Sunday, April 19, 2026

AI का स्वामित्व: भारत अधिपति बनेगा या परतन्त्र उपभोक्ता?

AI : कृत्रिम बुद्धि के अधिपति और परतन्त्र उपभोक्ता

निकट भविष्य में अर्थव्यवस्था, सेना, शिक्षा, चिकित्सा, वाणिज्य, प्रशासन और ज्ञान-उत्पादन पर कृत्रिम बुद्धि का प्रभाव तीव्र गति से बढ़ने वाला है। जो राष्ट्र AI compute, chip, data centre, foundation model, cloud और software stack पर नियंत्रण रखेंगे, वही भविष्य के वास्तविक अधिपति बनेंगे।

जो राष्ट्र केवल बाहर से निर्मित model, API और hardware खरीदकर काम चलाते रहेंगे, वे नाम से स्वतंत्र दिखेंगे, किन्तु व्यवहार में परतन्त्र उपभोक्ता बनकर रह जाएंगे। यही आज के युग का नया और निर्णायक भेद है।

AI की असली ताकत गणना-शक्ति में है

AI की वास्तविक सामर्थ्य किसी app या chatbot में नहीं, बल्कि उसके पीछे काम करने वाली महागणना-शक्ति में निहित है। विशाल GPU cluster, तीव्र network, असीमित storage, सस्ती और निरन्तर विद्युत् आपूर्ति, शीतन-व्यवस्था और दीर्घकालिक पूंजी के बिना कोई राष्ट्र उच्च स्तर का AI विकसित नहीं कर सकता।

जो राष्ट्र इस पूरी शृंखला पर अधिकार रखते हैं, वे केवल तकनीकी उत्पाद नहीं बेचते, बल्कि अन्य राष्ट्रों की ज्ञान-प्रक्रिया, निर्णय-प्रक्रिया और धीरे-धीरे नीति-निर्माण की प्रक्रिया पर भी प्रभाव जमाते हैं। ऐसी स्थिति में AI केवल व्यापार नहीं रहता, वह सामरिक सार्वभौमत्व का मूल साधन बन जाता है।

बाहरी निर्भरता का आकर्षण और उसकी सीमा

कुछ मत यह है कि किसी राष्ट्र को अपना AI बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। बाहर से सर्वोत्तम model लेना, cloud किराये पर लेना और अपने काम चला लेना पर्याप्त है। अल्पकाल में यह विचार आकर्षक लगता है क्योंकि प्रारम्भिक व्यय कम होता है और शीघ्र उपयोग सम्भव हो जाता है।

किन्तु इस मार्ग की सीमा स्पष्ट है। जो साधन बाहर से आता है, उसके नियम भी बाहर से ही आते हैं। उसका मूल्य, उसकी सीमाएं, गोपनीयता नीति, update का अधिकार, censorship-layer और access-control सब पर बाह्य शक्तियों का नियंत्रण रहता है। तब उपभोक्ता राष्ट्र अपने भाषिक, सांस्कृतिक, सैन्य और आर्थिक हितों के अनुरूप AI को पूर्ण रूप से नहीं ढाल सकता।

भारत के लिए सबसे बड़ा प्रश्न

सभी राष्ट्र एक ही दिन में AI-अधिपति नहीं बन सकते, किन्तु जो राष्ट्र वास्तव में महत्त्वपूर्ण हैं, वे AI में परमुखापेक्षी रहकर दीर्घकाल तक अपनी महत्ता नहीं बनाए रख सकते। यही भारत के लिए सबसे बड़ा और सबसे गम्भीर प्रश्न है।

विशाल जनसंख्या, प्रचुर प्रतिभा, बढ़ता हुआ digital बाज़ार और बहुभाषिक ज्ञान-सम्पदा होने के बावजूद यदि भारत विदेशी chip, विदेशी cloud, विदेशी model और विदेशी platform पर आश्रित रहा, तो वह AI-युग में केवल उपभोक्ता-बाज़ार बनकर रह जाएगा। तब भारत की भूमिका निर्माता की नहीं, ग्राहक की होगी; नियन्ता की नहीं, अनुयायी की होगी।

भारत को पाँच मोर्चों पर तत्काल काम करना होगा

भारत को त्वरित गति से पाँच महत्त्वपूर्ण कार्य करने होंगे।

1. पहला, स्वदेशी AI compute parks और विशाल data centres का निर्माण।

2. दूसरा, दीर्घकालिक chip-design तथा packaging-ecosystem के विकास पर बल।

3. तीसरा, भारतीय भाषाओं और भारतीय ज्ञान-परम्परा पर आधारित foundation models का निर्माण।

4. चौथा, defence-AI, scientific-AI, industrial-AI और governance-AI के लिए पृथक-पृथक केन्द्रित कार्यक्रम।

5. पाँचवाँ, विश्वविद्यालयों, उद्योग और राज्यतंत्र के बीच स्थिर गणना-संरचना और talent pipeline की रचना।

इन पाँचों मोर्चों पर एक साथ और निरन्तर काम किए बिना AI-स्वाधीनता सम्भव नहीं।

अधिपति और परतन्त्र का नया वर्गीकरण

AI-युग में भेद केवल धनी और निर्धन का नहीं रहेगा। भेद होगा निर्माता और उपभोक्ता, अधिपति और परतन्त्र, नियन्ता और अनुयायी का। भारत यदि अभी भी शिथिल रहा, तो वह अपने ही समय का मूक दर्शक बनकर रह जाएगा।

जो राष्ट्र AI का स्वामी नहीं, वह भविष्य के इतिहास का भी स्वामी नहीं होगा। राजनीतिक स्वतंत्रता के पश्चात् अब अगला महान लक्ष्य है, गणना-स्वराज्य। AI में स्वाधीनता केवल तकनीकी उन्नति नहीं, राष्ट्रीय आत्मरक्षा का अनिवार्य चरण है।

वैश्विक निवेश और भारत की स्थिति

BBC की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि कृत्रिम बुद्धि के लिए विशाल data centres पर अमेरिका ने 1800 अरब डॉलर, यूरोप ने 190 अरब, चीन ने 80 अरब और खाड़ी के देशों ने 30 अरब डॉलर व्यय किए हैं। रूस के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

भारत में data centres पर व्यय की बड़ी योजनाएं तो हैं, किन्तु AI पर वास्तविक स्वामित्व के लिए chip निर्माण से लेकर ChatGPT जैसे विशाल LLM model बनाने की कोई ठोस योजना अभी तक नहीं है। यही सबसे चिन्ताजनक रिक्तता है।

मेधा के बिना AI-स्वाधीनता असम्भव

इन कार्यों के लिए केवल धन नहीं, असाधारण मेधा भी अनिवार्य है। किन्तु UGC अधिनियम के पश्चात् की शिक्षा-नीति में समानता के नाम पर विद्या के मन्दिरों में अराजकता और अयोग्यता को प्रश्रय मिलता जा रहा है। यह प्रवृत्ति उस दिशा में नहीं जाती जहाँ से लौटा जा सके।

शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए मुफ्त कोचिंग, प्रशिक्षण और अतिरिक्त छात्रवृत्ति जैसी सुविधाएं दी जानी चाहिए, न कि अयोग्यता को संरक्षण।

यह प्रकृति के नियम का विलोम है, जिसे Survival of the Unfit कहा जा सकता है। अयोग्य को कितना भी ऊपर धकेला जाए, वह स्वयं भी डूबेगा और देश को भी डुबोएगा।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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