परंपरा, प्रतिरोध और भारतीय सांस्कृतिक विवेक का तीसरा मार्ग
जब पहली जनवरी की सुबह मंदिरों में उमड़ी भीड़ को देखा जाता है, तो इसे केवल एक दृश्य भर मान लेना बौद्धिक आलस्य होगा। यह दृश्य किसी फैशन का अनुगमन नहीं, बल्कि भारत की उस गहरी सांस्कृतिक प्रवृत्ति का प्रमाण है जो हर बाहरी प्रभाव को आत्मसात करने से पहले उसे अपने संस्कारों की कसौटी पर कसती है। यह भीड़ न तो पश्चिमी नववर्ष का उत्सव मनाने निकली है, न ही अपनी परंपराओं से विमुख हुई है। यह भीड़ अपने ढंग से समय को अर्थ देने आई है।
यहाँ प्रश्न नववर्ष का नहीं, समय की व्याख्या का है। भारत में समय कोई सीधी रेखा नहीं, बल्कि चक्र है। यही कारण है कि यहाँ आरंभ और अंत के बीच कोई कटु विभाजन नहीं मिलता। पहला जनवरी इसी चक्र में एक नया बिंदु बन जाता है, न कि कोई निर्णायक सत्य।
स्वतंत्रता के बाद का अधूरा सांस्कृतिक विच्छेद
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि स्वतंत्रता के बाद भारत ने प्रशासनिक सुविधा के नाम पर पोप द्वारा प्रवर्तित ग्रेगोरियन कैलेंडर को ही अपनी आधिकारिक समय व्यवस्था बनाए रखा। जबकि जापान, चीन और अनेक इस्लामी देशों ने स्वतंत्रता के साथ ही अपने देशज कैलेंडरों को सार्वजनिक जीवन में सम्मानजनक स्थान दिया। भारत में ऐसा नहीं हुआ।
यह भूल केवल तकनीकी नहीं थी, यह सांस्कृतिक भी थी। स्वतंत्रता को सत्ता हस्तांतरण तक सीमित कर दिया गया, सभ्यतागत पुनरारंभ के अवसर के रूप में नहीं देखा गया। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकारी समय व्यवस्था और सामाजिक सांस्कृतिक चेतना के बीच एक खाई बनी रही।

परंतु भारत की शक्ति यही है कि वह राज्य से अधिक समाज पर विश्वास करता है। जनता ने इस अंतराल को अपनी श्रद्धा से भर दिया। पहली जनवरी को मंदिर जाना उसी सामाजिक प्रतिक्रिया का रूप है। यह किसी सरकारी आदेश का पालन नहीं, बल्कि सरकारी शून्य को भरने का प्रयास है।
भोली आस्था नहीं, सजीव सांस्कृतिक विवेक
अक्सर इस दृश्य को भोली आस्था कहकर खारिज कर दिया जाता है। यह दृष्टि भारतीय समाज को कम करके आंकती है। मंदिर में शीश झुकाने वाला भारतीय यह नहीं कह रहा कि यही उसका नववर्ष है। वह केवल यह कह रहा है कि समय का कोई भी आरंभ ईश्वर के स्मरण के बिना अधूरा है।
काली मंदिर में देखी गई श्रद्धा, शिवालयों में जलाई गई दीपशिखाएं और राममंदिर में बांटा गया प्रसाद किसी अंधानुकरण का परिणाम नहीं हैं। यह उस मानवीय आवश्यकता की अभिव्यक्ति है जो हर नए चक्र के आरंभ पर मंगलकामना चाहती है।
यह आस्था उन नीतिनिर्माताओं को अनायास ही लज्जित करती है जिन्होंने स्वतंत्र भारत को अंग्रेजी ढांचे की निरंतरता मान लिया। जनता ने दिखा दिया कि सांस्कृतिक चेतना कानूनों से नहीं मरती।
सांस्कृतिक संकरता और तीसरा स्थान
इसे सांस्कृतिक संकरता के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है। यह न शुद्ध परंपरावाद है, न अंधाधुंध आधुनिकीकरण। यह एक तीसरा स्थान है, जहाँ भारतीय समाज अपनी शर्तों पर आधुनिकता को स्वीकार करता है।
भारतीय पश्चिमी समय गणना को अस्वीकार नहीं कर रहा, वह उसे भारतीय अर्थ दे रहा है। यही भारत की ऐतिहासिक विशेषता रही है। यहाँ विदेशी तत्व आए, टिके, बदले और अंततः भारतीय हो गए। बौद्ध धर्म से लेकर इस्लामी स्थापत्य तक, हर प्रभाव ने यहाँ आकर नया रूप पाया।
पहली जनवरी का मंदिर जाना उसी परंपरा का नवीन उदाहरण है। यह प्रतिरोध और समायोजन का समवर्ती अस्तित्व है।
वैश्विक संदर्भ में भारतीय व्यवहार
जापान आज भी अपने पारंपरिक कैलेंडर को सांस्कृतिक पहचान के रूप में संरक्षित करता है। चीन अपने चंद्र नववर्ष को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ता है। इस्लामी देश हिजरी कैलेंडर को धार्मिक और सामाजिक जीवन का केंद्र मानते हैं।
भारत में स्थिति अलग है, क्योंकि यहाँ समाज ने वह भूमिका निभाई है जो राज्य को निभानी चाहिए थी। मंदिरों की भीड़ एक अवचेतन सांस्कृतिक प्रतिरोध है। यह सत्ता के निर्णयों के बावजूद अपनी पहचान बचाए रखने का प्रयास है।
हिंदू दृष्टि में समय और नवआरंभ
हिंदू दर्शन में समय चक्रीय है। हर चक्र एक अवसर है। चैत्र प्रतिपदा, दीपावली, संक्रांति या कोई भी शुभ तिथि इस दर्शन का विस्तार है। पहली जनवरी भी इसी भाव से जुड़ जाती है।
यह कोई धार्मिक विचलन नहीं, बल्कि धर्म की व्यापकता का प्रमाण है। हिंदू धर्म समय को बांधता नहीं, उसे पवित्र करता है। इसलिए कोई भी दिन ईश्वर स्मरण से अपवित्र नहीं होता।
मंदिरों में पहली जनवरी की भीड़ किसी सांस्कृतिक भ्रम का संकेत नहीं है। यह भारतीय समाज की जीवंतता का प्रमाण है। यह दिखाता है कि भारत न तो अपनी परंपराओं से भागता है, न आधुनिकता से डरता है। वह दोनों को अपने भीतर पचाने की क्षमता रखता है।
यही भारत का सभ्यतागत आत्मविश्वास है। यह हिंदुत्व की मूल शक्ति है।

