रामलला प्रतिष्ठा संवत 2
भारत वर्ष में अनेक संवत प्रचलित हैं जैसे विक्रम संवत, कलि संवत, युधिष्ठिर संवत, महावीर निर्वाण संवत आदि। आज से 5162 साल पहले सम्राट युधिष्ठिर के राज्यारोहण पर आरम्भ हुआ था युधिष्ठिर संवत और 2082 साल पहले सम्राट विक्रमादित्य के राज्यारोहण पर आरम्भ हुआ था विक्रम संवत।
पर सम्राट विक्रमादित्य के राज्यारोहण के 2080 साल बाद भारतवर्ष के इतिहास में वह अवसर आया जब राष्ट्र में एक नए संवत का सूत्रपात हुआ।
22 जनवरी 2024 को पौष शुक्ल द्वादशी सम्वत् 2080 के दिन श्रीरामजन्मभूमि अयोध्या में शताब्दियों के संघर्ष उपरान्त निर्मित नवीन भव्य मन्दिर में नराकृति परब्रह्म भगवान् श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा महाभागवत प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के करकमलों द्वारा की गई।
महाभारत के उपरांत श्रीरामजन्मभूमि मंदिर में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा रामलला के राज्यारोहण से कम नहीं थी, इस महान अवसर पर एक नवीन परमतेजस्वी राष्ट्र जीवन का सूत्रपात हुआ जो अपने आप में एक ऐतिहासिक संवत् का आरम्भ था।
अतः प्रयागराज महाकुम्भ में सन्तों और विद्वानों ने पौष शुक्ल द्वादशी को प्रतिवर्ष ‘श्री रामलला प्रतिष्ठा सम्वत्’ प्रतिष्ठा द्वादशी की पावन तिथि पर मनाने की घोषणा की थी।

31 दिसंबर 2025 से विधिवत आरम्भ होगा ‘श्रीरामलला प्रतिष्ठा संवत–02’
अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा से जुड़े ऐतिहासिक क्षण को आधार बनाकर प्रारम्भ किए गए श्रीरामलला प्रतिष्ठा संवत 2 का आरम्भ हो रहा है। 31 दिसंबर 2025 से यह संवत अपने द्वितीय संवत वर्ष (संवत–02) के रूप में गणना में आएगा। यह केवल एक तिथि परिवर्तन नहीं है, बल्कि हिंदू समाज के कालबोध में एक नए सांस्कृतिक अध्याय का स्थायी प्रवेश है।
महाकुंभ में हुई थी संवत घोषणा की ऐतिहासिक पहल
प्रयागराज महाकुंभ में आयोजित धर्म ज्योतिष महाकुंभ के दौरान संतों, महामंडलेश्वरों और देश के प्रमुख ज्योतिषाचार्यों ने अयोध्या में की प्राण प्रतिष्ठा की तिथि को आधार बनाकर एक नए संवत की घोषणा की थी। इस प्रस्ताव को युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के पश्चात हिंदू धर्म की सबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना माना गया था।
प्रयागराज महाकुंभ 2025 में महामंडलेश्वर पद्मनाभशरण देवाचार्य महाराज ने इस संवत को मनाने का प्रस्ताव धर्म ज्योतिष महाकुंभ में 19 जनवरी 2025 को देश भर के सन्तों और विद्वानों के समक्ष रखा था।
जिसका स्वामी श्री दामोदराचार्य जी महाराज हरिद्वार, स्वामी श्री वृन्दावनबिहारीदास जी महाराज वृन्दावन, पुष्कर पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री वेंकटेशप्रपन्नाचार्य जी महाराज गया बिहार, स्वामी श्रीनिवासाचार्य जी महाराज अयोध्या, स्वामी श्री मदनमोहनाचार्य जी महाराज अयोध्या, अखिल भारतीय विद्वत परिषद के महासचिव आचार्य श्री डॉ कामेश्वर उपाध्याय जी वाराणसी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. श्री भगवतशरण शुक्ल जी, प्रो. श्री रामजीवन मिश्र जी बीएचयू, जयविनोदी जयपुर पञ्चाङ्ग के निर्माता आचार्य श्री आदित्यमोहन शर्मा जी, श्रीनिम्बार्क परिषद् के महामंत्री पञ्चाङ्ग निर्माता श्री अमित शर्मा जी आदि विद्वानों ने शास्त्रों के गहन मंथन के उपरांत अनुमोदन किया था और सभी सन्तों द्वारा श्रीरामलला प्रतिष्ठा संवत की घोषणा की गई थी।

इसके साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि श्रीरामलला प्रतिष्ठा संवत केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्मृति का संवत होगा।
ऐतिहासिक घटनाओं से संवत आरम्भ करने की भारतीय परंपरा
भारतीय सभ्यता में किसी युगांतकारी घटना से कालगणना आरम्भ करने की दीर्घ परंपरा रही है।

- विक्रम संवत का प्रारम्भ सम्राट विक्रमादित्य के राज्यारोहण से
- युधिष्ठिर संवत का आरम्भ महाभारत युद्धोत्तर राज्याभिषेक से
- शक संवत का प्रारम्भ शक नरेशों की सत्ता से
- महावीर निर्वाण संवत का आरम्भ भगवान महावीर के निर्वाण से
इसी परंपरा की निरंतरता में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा को आधार बनाकर नए संवत की घोषणा को सांस्कृतिक दृष्टि से अपरिहार्य थी।

पौष शुक्ल द्वादशी और संवत गणना का आधार
धर्म ज्योतिष महाकुंभ में यह स्पष्ट किया गया कि पौष शुक्ल द्वादशी को प्रतिवर्ष श्रीरामलला प्रतिष्ठा संवत का नया वर्ष माना जाएगा।
- 11 जनवरी 2025 को पौष शुक्ल द्वादशी के दिन प्राण प्रतिष्ठा को एक वर्ष पूर्ण हुआ
- उसी दिन श्रीरामलला प्रतिष्ठा संवत–01 आरंभ हुआ था
रामलला प्रतिष्ठा संवत को पंचांगों में अंकित करने का भी निर्णय लिया गया। देश के ज्यादातर पंचांगकार इस सम्वत को अपने पंचांगों पर अंकित करते हैं।
पंचांगों में अंकन और दीर्घकालिक उद्देश्य
संतों और पंचांग निर्माताओं ने बताया कि विक्रम संवत की भांति श्रीरामलला प्रतिष्ठा संवत को भी देशभर के पंचांगों में दर्ज किया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल तिथि-स्मरण नहीं, बल्कि हजारों वर्षों तक इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति को जीवित रखना है।

धर्माचार्यों के अनुसार, जब कोई संवत पंचांगों में अंकित हो जाता है, तब वह समाज के सामूहिक समयबोध का हिस्सा बन जाता है। इसी प्रक्रिया से श्रीरामलला प्रतिष्ठा संवत को भी स्थायी स्वरूप दिया जा गया है।
वर्तमान में प्रचलित संवत और नया संवत
वर्तमान समय में भारतीय कालगणना में निम्न संवत प्रचलित हैं
- युधिष्ठिर संवत 5162
- विक्रम संवत 2082
- शक संवत 1947
- ईस्वी सन् 2025
इन्हीं के साथ अब श्रीरामलला प्रतिष्ठा संवत–02 का आरम्भ भारतीय समयगणना में एक नए सांस्कृतिक संदर्भ के रूप में दर्ज हो रहा है।
श्री रामलला प्रतिष्ठा संवत का महत्व
धर्माचार्यों का मत है कि श्रीरामलला प्रतिष्ठा संवत किसी राजनीतिक या प्रशासनिक निर्णय का परिणाम नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना से उपजा हुआ संवत है। अयोध्या में हुए इस आयोजन ने हिंदू समाज के आत्मबोध, सांस्कृतिक पुनर्स्मरण और ऐतिहासिक निरंतरता को एक नई दिशा दी है।
उनका मानना है कि आने वाले वर्षों में यह संवत केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सामाजिक स्मृतियों और शैक्षणिक संदर्भों में भी प्रयुक्त होगा।
रामलला प्रतिष्ठा संवत और भविष्य की दिशा
श्रीरामलला प्रतिष्ठा संवत का दूसरा वर्ष इस बात का संकेत है कि यह पहल केवल एक घोषणा तक सीमित नहीं रही। संवत–02 का आरम्भ यह दर्शाता है कि यह कालगणना अब व्यवहारिक और स्वीकृत स्वरूप ग्रहण कर चुकी है।

