युवा संन्यासियों का उदय भारत के आध्यात्मिक पुनर्जागरण की कहानी
भारत में पिछले कुछ वर्षों में जो दृश्य उभर रहा है वह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं है यह गहरे सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आहट है।
विशेष रूप से उन दो युवा संन्यासियों का प्रादुर्भाव जिन्होंने लाखों भारतीयों के मन में नई ऊर्जा नया आत्मविश्वास और धर्मगत बोध जागृत किया है यह सिद्ध करता है कि परंपराएँ केवल स्मृतियाँ नहीं होतीं।
वे जीवित होती हैं संवहनीय होती हैं और सही हाथों में दी जाएँ तो समाज को दिशा दिखाती हैं। कुछ ही समय में दो युवा संन्यासियों ने राष्ट्रीय विमर्श में अपना प्रभाव जमाया है श्रीमद विद्याधीश तीर्थ स्वामीजी गोकार्ण पार्थगाली मठ के मठाधीश्वर और जगद्गुरु शंकराचार्य श्री विधुशेखर भारती सन्निधानम् शृंगेरी शारदा पीठम् के उत्तराधिकारी।
ये दोनों केवल रूढ़िवादी धार्मिक गुरु नहीं हैं बल्कि भारत के उस नए अध्याय के प्रतीक हैं जहाँ आध्यात्मिक नेतृत्व और युवाओं की ऊर्जा साथ साथ चल रही है।
गोकर्ण पार्थगाली मठ की पाँच शताब्दियों की संघर्षगाथा
गोकर्ण पार्थगाली मठ 1475 में स्थापित हुआ और यह केवल धार्मिक केंद्र नहीं बल्कि ऐतिहासिक ध्वजवाहक है। गोवा और पश्चिमी तट पर पुर्तगालियों के क्रूर शासन के दौरान गोवा इन्क्विजिशन लाखों जबरन धर्मांतरण मंदिरों के विध्वंस और सामूहिक अत्याचारों में गौड़ सारस्वत ब्राह्मण समुदाय का अस्तित्व इसी मठ की दृढ़ता पर टिका रहा।
समुदाय बचा क्योंकि उसके पास आध्यात्मिक नेतृत्व था। मठ केवल उपदेश देने की संस्था नहीं बल्कि रक्षा करने वाला स्तंभ था जिसने शरण भोजन शिक्षा धर्मरक्षा और सांस्कृतिक पहचान सभी कुछ संभाला। आज वही परंपरा युवा मठाधीश्वर विद्याधीश स्वामीजी में दिखती है।
1995 में जन्मे और इंजीनियरिंग पढ़ रहे एक युवा को मात्र 21 वर्ष की आयु में परंपरा का उत्तराधिकारी चुना गया यह बताता है कि हिंदू मठ आयु नहीं क्षमता देखते हैं।
हाल में राम प्रतिमा अनावरण के दौरान उनके द्वारा दिखाए गए नेतृत्व संतुलन और निर्भीकता ने पूरे देश को दिखा दिया कि यह पीढ़ी परंपरा का भार उठाने के लिए सक्षम और सज्जित है।
शृंगेरी शारदा पीठम् और अद्वैत का नवोदय
दूसरे छोर पर हैं श्री विधुशेखर भारती सन्निधानम्। 1993 में जन्मे वैदिक विद्वानों के परिवार में पले बढ़े और बचपन से ही वेद शास्त्र की अद्भुत प्रतिभा का प्रदर्शन करते रहे।
2015 में जगद्गुरु श्री भारती तीर्थ महा सन्निधानम् ने उन्हें संन्यास दीक्षा देकर भारत की सबसे प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा का उत्तराधिकारी स्थापित किया।
उनकी विशिष्टता केवल विद्वत्ता में नहीं बल्कि संवाद की बहुभाषिक क्षमता में है। संस्कृत कन्नड़ तेलुगु तमिल और हिंदी में सहजता से बोलने वाले इस युवा शंकराचार्य ने राष्ट्रीय स्तर पर शास्त्रीय हिंदू विमर्श को नए आत्मविश्वास के साथ पुनर्स्थापित किया है।
उनकी वाणी में संतुलन आधुनिकता की समझ और परंपरा का सौम्य तेज है। आधुनिक मंचों का संयमित उपयोग अद्वैत परंपरा को आज के समय के लिए पुनर्संगठित करने जैसा है।
जिस प्रकार आदि शंकराचार्य ने भारत विहार कर विचार विमर्श के द्वारा सनातन संस्कृति को पुनर्जीवित किया था आज विधुशेखर सन्निधानम् वही कार्य आधुनिक युग में कर रहे हैं।
हिंदू मठों का नेतृत्व मॉडल
कॉरपोरेट संस्थाएँ जहां चालीस वर्षीय लोगों को नेतृत्व देने में संकोच करती हैं वहीं हिंदू मठ 17 से 20 वर्ष के युवाओं को संन्यास देकर आध्यात्मिक नेतृत्व सौंप देते हैं।
यह कोई जोखिम नहीं बल्कि हजारों वर्षों के अनुभव और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि पर खड़ा निर्णय है। हिंदू परंपरा में आयु नहीं देखी जाती।
चरित्र तप अध्ययन सेवा अनुशासन और आंतरिक तेज देखा जाता है। इसीलिए आज सन्यास परंपरा के युवा सदस्य समाज के मध्य खड़े होकर स्पष्टता और जिम्मेदारी का संदेश दे पा रहे हैं।
भविष्य के भारत के आध्यात्मिक नेता
आज ये युवा संन्यासी पूरे भारत में वही कार्य कर रहे हैं जो सामाजिक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना के लिए आवश्यक है।
वे युवाओं में धर्म के प्रति नई रुचि जगा रहे हैं भ्रमित मनों को स्पष्टता दे रहे हैं राष्ट्रीय मंचों पर निर्भीक होकर बोल रहे हैं नीति निर्माताओं से संवाद स्थापित कर रहे हैं और सन्यास धर्म की प्रामाणिकता को पुनर्स्थापित कर रहे हैं।
लाखों लोग उन्हें प्रेरणा के रूप में देखते हैं और भविष्य का भारत उनके नेतृत्व में आध्यात्मिक रूप से सुदृढ़ होता दिख रहा है।
भारत के नए आध्यात्मिक युग का आरंभ
राजनीतिक सैन्य और आर्थिक शक्ति का उदय तभी संपूर्ण होता है जब राष्ट्र की आत्मा जागृत हो। वर्तमान समय में भारत की यही आत्मा पुनर्जीवित हो रही है।
इन युवा संन्यासियों का उदय इस जागरण का संकेत है कि सनातन धर्म की ऊर्जा विचार और परंपरा अब केवल इतिहास नहीं बल्कि वर्तमान बनकर लौट रही है। भारत का आध्यात्मिक भविष्य इन्हीं हाथों में सुरक्षित है।
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