सोमनाथ एक ऐसा मंदिर जिसे 17 बार तोड़ा गया: गुजरात के समुद्र किनारे खड़ा सोमनाथ मंदिर सिर्फ पत्थरों की इमारत नहीं है।
यह भारत के हजार साल के संघर्ष, आस्था और कभी न टूटने वाली हिम्मत की कहानी है।
इसे 17 बार तोड़ा गया और 17 बार फिर से खड़ा किया गया। यह मंदिर हमें सिखाता है कि हार वही होती है जो गिरने के बाद उठ न पाए।
सोमनाथ क्यों खास है?
सोमनाथ एक ऐसा मंदिर जिसे 17 बार तोड़ा गया: सोमनाथ भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला और सबसे प्राचीन माना जाता है। यह गुजरात के वेरावल में अरब सागर के किनारे स्थित है।
सोमनाथ नाम दो शब्दों से बना है-
सोम (चंद्रमा) + नाथ (स्वामी), यानी चंद्रमा के स्वामी।
सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आस्था और इतिहास का प्रमाण है। यह मंदिर चांद की तरह कई बार टूटा, लेकिन हर बार फिर से खड़ा हुआ।
पुराने समय में सोमनाथ एक बड़ा व्यापार केंद्र भी था। यहां अरब और तुर्की के व्यापारी आते-जाते थे।
मंदिर में सोने-चांदी का बहुत खजाना था, इसलिए आक्रमणकारियों की नजर बार-बार इस पर पड़ी। लेकिन हर हमले के बाद भी यह मंदिर फिर बन गया।
सोमनाथ का सबसे अंधेरा समय
1706 में औरंगजेब के समय सोमनाथ पर आखिरी बड़ा हमला हुआ। मंदिर को पूरी तरह तोड़ दिया गया और उसी जगह मस्जिद बनवा दी गई।
जो पुजारी परिवार पीढ़ियों से यहां पूजा करते थे, उनका जीवन बहुत कठिन हो गया। इसके बाद करीब 70 साल तक यहां पूजा-पाठ बंद रहा।
न आरती हुई, न शंखनाद। मंदिर पूरी तरह शांत हो गया।
सोमनाथ का पुनर्जन्म
1783 में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर जब सोमनाथ के खंडहर देखने आईं, तो उन्होंने सोचा कि मंदिर कैसे बचाया जाए। अगर बड़ा मंदिर बनाया गया तो दुश्मन फिर तोड़ देंगे।
उन्होंने समझदारी से फैसला लिया कि मंदिर को जमीन के नीचे सुरक्षित रखा जाए। पुराने मंदिर से करीब 200 मीटर दूर उन्होंने गुलाबी पत्थरों से एक छोटा सा साधारण मंदिर बनवाया।
असली ज्योतिर्लिंग को 22 सीढ़ी नीचे जमीन के अंदर रखा गया और ऊपर नकली शिवलिंग रखा गया, ताकि कोई हमलावर असली ज्योतिर्लिंग तक न पहुंच सके। इस तरह अहिल्याबाई ने सोमनाथ की आस्था को बचा लिया।
सोमनाथ की ज्योति जलती रही
अहिल्याबाई द्वारा बनवाए गए इस छोटे मंदिर में 168 साल तक पूजा होती रही। इससे आस्था जीवित रही।
सोमपुरा पुजारियों को वापस बुलाया गया और करीब 70 साल बाद फिर से आरती और शंखनाद शुरू हुआ।
अहिल्याबाई ने “स्पर्श दर्शन” की परंपरा शुरू की, जिसमें हर भक्त बिना भेदभाव के जाकर ज्योतिर्लिंग को छू सकता था। इससे लोगों का विश्वास और मजबूत हुआ।
आज का सोमनाथ
आज जो भव्य सोमनाथ मंदिर दिखाई देता है, उसका निर्माण 1951 में सरदार वल्लभभाई पटेल की पहल पर शुरू हुआ और 1973 में पूरा हुआ।
यह मंदिर आज भारत के गौरव का प्रतीक है।
इसके पास ही अहिल्याबाई द्वारा बनाया गया छोटा गुलाबी मंदिर आज भी मौजूद है, जिसे जूना सोमनाथ कहा जाता है।
यह हमें याद दिलाता है कि असली महानता ऊंची इमारतों में नहीं, बल्कि मुश्किल समय में टिके रहने की ताकत में होती है।
सोमनाथ की कहानी हमें सिखाती है कि भारत को कितनी भी बार गिराने की कोशिश की जाए, वह हर बार फिर खड़ा होगा।
क्योंकि भारत की असली ताकत पत्थरों में नहीं, बल्कि लोगों के विश्वास में है।
जैसे चांद हर अमावस्या के बाद फिर चमकता है, वैसे ही सोमनाथ हर विनाश के बाद फिर उठा। यह सिर्फ मंदिर नहीं, भारत की अमर कहानी है।

