Monday, January 26, 2026

शंकराचार्य बनाम सत्ता: जयललिता के दौर का विवाद जिसने देश में मचाई हलचल

शंकराचार्य बनाम सत्ता: धर्म और राजनीति के बीच टकराव भारत के इतिहास में कोई नई बात नहीं है। जब भी किसी धार्मिक पद या संस्था का प्रभाव सत्ता के समानांतर खड़ा होता दिखता है, टकराव लगभग तय हो जाता है।

शंकराचार्य जैसे पद, जो किसी एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक वैदिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं, हमेशा सत्ता के लिए असहज रहे हैं।

हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश में दिखी खींचतान हो या फिर दो दशक पहले तमिलनाडु में हुआ घटनाक्रम यह संघर्ष बार-बार दोहराया गया है।

दीपावली के दिन हुई गिरफ्तारी

शंकराचार्य बनाम सत्ता: 11 नवंबर 2004 का दिन था। पूरा देश दीपावली मना रहा था, लेकिन कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती के लिए यह दिन जीवन की सबसे कठिन घड़ी लेकर आया।

वे उस समय आंध्र प्रदेश के महबूबनगर में धार्मिक अनुष्ठान की तैयारी कर रहे थे, तभी तमिलनाडु पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया।

उसी रात विशेष विमान से उन्हें चेन्नई लाया गया और वेल्लोर सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया। एक शंकराचार्य का इस तरह गिरफ्तार होना अभूतपूर्व था।

हत्या का आरोप और जांच की कहानी

शंकराचार्य पर कांचीपुरम के वरदराज पेरुमल मंदिर के मैनेजर शंकररमन की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया गया।

शंकररमन की 3 सितंबर 2004 को मंदिर परिसर में निर्मम हत्या कर दी गई थी।

पुलिस जांच में सामने आया कि शंकररमन और मठ प्रशासन के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था।

उसने मठ पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए थे और गुमनाम पत्रों के जरिए सरकार तक अपनी शिकायतें पहुंचाई थीं।

जयललिता का सख्त राजनीतिक फैसला

उस समय तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता थीं, जो कभी शंकराचार्य को अपना आध्यात्मिक गुरु मानती थीं, लेकिन 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद राजनीतिक हालात बदल चुके थे।

केंद्र में यूपीए सरकार बनी और डीएमके सत्ता का हिस्सा बन गई। शंकराचार्य से डीएमके नेताओं की नज़दीकियां जयललिता को अखरने लगीं।

उन्हें यह भी डर था कि कांची मठ एक प्रभावशाली सत्ता केंद्र बनता जा रहा है। ऐसे में शंकररमन हत्याकांड उन्हें निर्णायक कार्रवाई का अवसर बनकर मिला।

जेल में आम कैदी जैसा व्यवहार

शंकराचार्य की गिरफ्तारी के बाद देशभर में विरोध हुआ। भाजपा, विश्व हिंदू परिषद और साधु-संतों ने जयललिता के फैसले की आलोचना की, लेकिन सरकार पीछे नहीं हटी।

जेल में शंकराचार्य को कोई विशेष सुविधा नहीं दी गई। शुरुआत में उन्हें जमीन पर सोना पड़ा। बाद में दबाव बढ़ने पर सीमित पूजा सामग्री, फल और दूध की अनुमति दी गई।

जमानत, ट्रायल और अंततः बरी

करीब दो महीने बाद 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों की कमजोरी को देखते हुए शंकराचार्य को जमानत दे दी। इसके बाद कांचीपुरम में उनके स्वागत ने यह साफ कर दिया कि यह मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि आस्था से जुड़ा था।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केस तमिलनाडु से बाहर पुडुचेरी ट्रांसफर हुआ। लगभग नौ साल चली सुनवाई के बाद,

2013 में अदालत ने शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती, उनके उत्तराधिकारी और अन्य सभी आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया।

धर्म बनाम राजनीति की स्थायी बहस

यह पूरा मामला इस सवाल को छोड़ गया कि क्या धार्मिक पद राजनीति से पूरी तरह सुरक्षित हैं?

शंकराचार्य की गिरफ्तारी और बाद में बरी होना यह दिखाता है कि भारत में धर्म और सत्ता का रिश्ता सम्मान से ज्यादा संदेह और संघर्ष से भरा रहा है।

शायद यही संघर्ष आने वाले समय में भी नए रूपों में सामने आता रहेगा।

WhatsApp Channel Join Now
Telegram Channel Join Now
Madhuri
Madhurihttps://reportbharathindi.com/
पत्रकारिता में 6 वर्षों का अनुभव है। पिछले 3 वर्षों से Report Bharat से जुड़ी हुई हैं। इससे पहले Raftaar Media में कंटेंट राइटर और वॉइस ओवर आर्टिस्ट के रूप में कार्य किया। Daily Hunt के साथ रिपोर्टर रहीं और ETV Bharat में एक वर्ष तक कंटेंट एडिटर के तौर पर काम किया। लाइफस्टाइल, इंटरनेशनल और एंटरटेनमेंट न्यूज पर मजबूत पकड़ है।
- Advertisement -
- Advertisement -

Latest article