सोमनाथ मंदिर: आज देशभर में सोमनाथ मंदिर को लेकर चर्चा तेज़ है। इसकी वजह 8 से 11 जनवरी तक आयोजित होने वाला भव्य समारोह है, जो करीब 1000 साल बाद एक ऐतिहासिक संदेश दे रहा है।
यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस अटूट आस्था का प्रतीक है जिसे समय, आक्रमण और सत्ता भी मिटा नहीं सके।
आज सोमनाथ मंदिर फिर उसी गौरव के साथ खड़ा है, जिसके लिए वह सदियों से जाना जाता रहा है।
सोमनाथ मंदिर का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व
सोमनाथ भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे सबसे प्राचीन ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह गुजरात के समुद्र तट पर स्थित है।
बार-बार हुए आक्रमणों के बावजूद यह मंदिर अटूट श्रद्धा और अद्भुत शिल्पकला का संगम बना हुआ है।
मान्यता है कि राजा दक्ष के श्राप से चंद्रमा (सोम) की चमक कम होने लगी थी। इस दोष से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने सोमनाथ तीर्थ पर कठोर तपस्या की।
भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और ज्योतिर्लिंग के रूप में यहां प्रकट हुए। इसी कारण इस स्थान का नाम सोमनाथ पड़ा।
कहा जाता है कि जिन लोगों की कुंडली में चंद्र दोष होता है, उन्हें यहां दर्शन करने से राहत मिलती है।
प्राचीन काल में यह मंदिर अपनी भव्यता, संपन्नता और गहरी आस्था के लिए प्रसिद्ध था। मंदिर की वैज्ञानिक संरचना भी प्राचीन भारतीय ज्ञान की साक्षी है।
महमूद ग़ज़नवी का आक्रमण
11वीं सदी में, वर्ष 1026 ईस्वी में, विदेशी आक्रांता महमूद ग़ज़नवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया।
इतिहास में दर्ज है कि उसने मंदिर को लूटा, तोड़ा और भारी नुकसान पहुंचाया। इस हमले को भारतीय संस्कृति और आस्था पर सीधा हमला माना जाता है।
हालांकि मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया, लेकिन लोगों की श्रद्धा नहीं टूटी। यही सोमनाथ की सबसे बड़ी विशेषता रही है।
हर विनाश के बाद उसका फिर से खड़ा होना। इस हमले से पूरे देश में दुख और आक्रोश फैल गया, लेकिन लोगों की आस्था कभी कमजोर नहीं पड़ी।
17 बार टूटा, फिर भी खड़ा रहा सोमनाथ
इतिहास में कहा जाता है कि सोमनाथ मंदिर को लगभग 17 बार तोड़ा गया। अलग-अलग समय में कई आक्रमणकारियों और शासकों ने इसे नुकसान पहुंचाया।
कभी मंदिर गिराया गया, कभी जलाया गया, तो कभी अपवित्र किया गया।
लेकिन हर बार एक ही बात साबित हुई मंदिर टूटा, पर आस्था नहीं टूटी। लोगों ने हर बार इसे दोबारा खड़ा किया।
यही कारण है कि सोमनाथ को भारत की अटूट श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।
नेहरू जी की चिट्ठियां और उनका दृष्टिकोण
सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का नजरिया अलग था।
उन्होंने इस विषय पर कई पत्र लिखे, जिनमें यह चिंता जताई कि सरकार को धार्मिक गतिविधियों से दूरी बनाए रखनी चाहिए।
उनका मानना था कि जब देश सभी धर्मों को समान मानता है, तो सरकार को किसी एक धर्म से जुड़े कार्यक्रम में भाग नहीं लेना चाहिए।
इतिहास में दर्ज है कि नेहरू जी सोमनाथ के उद्घाटन में राष्ट्रपति की आधिकारिक भागीदारी के पक्ष में नहीं थे।
हालांकि उनके विचारों के बावजूद मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ और उद्घाटन भी संपन्न हुआ।
आज़ादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका
भारत की आज़ादी के तुरंत बाद, वर्ष 1947 में, सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया।
उस समय मंदिर जर्जर अवस्था में था। सरदार पटेल ने कहा था कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण देश के आत्मसम्मान का सवाल है।
उनकी पहल पर मंदिर के पुनर्निर्माण की योजना बनी और कार्य शुरू कराया गया। दुर्भाग्यवश, सरदार पटेल का निधन दिसंबर 1950 में हो गया,
इसलिए वे मंदिर के पूर्ण होने और पूजा समारोह में उपस्थित नहीं हो सके।
सोमनाथ मंदिर में पहली पूजा कब हुई
मंदिर का निर्माण पूरा होने के बाद 11 मई 1951 को भव्य प्राण प्रतिष्ठा और पूजा संपन्न हुई।
इस अवसर पर देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित रहे और उन्होंने मंदिर का औपचारिक उद्घाटन किया।
सोमनाथ: संघर्ष से निर्माण तक
महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण से लेकर 17 बार टूटने और फिर सरदार पटेल के नेतृत्व में पुनर्निर्माण तक, सोमनाथ मंदिर की कहानी संघर्ष, धैर्य और अडिग विश्वास की कहानी है।
यह मंदिर आज इस बात का प्रमाण है कि भारत की सभ्यता को मिटाने की कितनी भी कोशिशें की जाएं, वह हर बार नए रूप में सामने आती है और पहले से अधिक मजबूत बनकर उभरती है।

