुदे, मेरा नाम राममंदिर के पंखे पर लिखकर घूमे, “मेरी ईंट चंपत राय अपने माथे पर रखकर सोएं”, मेरा विज्ञापन मंदिर ट्रस्ट करे, मुझे VIP ट्रीटमेंट मिले, मेरा यशोगान हो।

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पर जब चांदी की ईंटें देकर भी यह नहीं हुआ तो उम्मीदों पर पानी फिर गया, अब बरसात में मेंढक निकल निकलकर आ रहे हैं। यहाँ प्रभु श्रीरामलला में भक्ति का कोई मौलिक भाव नहीं है, उनकी कोई बात नहीं है, बस हमारी ईंट, हमारा पैसा, हमारी रसीद, हमारा अधिकार। जब वस्तु पर अपना अधिकार छोड़ने से ही दान होता है तो अब ये किस अधिकार की बात की जा रही है ?

एक कोई व्यक्ति पैदल अयोध्या आया, 3 किलो चाँदी की माला देने की बात की, और अब कई वर्ष बाद टीवी चैनलों पर रोता फिर रहा है कि “रसीद नहीं मिली”। इसका उद्देश्य क्या है सुर्खियाँ बटोरने के आलावा?

किसी संगठन का हैड 60 किलो चाँदी की ईंटों पर रोता फिर रहा है, पहली बात तो ये कैसा ज्वैलर समूह है जो श्रीरामजन्मभूमि के लिए केवल 60 किलो चांदी ही इकट्ठी कर पाया वह भी देश भर से! नाक कटवा दी असली ज्वैलर्स की!! एक ज्वैलर के पास ही इससे ज्यादा चांदी होती, और उतनी यह देशभर से इकट्ठी किए हैं। कई साल तक इस बात का मीडिया में खूब प्रचार कर लिया, अपनी संस्था का नाम रोशन कर लिया, वाहवाही बटोरकर दानवीर का टैग ले लिया, अब प्रचार की पूरी कीमत वसूलने के बाद भी रोता फिर रहा है, ये कौनसा दान है?

राजस से भी गिरा हुआ तामस। क्योंकि “असत्कृतम् अवज्ञातम्”(17.22), मंदिर ने ही जब इन वस्तुओं को लेने में अनिच्छा प्रकट की थी, फिर भी प्रचार के लिए जबरदस्ती दिया, यह अवज्ञा है, असत्कार है, तिरस्कार है व्यवस्था का, अहंकार है ये केवल।

किसी ने कई देशों के कई प्रतिनिधि बुलाकर चाँदी की ईंटें दीं, यह सेवा थी, या अपना विज्ञापन? और इन चीजों का शुरुआत से यह लोग मीडिया फुटेज खाते रहे हैं! इससे अच्छा अपने शहर के मंदिर में दान करते तो पंखों पर नाम लिखकर आजीवन घूमता रहता। ऐसे में निराशा स्वाभाविक है।

दिया हुआ वापस लेना महापाप है।

“प्रतिश्रुताप्रदानेन दत्तस्य हरणेन च। जन्मप्रभृति यत्पुण्यं तत्सर्वं विप्रणस्यति॥”

दान की प्रतिज्ञा करके न देने से, और दिए हुए को हरण करने से, जन्म से लेकर अब तक का सम्पूर्ण पुण्य नष्ट हो जाता है।

अब मंदिर पर सार्वजनिक आरोप लगाना, मीडिया में जाकर “मेरी चाँदी कहाँ गई” का निराधार रोना, राजनीतिक दलों से मिलकर षड्यंत्र करना, यह क्या है?

यह मानसिक दत्तापहार है। वाचिक दत्तापहार है। सार्वजनिक दत्तापहार है। दिया हुआ दान जो मांग ले, उससे घृणित कौन होगा?

दिया हुआ वापस तो नहीं लिया जा सकता, तो अब उस पर अपना दावा ठोंककर, मंदिर को “अपना निजी मुनीम” बनाकर, अपनी कीमत आंकी जा रही है, अपनी औकात का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जा रहा है।

श्रीरामजन्मभूमि पर निर्विघ्न विराट भव्य मंदिर निर्माण कराने वाले श्री चंपत राय जी को ऐसी चांदी की औनी पौनी वस्तुओं से परेशानी थी क्योंकि वो मंदिर में स्पष्ट उपयोग होने लायक नहीं थीं और उनके रख रखाव में भी आने वाला संकट साफ दिखाई पड़ रहा था। लेकिन कलियुग के दानी ऐसी वस्तुएँ दान कर रहे थे ताकि वे बाद में अपने अहसान से ट्रस्ट के लोगों का चरित्र हनन कर उनको कलंकित कर सकें।

शास्त्र तो कहता है, जो देवधन पर हाथ साफ करे, उसे सर्प डसे। जो देवधन का हरण करे, वह नरक में जाए। पर जो देवधन पर अपना दावा ठोंकता फिरे, वह तो असल में उस दान का चोर है जो उसने स्वयं दिया था।

जब चाँदी की ईंट राम मंदिर के समर्पण-कोष में चली गई, वह देवस्व हो गई। उस पर अब किसी का अधिकार नहीं, न दानी का, न ट्रस्ट के व्यक्ति का। ट्रस्ट केवल रक्षक है, स्वामी नहीं।

रक्षक से प्रश्न पूछा जा सकता है, किन्तु प्रश्न पूछने का अधिकार दान देने वाले को नहीं है। दान देने वाले ने तो अपना अधिकार उसी क्षण समाप्त कर दिया जब वस्तु मंदिर के नाम समर्पित कर दी। रक्षक से प्रश्न ऊपरी प्रशासनिक व्यवस्था जिसे ऑडिट कहते हैं, वह SIT हो सकती है, वह कर सकती है, करती रही है, कर रही है। पर जो प्रस्तुत किया जा रहा है वह एक बड़े षड्यंत्र के सिवाय कुछ नहीं है।

जिन पार्टियों ने पाँच सौ वर्षों के संघर्ष के विरोध में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, कारसेवकों को भुनवा तक दिया, आज न्यायालय से स्वतःसंज्ञान माँग रहे हैं।

मीडिया के एक वर्ग को यह परम क्षण मिला है। पाँच सौ वर्ष का संघर्ष जिनकी आँखों में चुभ रहा था, उन्हें अब “गबन” का अस्त्र मिल गया।

और जिन दानदाताओं को आगे करके यह सब हो रहा है, वे या तो स्वयं इस खेल में हैं, या अनजाने में मोहरा बने हैं।

जो शक्तियाँ आज “रसीद” और “हिसाब” के नाम पर राम मंदिर पर वार कर रही हैं, वे कल “मूर्ति” और “मंदिर” पर भी वार करेंगी। करती रही हैं।

फोटो में देखिए एक रामभक्त गरीब वृद्धा के 11 रुपए के दान से बना हुआ भव्य दिव्य विराट श्रीराम मंदिर, और उसके 11 रुपए का दान भी इस सम्पूर्ण भव्यता से अधिक महंगा है, मेरे प्रभु श्री रामलला की नजरों में।

जय श्रीराम।

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— मुदित

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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