Sunday, January 11, 2026

ट्रम्प की मनमानी के विरुद्ध मोदी का अटल संकल्प और अमेरिका की ध्वस्त कूटनीति

ट्रम्प

विश्व पटल पर आज जो परिदृश्य उभर रहा है, वह मात्र व्यापारिक समझौतों की रस्साकशी नहीं है, बल्कि यह दो भिन्न सभ्यताओं के चरित्र और स्वाभिमान का द्वंद्व है। भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौता (Trade Deal) लंबे समय से अधर में लटका हुआ था और इसके कारणों को लेकर अंतरराष्ट्रीय गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे थे।

अमेरिका द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत का दंडात्मक टैरिफ (Penal Tariff) और ब्राजील पर 25 प्रतिशत का शुल्क लगाना प्रथम दृष्टया एक आर्थिक निर्णय प्रतीत होता है, जिसका कारण रूस से तेल की खरीद बताया गया। यह सर्वविदित सत्य है कि रूस से ऊर्जा संसाधनों का व्यापार चीन भारत से कहीं अधिक करता है और यूरोपियन यूनियन तो आज भी रूस पर निर्भर है, किंतु डोनाल्ड ट्रम्प की ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति को यह तथ्य दिखाई नहीं देते।

यह स्पष्ट है कि रूस से तेल की खरीद मात्र एक छलावा है, एक बहाना है, जिसके पीछे अमेरिका की वह कुत्सित मंशा छिपी थी जिसका सच अब स्वयं अमेरिकी प्रशासन के बयानों से उजागर हो गया है। अमेरिका के वाणिज्य मंत्री (Commerce Secretary) हावर्ड लुटनिक ने मीडिया के समक्ष जो रहस्योद्घाटन किया है, उसने ट्रम्प प्रशासन की ‘ब्लैकमेल कूटनीति’ की पोल खोलकर रख दी है।

ट्रम्प की आत्मश्लाघा और भारत का राष्ट्रवाद

हावर्ड लुटनिक के बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि जुलाई माह में ही व्यापार समझौते के सभी मसौदे और शर्तें तय हो चुकी थीं, किंतु वाशिंगटन को केवल एक चीज का इंतजार था और वह थी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक फोन कॉल। डोनाल्ड ट्रम्प, जो कि घोर आत्मश्लाघा (Narcissism) और अहंकार के शिकार हैं, वे चाहते थे कि जिस प्रकार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने समझौते की अंतिम तिथि से एक दिन पूर्व उन्हें फोन करके याचना की और अगले दिन डील की घोषणा हो गई, ठीक उसी प्रकार भारत के प्रधानमंत्री भी उनके समक्ष नतमस्तक हों। यह ट्रम्प की व्यक्तिगत कुंठा और साम्राज्यवादी मानसिकता का परिचायक है, जहाँ वे अन्य राष्ट्रों के प्रमुखों को अपनी ‘दरबारी संस्कृति’ का हिस्सा बनाना चाहते हैं।

लुटनिक का यह कथन कि “मोदी ने फोन नहीं किया”, यह सिद्ध करता है कि भारत के लिए रूस से तेल खरीदना मुद्दा था ही नहीं, बल्कि मुद्दा यह था कि भारत का नेतृत्व ट्रम्प के अहं की तुष्टि करने के लिए तैयार नहीं था। यह घटनाक्रम सिद्ध करता है कि डोनाल्ड ट्रम्प लगातार झूठ बोल रहे थे कि भारत रूस से तेल खरीदकर अमेरिकी हितों को चोट पहुँचा रहा है, जबकि वास्तविकता यह थी कि वे भारत को झुकाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।

आर्थिक प्रतिबंधों का खोखलापन और भारत की आर्थिक संप्रभुता

अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के बाद वाशिंगटन के ‘डीप स्टेट’ का अनुमान था कि भारत की अर्थव्यवस्था घुटनों पर आ जाएगी और नई दिल्ली गिड़गिड़ाते हुए अमेरिका की शरण में आएगी। परंतु, परिणाम इसके ठीक विपरीत हुआ। भारत की अर्थव्यवस्था न केवल स्थिर रही बल्कि उसने और अधिक तीव्रता से प्रगति की और भारत का निर्यात बढ़ गया। यह घटनाक्रम ट्रम्प के ‘व्यापारिक अहंकार’ पर एक करारा तमाचा है।

अब, जब उनका पहला दांव उल्टा पड़ गया है, तो रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम जैसे नेताओं द्वारा संसद में एक नया बिल लाया जा रहा है, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है। यह एक प्रकार की ‘लटकती तलवार’ है, जिसका उद्देश्य मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना है।

यह बिल पास होगा या नहीं, और यदि पास हुआ तो क्या अमेरिका इसे लागू कर पाएगा, यह भविष्य के गर्भ में है। परंतु, भारत ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी प्रकार की आर्थिक धमकी के आगे अपनी विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। यह भारत की ‘शत्रुबोध’ की क्षमता ही है कि उसने पहले ही अपनी अर्थव्यवस्था को ऐसे बाहरी आघातों को सहने के लिए तैयार कर लिया है।

पश्चिमी लूट की नीति और वैश्विक संसाधनों पर गिद्ध दृष्टि

डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी रिपब्लिकन पार्टी की विदेश नीति अब यूक्रेन-रूस युद्ध को रोकने या मानवाधिकारों की रक्षा करने की नहीं रह गई है, बल्कि उनका एकमात्र एजेंडा अब ‘वैश्विक लूट’ और ‘संसाधन एकत्रीकरण’ का बन गया है। ट्रम्प ने यह स्वीकार कर लिया है कि उन्हें यूक्रेन पर रूसी कब्जे से कोई विशेष आपत्ति नहीं है, क्योंकि अब उनकी नजर वेनेजुएला, ग्रीनलैंड और कोलंबिया जैसे देशों के प्राकृतिक संसाधनों पर है।

अमेरिका की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है और उसे सुधारने का कोई ठोस आर्थिक रोडमैप ट्रम्प प्रशासन के पास नहीं है। वेनेजुएला के साथ जो हुआ, वह आधुनिक युग में ‘राज्य प्रायोजित डकैती’ का ज्वलंत उदाहरण है। अमेरिका की नीति अब यह है कि अन्य देशों के तेल और खनिजों पर कब्जा किया जाए और उन्हें बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारा जाए। यह एक प्रकार का नव-उपनिवेशवाद है, जिसका प्रतिकार करने की क्षमता केवल उन राष्ट्रों में है जिनका नेतृत्व अपनी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जड़ों से जुड़ा हुआ है।

सत्य, झूठ और भारतीय नेतृत्व की अग्निपरीक्षा

मई माह में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने जो झूठ की शृंखला शुरू की थी, वह अभी भी जारी है। उन्होंने दावा किया कि भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवाने में उनकी भूमिका थी, जिसे भारत के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्रालय ने संसद में पूरी दृढ़ता के साथ खारिज कर दिया। ट्रम्प को लगा कि यदि वे एक झूठ को बार-बार दोहराएंगे, तो दुनिया उसे सच मान लेगी, जैसा कि गोएबल्स की थ्योरी कहती है।

परंतु, उन्हें यह भान नहीं था कि उनका सामना किसी पश्चिमी पिठ्ठू नेता से नहीं, बल्कि भारत की उस मिट्टी से बने प्रधानमंत्री से है जो अपनी शर्तों पर दुनिया से बात करता है। हमारे देश में एक ऐसा वर्ग है, जिसे हम ‘सूडो-सेक्युलर’ या ‘बौद्धिक गुलाम’ कह सकते हैं, जो बेशर्मी के साथ अपने ही प्रधानमंत्री को ‘सरेंडर मोदी’ कहने का दुस्साहस करता है।

उन्हें यह बात समझनी होगी कि भारत की सभ्यता यदि हजारों वर्षों के विदेशी आक्रमणों के बाद भी जीवित है, तो उसका कारण हमारे नेतृत्व का वह जुझारूपन है जो आज नरेंद्र मोदी के निर्णयों में परिलक्षित होता है। ट्रम्प को नोबेल पुरस्कार दिलाने की मुहिम में पाकिस्तान ने जिस प्रकार से उनकी ‘ईगो मसाज’ (अहंकार की मालिश) की, भारत ने वैसा करने से साफ इनकार कर दिया।

कूटनीतिक स्वाभिमान: जी-7 और व्हाइट हाउस का प्रकरण

कूटनीतिक मंचों पर भारत के स्वाभिमान की रक्षा का एक और उदाहरण जी-7 की बैठक के दौरान देखने को मिला था। ट्रम्प चाहते थे कि प्रधानमंत्री मोदी जी-7 की बैठक के बाद वाशिंगटन आएं और वहां पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख आसिम मुनीर के साथ एक फोटो खिंचवाएं। यह ट्रम्प की एक कुटिल चाल थी ताकि वे दुनिया को दिखा सकें कि उन्होंने दो परमाणु संपन्न पड़ोसियों को एक मेज पर ला दिया है और स्वयं को एक महान मध्यस्थ साबित कर सकें।

ट्रम्प, आसिम मुनीर, जिसकी अपने ही देश में कोई वैधानिक हैसियत नहीं है, को भारत के प्रधानमंत्री के समकक्ष खड़ा करना चाहते थे। प्रधानमंत्री मोदी ने इस कुचक्र को भांपते हुए स्पष्ट कर दिया कि उनके लिए ओड़िशा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा और अपनी संस्कृति का सम्मान, व्हाइट हाउस के भोज से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

उन्होंने ट्रम्प के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इतना ही नहीं, जब ट्रम्प ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर झूठ बोलना शुरू किया, तो भारत के विदेश मंत्रालय ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए उस पूरी बातचीत का ट्रांसक्रिप्ट (लिखित ब्यौरा) जारी कर दिया, जिससे ट्रम्प का झूठ पूरी दुनिया के सामने बेनकाब हो गया।

1998 की पुनरावृत्ति: वाजपेयी से मोदी तक का सफर

आज का यह घटनाक्रम हमें 1998 के उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाता है जब अटल बिहारी वाजपेयी ने पोखरण में परमाणु परीक्षण का साहसिक निर्णय लिया था। उस समय भी अमेरिका और पश्चिमी जगत के प्रतिबंधों का भय दिखाया जा रहा था। परीक्षण के दिन प्रधानमंत्री कार्यालय में लालकृष्ण आडवाणी और जसवंत सिंह को बुलाकर जब वाजपेयी जी ने अपने निर्णय की सूचना दी, तो वहां उपस्थित सभी को पता था कि इसके आर्थिक परिणाम भयानक हो सकते हैं।

परंतु, वाजपेयी जी ने देश की सुरक्षा और संप्रभुता को अर्थव्यवस्था से ऊपर रखा। उन्होंने यह परवाह नहीं की कि उनकी सरकार रहेगी या जाएगी, या उनकी छवि का क्या होगा। ठीक वही दृढ़ता आज के नेतृत्व में दिखाई देती है। प्रधानमंत्री मोदी को भली-भांति ज्ञात है कि अमेरिका का ‘डीप स्टेट’ दुनिया भर में सरकारों को अस्थिर करने और ‘रेजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) करवाने में माहिर है। हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल इसके उदाहरण हैं। इसके बावजूद, एक महाशक्तिशाली देश के राष्ट्रपति, जो आत्ममुग्धता के शिखर पर है, के सामने झुकने से इनकार करना ‘राष्ट्रनीति’ का सर्वोच्च उदाहरण है।

अमेरिका के वाणिज्य मंत्री का यह कहना कि “डील अब टेबल पर नहीं है”, भारत के लिए कोई चिंता का विषय नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत ने झुकने के बजाय डील रद्द होने की कीमत चुकाना स्वीकार किया। ट्रम्प, जिनका झूठ बोलने में मुकाबला केवल भारत के एक विपक्षी नेता राहुल गांधी से ही किया जा सकता है, यह समझ नहीं पा रहे हैं कि मोदी वह नेता नहीं हैं जो “सर, क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ?” जैसी याचना करेंगे।

भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में जो भी समझौता होगा, वह बराबरी के स्तर पर होगा, न कि किसी दया या दबाव के तहत। यह नया भारत है, जो अपनी शर्तों पर जीता है और अपनी शर्तों पर ही विश्व से व्यवहार करता है।

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Mudit
Mudit
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं और 9 वर्षों से भारतीय इतिहास, धर्म, संस्कृति, शिक्षा एवं राजनीति पर गंभीर लेखन कर रहे हैं।
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