Thursday, August 13, 2026

Major Somnath Sharma Biography: जेब में भगवद्गीता और प्लास्टर बंधे हाँथ में LMG गन लेकर बचाया श्रीनगर, जानिए भारत के पहले PVC विजेता की कहानी

Major Somnath Sharma Biography: जब 1947 की कड़कड़ाती ठंड में कश्मीर घाटी की सुरक्षा खतरे में पड़ी थी, तब एक 24 साल के युवा अफसर ने बड़गाम के मैदान में वो कर दिखाया जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है।

अपने से सात गुना बड़ी दुश्मन सेना के सामने सीना तानकर खड़े रहने वाले इस जांबाज का नाम था मेजर सोमनाथ शर्मा।

श्रीनगर हवाई अड्डे और कश्मीर को दुश्मनों के हाथों से बचाने के लिए उन्होंने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनकी इसी अतुलनीय वीरता के लिए उन्हें आजाद भारत का पहला परमवीर चक्र (Param Vir Chakra) दिया गया।

व्यक्तिगत परिचय

विवरणजानकारी
पूरा नाममेजर सोमनाथ शर्मा
जन्म तिथि31 जनवरी 1923
शहादत तिथि3 नवंबर 1947 (उम्र 24 वर्ष)
जन्म स्थानदाढ़, जिला कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश
सैन्य टुकड़ी (Regiment)4 कुमाऊँ रेजिमेंट (पहले 19वीं हैदराबाद रेजिमेंट)
रैंकमेजर
मुख्य युद्धद्वितीय विश्व युद्ध (अराकान अभियान), 1947 का भारत-पाक युद्ध
ऐतिहासिक आखिरी संदेश“दुश्मन हमसे सिर्फ 50 गज दूर है… मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और आखिरी आदमी और आखिरी गोली तक लड़ूंगा।”
सर्वोच्च सम्मानपरमवीर चक्र — भारत के पहले प्राप्तकर्ता, मरणोपरांत

फौजी परिवार और देशभक्ति के संस्कार

Major Somnath Sharma Biography: मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के दाढ़ गांव में एक जाने-माने सैन्य परिवार में हुआ था।

उनके पिता अमर नाथ शर्मा सेना में मेजर जनरल थे। देशभक्ति का जज्बा उनके खून में ही था; उनके छोटे भाई विश्व नाथ शर्मा आगे चलकर भारतीय सेना के 14वें थल सेनाध्यक्ष (Army Chief) बने।

बचपन में सोमनाथ अपनी माँ और दादाजी से श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश सुना करते थे, जिसका उनके मन पर गहरा असर पड़ा।

उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई नैनीताल के प्रसिद्ध शेरवुड कॉलेज से की।

इसके बाद वे देहरादून के ‘प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल मिलिट्री कॉलेज’ चले गए और आगे की ट्रेनिंग पूरी करके सेना में शामिल हो गए।

द्वितीय विश्व युद्ध का अनुभव

Major Somnath Sharma Biography: 22 फरवरी 1942 को सोमनाथ शर्मा भारतीय सेना की 19th हैदराबाद रेजिमेंट (जो बाद में 4 कुमाऊँ रेजिमेंट बनी) में बतौर अफसर शामिल हुए।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने बर्मा (म्यांमार) के अराकान इलाके में जापानी सेना के खिलाफ जमकर लोहा लिया।

उस समय उनके कर्नल के. एस. थिमैया (जो बाद में जनरल बने) थे।

युद्ध के दौरान दिखाई गई समझदारी और वीरता के लिए उन्हें सेना की तरफ से विशेष प्रशंसा (Mentioned in Despatches) मिली।

वे हमेशा अपने चाचा कैप्टन के. डी. वासुदेव की शहादत से प्रेरणा लेते थे, जिन्होंने मलाया में अपने साथियों की जान बचाते हुए अपनी कुर्बानी दी थी।

बड़गाम की ऐतिहासिक जंग (1947)

अक्टूबर 1947 में जब पाकिस्तानी सेना ने घुसपैठियों के साथ मिलकर कश्मीर पर हमला किया, तो भारतीय सेना को तुरंत श्रीनगर की रक्षा के लिए भेजा गया। 31 अक्टूबर को मेजर सोमनाथ शर्मा की ‘D’ कंपनी भी श्रीनगर पहुँची।

हैरानी की बात यह थी कि युद्ध के मैदान में उतरने से ठीक कुछ दिन पहले हॉकी खेलते समय मेजर शर्मा का बायाँ हाथ टूट गया था और उस पर प्लास्टर चढ़ा हुआ था।

डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने अपने जवानों के साथ मोर्चे पर जाने की ज़िद की और इजाज़त लेकर ही माने।

श्रीनगर एयरफील्ड की ढाल बने जवान

3 नवंबर 1947 को मेजर शर्मा की कंपनी को श्रीनगर के पास बड़गाम इलाके में गश्त (Patrolling) के लिए भेजा गया ताकि वे उत्तर की ओर से आ रहे दुश्मनों पर नज़र रख सकें।

दोपहर करीब 2:35 बजे, स्थानीय घरों की आड़ लेकर छिपे दुश्मनों ने मेजर शर्मा की टुकड़ी पर अचानक हमला कर दिया।

गाँव वालों को नुकसान न पहुँचे, इसलिए मेजर शर्मा ने तुरंत पलटवार नहीं किया।

लेकिन देखते ही देखते गुल्मर्ग की तरफ से आए 700 से ज़्यादा हथियाबंद पाकिस्तानी कबायलियों ने उनकी कंपनी को तीन तरफ से घेर लिया और मोर्टार से हमला बोल दिया।

मेजर शर्मा अच्छी तरह जानते थे कि अगर बड़गाम गिरा, तो श्रीनगर शहर और वहाँ का एयरफील्ड दोनों दुश्मनों के कब्ज़े में चले जाएँगे।

अपनी टुकड़ी की कम संख्या (कमोबेश 50-60 जवान) के बावजूद उन्होंने पीछे हटने से साफ इनकार कर दिया।

प्लास्टर वाले हाथ से भरी मैगज़ीन

जब भारी गोलीबारी में उनके कई जवान शहीद होने लगे और फायरिंग की ताकत घटने लगी, तो मेजर शर्मा ने हाथ में प्लास्टर बंधे होने के बावजूद खुद मोर्चा संभाल लिया।

वे भाग-भागकर मशीन गन चलाने वाले जवानों को गोलियों की मैगज़ीन भरकर देने लगे।

साथ ही, उन्होंने खुद खुले मैदान में जाकर भारतीय वायुसेना के विमानों को दुश्मनों के ठिकानों की लोकेशन दिखाने के लिए कपड़े की पट्टियाँ बिछाईं।

जब दुश्मन बिल्कुल करीब आ गया, तब उन्होंने ब्रिगेड हेडक्वार्टर को रेडियो पर अपना आखिरी और ऐतिहासिक संदेश भेजा:

“दुश्मन हमसे सिर्फ 50 गज की दूरी पर है। हमारी संख्या बहुत कम है और हम पर भयानक गोलीबारी हो रही है।

लेकिन मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा, जब तक हमारे पास एक भी जवान और एक भी गोली बाकी है, हम आखिरी सांस तक लड़ेगे।”

शहादत और दुश्मन का रुकावट

संदेश भेजने के कुछ ही पलों बाद, गोलियों का सामान बिछाते समय पास में ही एक मोर्टार का गोला आ गिरा।

हुए ज़ोरदार धमाके में 24 साल का यह जांबाज देश पर न्योछावर हो गया।

लेकिन मेजर सोमनाथ शर्मा और उनकी टुकड़ी के इस 6 घंटे के कड़े मुकाबले ने दुश्मन को वहीं रोक दिया।

इस भयंकर लड़ाई में 200 से ज़्यादा कबायली मारे गए और उनका हौसला टूट गया।

इस मिले हुए समय का फायदा उठाकर भारतीय सेना की और टुकड़ियाँ श्रीनगर एयरफील्ड पहुँच गईं और उन्होंने पूरे कश्मीर को दुश्मनों के हाथ में जाने से बचा लिया।

तीन दिन बाद जब उनका पार्थिव शरीर मिला, तो उनके हाथ की पिस्तौल के चमड़े के होल्डर और जेब में रखी भगवद्गीता के पन्नों से उनकी पहचान हुई।

भारत का पहला ‘परमवीर चक्र’ और सम्मान

21 जून 1950 को मेजर सोमनाथ शर्मा को 3 नवंबर 1947 को बड़गाम में दिखाई गई असाधारण वीरता के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान पाने का पहला मौका था।

एक रोचक बात यह भी है कि परमवीर चक्र मेडल को डिज़ा-इन करने वाली सावित्री खानोलकर, मेजर शर्मा के भाई की सास थीं।

शौर्य और सम्मान

नेशनल वॉर मेमोरियल: नई दिल्ली के राष्ट्रीय समर स्मारक में ‘त्याग चक्र’ पर उनका नाम अमर है और ‘परम योद्धा स्थल’ में उनकी प्रतिमा लगाई गई है।

समुद्री जहाज़ को नाम: शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने अपने एक बड़े क्रूड ऑयल टैंकर का नाम MT Major Somnath Sharma, PVC रखा था।

पॉपुलर कल्चर: 1988 में दूरदर्शन के मशहूर धारावाहिक ‘परमवीर चक्र’ के सबसे पहले एपिसोड में दिग्गज अभिनेता फारूक शेख ने मेजर सोमनाथ शर्मा का किरदार निभाया था।

यह भी पढ़े: Captain Vikram Batra: पालमपुर के ‘लव’ से कारगिल के ‘शेरशाह’ तक, परमवीर चक्र विजेता की पूरी कहानी


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