Monday, January 26, 2026

अविमुक्तेश्वरानंद ने रामभद्राचार्य की नेत्रहीनता का उड़ाया मजाक!

अविमुक्तेश्वरानंद

विकलांगता पर प्रहार धर्म की आत्मा पर चोट है

कभी-कभी कोई एक पुराना बयान समाज के सामने एक आईना रख देता है। यह आईना बताता है कि पदवी, दंड और मंच के शोर के बीच हमारी संवेदना कितनी बची है, और धर्म का मूल स्वभाव कितना सुरक्षित है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का एक पुराना बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने जगद्गुरु रामभद्राचार्य की जन्मजात दृष्टिबाधिता को लेकर न केवल अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया, बल्कि विकलांगता को संन्यास और संतत्व से जोड़कर पूरे दिव्यांग समाज के आत्मसम्मान पर चोट की।

यह केवल दो व्यक्तियों का विवाद नहीं है। यह उस सोच की परीक्षा है, जो शरीर की सीमाओं को आत्मा की योग्यता मान बैठती है, और शास्त्र के नाम पर मनुष्यता को छोटा करती है। दिव्यांग समाज में स्वाभाविक क्रोध है, और रामभद्राचार्य जी के भक्तों में भी इस भाषा को लेकर नाराजगी है।

अविमुक्तेश्वरानंद का बयान

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बयान में कहा है,

“आप कहते हैं मैंने शास्त्र पढ़ लिए। शास्त्र में लिखा हुआ है कि जो विकलांग होता है उसको सन्यास का अधिकार नहीं है। उसके बाद भी आप दंड लेकर के सन्यासी बन करके घूम रहे हो लोगों के सामने। क्या वह पंक्ति आपकी दृष्टि में कभी नहीं आई? अंग विकल, आपको अगर शास्त्र पढ़े होते आप आप कहते हैं सर्वस्य लोचनम् शास्त्रम बिल्कुल सही है, आप इस पंक्ति का उदाहरण देते हो अपने वक्तव्य में कि जिसके पास शास्त्र का शास्त्र रूपी आंख नहीं है वो अंधा ही है तो ठीक है आपके पास यह बहुत आंख नहीं है उसके लिए हम कुछ नहीं कहते हैं वो तो उसके लिए कुछ नहीं कहा जा सकता। उसके लिए आपका हम कोई असम्मान नहीं कर रहे हैं। लेकिन आप यह दावा करते हो कि मेरे पास शास्त्र रूपी आंखें हैं। तो शास्त्र रूपी आंखें हैं तो शास्त्र रूपी आंख ने तो बताया है कि जो अंग विकल हो उसको सन्यास नहीं धारण करना चाहिए। तो आपने कैसे धारण कर लिया? शास्त्र विरुद्ध कैसे आप सन्यासी बन के घूम रहे हो?”

यह भाषा स्वयं अपने भीतर कई स्तरों पर समस्याग्रस्त है। एक तरफ विकलांगता को “अंधा” कहकर सार्वजनिक अपमान का औजार बनाया गया, दूसरी तरफ “अंग विकल” होने को संन्यास के अधिकार से जोड़कर धर्म के भीतर ही बहिष्कार की जमीन तैयार की गई। तीसरी और सबसे खतरनाक बात यह कि शास्त्र को “आंख” कहकर, किसी व्यक्ति की जैविक आंखों की अनुपस्थिति का उपहास उसी प्रतीक के सहारे किया गया।

दिव्यांग समाज का अपमान, धर्म के नाम पर बहिष्कार की वकालत

दिव्यांगता किसी व्यक्ति के नियंत्रण में नहीं होती। यह उसी ईश्वर की व्यवस्था का हिस्सा है, जो सबको अलग-अलग सामर्थ्य, अलग-अलग सीमाएं, और अलग-अलग भूमिकाएं देता है। शरीर की कमी को आत्मा की कमी मानना, और उसे साधना, तप, ज्ञान, भक्ति, संन्यास जैसे उच्चतम मानवीय प्रयत्नों से बाहर धकेलना, हिंदू परंपरा की आत्मा के विपरीत है।

हिंदू दृष्टि का सार शरीर-केंद्रित श्रेष्ठता नहीं है। उसका सार चेतना-केंद्रित उन्नयन है। वह व्यक्ति को उसके कर्म, तप, ज्ञान, विनय और साधना से पहचानती है, न कि उसकी इंद्रियों की गणना से। जब कोई धर्माचार्य मंच से यह कहे कि विकलांग व्यक्ति संत नहीं बन सकता, तो यह केवल एक व्यक्ति को नहीं, लाखों दिव्यांग बच्चों, युवाओं, साधकों और परिवारों को संदेश देता है कि वे आध्यात्मिक क्षेत्र में भी दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। यह संदेश अस्वीकार्य है।

जगद्गुरु रामभद्राचार्य का जीवन स्वयं इस सोच का खंडन है

जगतगुरु रामभद्राचार्य जी जन्म से दृष्टिबाधित होते हुए भी तमाम शास्त्रों का अध्ययन कर चुके हैं। उनके भक्त और अनुयायी मानते हैं कि उन्होंने अनेक ग्रंथों पर शोधपरक लेखन और टीकाएं प्रस्तुत की हैं। उन्होंने शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में दिव्यांगों के लिए संस्थागत प्रयास भी किए, जो यह बताता है कि दिव्यांगता साधना, नेतृत्व और ज्ञान-परंपरा की राह में बाधा नहीं, बल्कि कई बार तप और संकल्प की कसौटी बनकर सामने आती है।

किसी व्यक्ति के ज्ञान, साधना और समाज-सेवा को उसकी शारीरिक स्थिति से घटाकर देखना, न केवल अन्याय है बल्कि धर्म की गरिमा के भी विरुद्ध है। जो परंपरा आत्मा को देह से परे मानती है, वहाँ देह के आधार पर किसी को अयोग्य ठहरा देना वैचारिक विडंबना है।

संविधान, समानता और गरिमा की कसौटी

भारत का सामाजिक-नैतिक ढांचा समान गरिमा की बात करता है। दिव्यांग नागरिकों के साथ सम्मान और समान अवसर का सिद्धांत आधुनिक भारत की संवेदनशीलता का हिस्सा है। ऐसे में किसी सार्वजनिक धार्मिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा विकलांगता पर तिरस्कारपूर्ण भाषा का प्रयोग, समाज में भेदभाव और अपमान की प्रवृत्ति को बल दे सकता है। यही कारण है कि ऐसे बयान केवल व्यक्तिगत नहीं रहते; वे सामाजिक संदेश बन जाते हैं, और इसलिए उनकी सार्वजनिक आलोचना भी आवश्यक हो जाती है।

धर्माचार्य समाज के विवेक के सामने अधिक उत्तरदायी होता है। धर्म का मंच वह स्थान नहीं बन सकता जहां दिव्यांगता पर तिरस्कार को “शास्त्रीय” रंग देकर वैध किया जाए।

शास्त्र का नाम लेकर अशास्त्रीय निष्कर्ष

इस बयान का केंद्रीय दावा यह है कि “शास्त्र में लिखा है” कि विकलांग को संन्यास का अधिकार नहीं। लेकिन शास्त्र की प्रकृति आदेश-पत्र नहीं, विवेक-परंपरा है। शास्त्र की चर्चा संदर्भ, उद्देश्य, पात्रता और काल-परिस्थिति के साथ होती है। एक वाक्य उठाकर उसे मनुष्यता के खिलाफ हथियार बना देना, शास्त्र का अध्ययन नहीं, शास्त्र का दुरुपयोग है।

हिंदू परंपरा में भक्ति और ज्ञान दोनों धाराएं बार-बार बताती हैं कि ईश्वर तक पहुंच का मार्ग शरीर की पूर्णता पर नहीं, अंतःकरण की शुद्धता, साधना और सत्यनिष्ठा पर निर्भर है। इसलिए किसी व्यक्ति की विकलांगता को संन्यास के विरुद्ध निर्णायक प्रमाण की तरह पेश करना, धर्म के भीतर ही एक संकीर्ण सामाजिक भेदभाव को जन्म देता है।

अष्टावक्र की कथा और शरीर पर हंसी की मानसिकता

भारतीय परंपरा में अष्टावक्र की कथा बार-बार इसलिए दोहराई जाती है क्योंकि वह शरीर पर ठहाके लगाने वाली सभ्यता को आईना दिखाती है। प्रचलित प्रसंग में वर्णन आता है कि जब अष्टावक्र अपनी विकृत काया के साथ राजा जनक की सभा में पहुंचे तो विद्वान और दरबारी उनके शरीर को देखकर हंसे, और अष्टावक्र ने उत्तर में कहा कि वे इन “चमड़े के पारखियों” पर हंस रहे हैं, क्योंकि उन्हें आत्मा दिखती है, शरीर नहीं। उन्होंने यह भी भाव व्यक्त किया कि मंदिर के टेढ़े होने से आकाश टेढ़ा नहीं होता, और घड़े के फूटने से आकाश नहीं फूटता, ज्ञानी पुरुष आकाश की तरह निर्विकार होते हैं।

इस कथा का संदेश सीधा है। देह की अपूर्णता, चेतना की अपूर्णता नहीं होती। जो व्यक्ति देह को केंद्र बनाकर साधक की योग्यता तय करता है, वह स्वयं धर्म-दर्शन के मूल लक्ष्य से दूर चला जाता है।

पहचान पर हमला: तर्क नहीं, अपमान की राजनीति

जब सार्वजनिक विमर्श में किसी पर प्रहार करना होता है, तो कई बार व्यक्ति के विचारों पर नहीं, उसकी पहचान पर हमला किया जाता है। यहाँ पहचान जाति नहीं, शरीर बन गया। यह वही मानसिकता है जो प्रतिद्वंद्वी को तर्क से नहीं, अपमान से हराना चाहती है।

धर्माचार्य का स्तर यह होना चाहिए कि वह शास्त्रार्थ करे, विचार रखे, मर्यादा निभाए। जो व्यक्ति विकलांगता को लेकर सार्वजनिक अपमान करता है, वह स्वयं अपने पद की गरिमा घटाता है, और परंपरा की भी।

समाज के लिए सबक और परंपरा की रक्षा का रास्ता

धर्म की रक्षा बहिष्कार से नहीं होती। धर्म की रक्षा उस न्यायबुद्धि से होती है जो कमजोर, पीड़ित और सीमित सामर्थ्य वाले व्यक्ति में भी ईश्वर का अंश देखती है। एक स्वस्थ समाज को स्पष्ट कहना चाहिए कि दिव्यांगता पर अपमान धार्मिक भाषा में भी स्वीकार्य नहीं है। यह सामाजिक स्तर पर भी रोका जाना चाहिए और धार्मिक समुदायों के भीतर भी इसकी स्पष्ट निंदा होनी चाहिए।

जो परंपरा स्वयं को करुणा, सत्य, तप और ज्ञान की परंपरा कहती है, वह विकलांगता पर तिरस्कार को अपने भीतर आश्रय नहीं दे सकती। हिंदू समाज को इस बिंदु पर अधिक स्पष्ट होना होगा कि साधना की पात्रता देह की गिनती से नहीं, जीवन की साधना से तय होती है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के इस बयान की कड़ी निंदा आवश्यक है, क्योंकि यह दिव्यांग समाज का अपमान है और शास्त्र के नाम पर बहिष्कार की मानसिकता का विस्तार है। जगद्गुरु रामभद्राचार्य जैसे महापुरुष का जीवन स्वयं इस विचार का खंडन है कि विकलांग व्यक्ति संत, संन्यासी या धर्म-नेता नहीं बन सकता।

धर्म का ध्वज वह नहीं जो दूसरों की कमजोरी खोजकर लहराया जाए। धर्म का ध्वज वह है जो दूसरों की पीड़ा को मर्यादा और करुणा में बदल दे, और समाज को यह याद दिलाए कि ईश्वर तक पहुंचने का अधिकार शरीर की पूर्णता से नहीं, आत्मा की सच्चाई से निर्धारित होता है।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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