वास्तु शास्त्र
वास्तु शास्त्र में घर की प्रत्येक दिशा का विशेष महत्व बताया गया है। हर दिशा की अपनी प्रकृति, ऊर्जा और उपयोगिता मानी जाती है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार घर के कुछ हिस्सों का संबंध व्यक्ति की मानसिक स्थिति, भावनाओं और व्यवहार से भी जोड़ा जाता है।
घर में शयनकक्ष और बिस्तर का स्थान निर्धारित करते समय इन दिशाओं का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है। माना जाता है कि कुछ स्थानों पर लगातार सोने से व्यक्ति उदासी, बेचैनी, मानसिक तनाव और थकान जैसी स्थितियों का अनुभव कर सकता है।
पश्चिम उत्तर पश्चिम दिशा में बिस्तर लगाने से पुराने दुखों में उलझा रह सकता है मन
वास्तु शास्त्र में पश्चिम और वायव्य दिशा के बीच स्थित भाग को पश्चिम उत्तर पश्चिम कहा जाता है। इस क्षेत्र का संबंध मन में संचित पुरानी भावनाओं, दुखद स्मृतियों और मानसिक बोझ से माना जाता है। इसे भावनात्मक विसर्जन का स्थान भी समझा जाता है।
वास्तु मान्यताओं के अनुसार इस स्थान पर बिस्तर या सिरहाना रखने से व्यक्ति पुरानी घटनाओं और दुखद अनुभवों में उलझा रह सकता है। अतीत की अप्रिय स्मृतियाँ बार बार मन में उभरती हैं और व्यक्ति के लिए उनसे मानसिक रूप से मुक्त होना कठिन हो सकता है।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति को घर में प्रवेश करते ही मानसिक भारीपन महसूस होने की बात कही जाती है। बिना किसी स्पष्ट कारण उदासी, भीतर खालीपन और निराशा जैसी भावनाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। कभी कभी छोटी घटनाएँ भी पुरानी पीड़ा को फिर से उभार सकती हैं।
पूर्व दक्षिण पूर्व दिशा में सोने से बढ़ सकती है बेचैनी और विचारों की अधिकता
वास्तु शास्त्र में पूर्व और आग्नेय दिशा के मध्य स्थित क्षेत्र को पूर्व दक्षिण पूर्व कहा जाता है। इस स्थान का संबंध विचारों के विश्लेषण, चिंतन और मानसिक मंथन से जोड़ा जाता है। यहाँ मन की सक्रियता अधिक रहने की मान्यता प्रचलित है।
मान्यता है कि इस क्षेत्र में नियमित रूप से सोने वाले व्यक्ति का मन लगातार विचारों में व्यस्त रह सकता है। वह किसी एक घटना या विषय पर बार बार सोचता है। सामान्य परिस्थितियाँ भी उसे गंभीर और चिंताजनक प्रतीत होने लगती हैं।
वास्तु संबंधी मान्यताओं में इस स्थिति को बेचैनी, अनिद्रा और मानसिक तनाव से जोड़ा गया है। व्यक्ति छोटी छोटी बातों पर घबरा सकता है और चिड़चिड़ापन अनुभव कर सकता है। सिर में भारीपन तथा लगातार सोचते रहने की प्रवृत्ति भी इसके संभावित प्रभाव माने जाते हैं।
दक्षिण दक्षिण पश्चिम दिशा में बिस्तर रखने से घट सकती है सक्रियता और उत्साह
घर के दक्षिण और नैऋत्य दिशा के बीच स्थित क्षेत्र को दक्षिण दक्षिण पश्चिम कहा जाता है। वास्तु शास्त्र में इस हिस्से को विसर्जन, व्यय और निष्कासन से संबंधित माना जाता है। यहाँ ऊर्जा के निरंतर बाहर निकलने की अवधारणा प्रचलित है।
इस मान्यता के अनुसार इस स्थान पर लगातार सोने से व्यक्ति की सक्रियता और उत्साह में कमी आ सकती है। उसे शारीरिक तथा मानसिक थकान का अनुभव हो सकता है। दैनिक कार्यों में आलस्य बढ़ने और काम करने की इच्छा घटने की बात भी कही जाती है।
ऐसे स्थान पर शयन करने वाले व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी, निर्णय लेने में संकोच और स्वयं की क्षमताओं पर संदेह जैसी स्थितियों का उल्लेख मिलता है। जीवन के प्रति निराशा, उद्देश्यहीनता और नए कार्य आरंभ करने की प्रेरणा का अभाव भी इससे जोड़ा जाता है।
घर में प्रवेश करते ही क्यों महसूस होने लगती है मानसिक थकान?
वास्तु संबंधी मान्यताओं में इन तीनों क्षेत्रों को शयन के लिए विशेष सावधानी वाला माना गया है। इनके प्रभावों की व्याख्या में बताया जाता है कि व्यक्ति बाहर सक्रिय और उत्साहित दिखाई देने के बावजूद घर पहुँचने पर अचानक मानसिक थकान अनुभव कर सकता है।
पश्चिम उत्तर पश्चिम को पुरानी भावनाओं, पूर्व दक्षिण पूर्व को अत्यधिक चिंतन और दक्षिण दक्षिण पश्चिम को ऊर्जा के व्यय से जोड़कर देखा जाता है। इसी आधार पर इन स्थानों पर बिस्तर लगाने से बचने तथा शयनकक्ष का चयन सावधानीपूर्वक करने की सलाह दी जाती है।
हालाँकि उदासी, चिंता, नींद की परेशानी, आत्मविश्वास की कमी और लगातार थकान का कारण बिस्तर की दिशा होना वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है। इन समस्याओं के पीछे नींद की गुणवत्ता, स्वास्थ्य, तनाव और व्यक्तिगत परिस्थितियों सहित अनेक कारण हो सकते हैं।

