प्रो. विनीत चैतन्य
आधुनिक युग में एक वैदिक प्रज्ञा का अवतरण
भारतीय इतिहास के पन्नों में समय-समय पर ऐसे व्यक्तित्वों का आविर्भाव होता है, जो अपनी एक भुजा से प्राचीन ज्ञान के दीप को थामे रहते हैं और दूसरी भुजा से भविष्य की अत्याधुनिक तकनीक का निर्माण करते हैं। 31 जनवरी 2026 को भारत ने ऐसे ही एक मनीषी को खो दिया।
प्रो. विनीत चैतन्य का ब्रह्मलीन होना केवल एक वैज्ञानिक का जाना नहीं है, बल्कि उस सेतु का ओझल हो जाना है जिसने पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के महर्षि पाणिनी को इक्कीसवीं सदी की ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ से जोड़ दिया था।
वे एक ऐसे ‘वैज्ञानिक संत’ थे, जिन्होंने प्रयोगशाला की मशीनों के बीच बैठकर वेदान्त की निर्लिप्तता को जिया और भारतीय भाषाओं की अस्मिता को कंप्यूटर की बाइनरी भाषा में प्रतिष्ठित किया। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने अपने गुरुदेव श्री विनीत चैतन्य को निम्न शब्दों में श्रद्धांजलि अर्पित की,
उनका यह कार्य भारत को ‘डिजिटल डिवाइड’ या अंकीय विभाजन से बचाने का महायज्ञ था। बीसवीं सदी के अंत में जब कंप्यूटर विज्ञान पूरी तरह अंग्रेजी भाषा के आधिपत्य में था, तब उन्होंने पहचाना कि भारत की विशाल जनसंख्या, जो अपनी मातृभाषा में सोचती और कार्य करती है, इस तकनीकी प्रगति से वंचित रह जाएगी।
इसी ऐतिहासिक चुनौती को स्वीकारते हुए उन्होंने अपना जीवन इस ध्येय के लिए समर्पित कर दिया कि भारतीय भाषाएं केवल साहित्य की नहीं, बल्कि विज्ञान और तकनीक की भाषा भी बन सकें। उनका कार्यक्षेत्र विशुद्ध रूप से भाषाई तकनीक विकास द्वारा राष्ट्र निर्माण का था।
पाणिनीयीय व्याकरण और कंप्यूटर विज्ञान का अपूर्व संगम
प्रो. विनीत चैतन्य की मेधा का सबसे प्रखर प्रमाण उनका ‘कंप्यूटेशनल पाणिनीयन ग्रामर’ (CPG) का सूत्रपात था। उन्होंने विश्व को यह दिखाया कि संस्कृत व्याकरण केवल मंत्रोच्चार का साधन नहीं, बल्कि सूचना संसाधन (Information Processing) का सबसे परिष्कृत गणितीय मॉडल है।
जब पश्चिमी जगत ‘सब्जेक्ट-वर्ब-ऑब्जेक्ट’ के सीमित ढांचे में उलझा था, तब प्रो. विनीत चैतन्य ने ‘कारक सिद्धांत’ के माध्यम से कंप्यूटर को यह सिखाया कि शब्द का क्रिया के साथ संबंध उसके वास्तविक अर्थ का वाहक होता है।
भारतीय भाषाओं की ‘स्वतंत्र शब्द क्रम’ (Free Word Order) वाली प्रकृति, जहाँ ‘राम फल खाता है’ और ‘फल राम खाता है’ दोनों सही हैं, को पश्चिमी मॉडल नहीं समझ सकता था। इसके समाधान के लिए उन्होंने भाषा संसाधन को चार स्तरों, सतह स्तर, विभक्ति स्तर, कारक स्तर और अर्थ स्तर, में विभाजित कर एक अभूतपूर्व तकनीकी ढांचा तैयार किया।
उनके द्वारा रचित “Natural Language Processing: A Paninian Perspective” (1995) केवल एक शोध ग्रंथ नहीं, बल्कि चोमस्की के भाषाविज्ञान को भारतीय प्रज्ञा की चुनौती थी। उन्होंने सिद्ध किया कि पाणिनी के सूत्र वास्तव में दुनिया के सबसे प्राचीन और सटीक ‘एल्गोरिदम’ हैं।

इसमें उन्होंने ‘सामान्यीकृत विभक्ति’ (Generalized Vibhakti) की अवधारणा पेश की, जिससे यह सिद्ध हुआ कि पाणिनी के सिद्धांत सार्वभौमिक हैं और अंग्रेजी जैसी ‘स्थान-प्रधान’ भाषाओं पर भी लागू किए जा सकते हैं।
प्रो. विनीत चैतन्य ने ‘अनुसारक’ जैसी प्रणालियों के माध्यम से मशीनी अनुवाद के क्षेत्र में ‘मानव-मशीन सहयोग’ का जो दर्शन दिया, वह आज के ‘एक्सप्लेनेबल AI’ की आधारशिला माना जा सकता है। इसमें उन्होंने ‘भार के साझाकरण’ (Sharing the Load) का सिद्धांत दिया, जहाँ मशीन ‘भाषा का भार’ (व्याकरण/शब्दकोश) उठाती है और मनुष्य ‘बुद्धि का भार’ (संदर्भ/अर्थ) उठाता है।
संपूर्ण भारतीय भाषाओं के AI अनुवादक का यह पहला सफल अभियान था जिसने भारतीय NLP की दिशा को हमेशा के लिए पलट दिया और पाणिनि की संस्कृत व्याकरण को भारतीय ही नहीं अनेक वैश्विक भाषाओं की प्रोग्रामिंग के लिए प्रेरणास्रोत बना दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि पाणिनी का व्याकरण, जो 2500 साल पुराना है, 21वीं सदी के सुपरकंप्यूटर्स के लिए सबसे उपयुक्त ढांचा प्रदान कर सकता है।
IIT से चिन्मय मिशन तक: कर्मयोगी का जीवन पथ
मूलतः रतलाम के निवासी प्रो. विनीत चैतन्य का शैक्षणिक और आध्यात्मिक सफर एक समन्वय का संगम था। IIT कानपुर और IIIT हैदराबाद जैसे संस्थानों में प्रोफेसर रहते हुए भी उनका अंतर्मन सदैव ईश्वर की भक्ति में लगा रहा। राष्ट्र कार्य और आत्म-बोध की प्रेरणा ने उन्हें स्वामी चिन्मयानंद जी के चरणों में पहुँचाया, जहाँ प्रोफेसर वीरेन्द्र सिंह राठौड़ ने चिन्मय मिशन में संन्यास की दीक्षा ली और आचार्य विनीत चैतन्य कहलाए।
संन्यास धारण करने के उपरांत भी उन्होंने प्रयोगशाला का परित्याग नहीं किया, बल्कि उसे ही अपनी तपस्थली बना लिया। वे IIT कानपुर में अपने समय के दौरान प्रोफेसर राजीव संगल और अन्य विद्वानों के साथ मिलकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि पश्चिमी सिद्धांतों की नकल करने के बजाय हमें अपनी जड़ों में समाधान खोजने होंगे।

वे सही अर्थों में एक कर्मयोगी थे। 80 वर्ष की आयु में भी प्रातः 9 से सायं 5 बजे तक वे युवा शोधकर्ताओं के साथ मशीन लर्निंग और न्यूरल नेटवर्क्स की जटिलताओं को सुलझाते थे, और सूर्यास्त के बाद संध्यावंदन करके प्राचीन शास्त्रों के गहन अध्ययन में डूब जाते थे। वे रात्रि के समय प्रतिदिन श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र, रामायण, महाभारत, उपनिषद आदि का अध्ययन रुचिवान छात्रों के साथ करते थे। महाराजश्री स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी के वे अनन्य भक्त थे, इस कारण अद्वैत वेदान्त के महान ज्ञाता होते हुए भी भक्ति से परिपूर्ण थे। वे सदैव ब्रह्मभाव में ही रहते थे और अपने नाम के अनुरूप विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे।
उनकी बौद्धिक कुशाग्रता ऐसी थी कि वे नव्य-न्याय की तकनीकी भाषा का अन्वेषण करते समय उसमें छिपे ‘नॉलेज रिप्रेजेंटेशन’ के सूत्रों को खोज निकालते थे। आज भारत सरकार जिस ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ (IKS) के संवर्धन की बात कर रही है, प्रो. विनीत चैतन्य दशकों पूर्व उसके मौन साधक बनकर उसे व्यावहारिक धरातल पर उतार चुके थे।
प्रो. विनीत चैतन्य ने चिन्मय इंटरनेशनल फाउंडेशन (CIF) के साथ मिलकर प्राचीन पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में संरक्षित करने की परियोजनाओं का नेतृत्व भी किया, जिससे संस्कृत का ज्ञान आधुनिक शोधकर्ताओं के लिए सुलभ हो सके।
भारतीय गुरु-परंपरा के प्रतिनिधि
प्रो. विनीत चैतन्य केवल व्यक्तिगत शोध तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने ‘अक्षर भारती’ जैसे समूहों के माध्यम से शोध में ‘अनामिता’ और ‘सामूहिकता’ के भारतीय आदर्श को पुनर्जीवित किया। उन्होंने तय किया कि शोध पत्र किसी व्यक्ति के नाम से नहीं, बल्कि ‘अक्षर भारती’ के सामूहिक नाम से प्रकाशित होंगे, ताकि अहंकार (Ego) मिटे और केवल ‘ज्ञान’ की प्रतिष्ठा हो।
उनके मार्गदर्शन में ही IIT कानपुर ने ‘गीतासुपरसाइट‘ और ‘वाल्मीकि रामायण‘ जैसी वेबसाइट्स का निर्माण किया, जो आज भी इंटरनेट पर भारतीय संस्कृति के सबसे विश्वसनीय डिजिटल स्रोत हैं।
90 के दशक के अंत में, जब हैदराबाद में सूचना प्रौद्योगिकी का हब विकसित हो रहा था, विनीत चैतन्य और राजीव संगल की जोड़ी ने अपने कार्यक्षेत्र को IIT कानपुर से हैदराबाद स्थानांतरित किया।
1997 में स्थापित ‘इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी’ (IIIT) हैदराबाद में प्रो. विनीत चैतन्य ने ‘भाषा प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र’ (LTRC) की नींव रखी । यह IIIT हैदराबाद का पहला शोध केंद्र था और आज यह भारत का सबसे बड़ा और सबसे प्रतिष्ठित भाषाई शोध केंद्र माना जाता है।
वे IIIT हैदराबाद के ‘भाषा प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र’ (LTRC) के प्राण थे, जहाँ उन्होंने कंप्यूटर वैज्ञानिकों और भाषाविदों को एक मंच पर लाकर ‘इंटरडिसिप्लिनरी शोध’ की नई संस्कृति विकसित की। अपनी सेवानिवृत्ति के 20 साल बाद 80 वर्ष की आयु तक यह वैज्ञानिक संत विश्वविद्यालय में ही एक सामान्य कमरे में रहे और प्रयोगशालाओं में सुबह से शाम तक शोधकर्ताओं का नेतृत्व करते रहे।

देश में शायद ही कोई ऐसा विद्वान होगा जो आज भारतीय भाषाओं और कंप्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स पर काम कर रहा हो और स्वयं को प्रो. विनीत चैतन्य का शिष्य न मानता हो। उनके एक शिष्य ने उन्हें एक छोटी सी काव्यांजलि अर्पित की है,
प्रणाम है आपको हे आचार्यवर!
राष्ट्रगौरव के हे मुखर स्वर।
कर्तव्यनिष्ठता के सूर्य प्रखर।
आचार्यत्व के हे नक्षत्र अमर।
विद्या के अंनत महासागर।
धर्म के हे धवल हिमशिखर।
प्रणाम है आपको हे अचार्यवर!
‘गति-श्रुति-सत्य-तप’ में होकर प्रतिष्ठित।
किया शास्त्रोक्त ऋषि पद को विभूषित।
भाषा के ‘पाणिनि’पद पर सुशोभित।
संस्कृत संगणक को किया समन्वित।
आर्यों को भाषा गौरव का दिया वर!
प्रणाम है आपको हे आचार्यवर!
त्याग और वैराग्य में चरमस्थ विद्यमान।
तथापि प्रवृत्ति के हे स्वरूप मूर्तिमान।
गुरुवर तेजस्वी अंशुमाली समान।
देते ब्रह्मविद्या का अभय दान।
भक्ति के हे जीवन्त कोष अमर!
प्रणाम है आपको हे आचार्यवर!
सदा विनय में स्थिति से ‘विनीत’।
पाषाणों को भी ‘चैतन्य’ता में करते स्थित।
श्रद्धावनत हम ‘अनुसारक’ ‘मुदित’।
संस्कृत संगणक के प्रयाग संगम अकल्पित।
नतमस्तक हम नित निरन्तर!
प्रणाम है आपको हे आचार्यवर!
उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में ‘स्नातक शोध मॉडल’ (Undergraduate Research Model) का क्रांतिकारी प्रयोग किया, जिससे बी.टेक के छात्र भी गंभीर भाषाई शोध से जुड़ सके। उन्होंने केवल इंजीनियर नहीं बनाए, बल्कि ऐसे शोधकर्ता तैयार किए जिनके भीतर अपनी संस्कृति के प्रति गौरव और आधुनिक विज्ञान के प्रति तर्कसंगत दृष्टिकोण था।
उन्होंने सदैव इस बात पर बल दिया कि मशीन लर्निंग ऐसी होनी चाहिए जिसे मानव समझ सके, न कि वह कोई ‘ब्लैक बॉक्स’ बन जाए जिसका नियंत्रण मनुष्य के हाथ से निकल जाए। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ‘LERIL’ और ‘AnnCorra’ जैसी परियोजनाओं के माध्यम से भारतीय भाषाओं के लिए ‘ट्री-बैंक्स’ और भाषाई संसाधनों का एक विशाल मानक भंडार तैयार किया।
सामाजिक सरोकार और जन-भागीदारी का अनूठा प्रयोग
प्रो. विनीत चैतन्य का विज्ञान प्रयोगशालाओं तक ही सीमित नहीं था, वह जन-कल्याण के लिए समर्पित था। उन्होंने ‘शब्दांजलि’ जैसी परियोजनाओं के माध्यम से वैज्ञानिक कार्यों में आम जनता और स्कूली बच्चों को जोड़ा। कार्यशालाओं में उन्होंने स्कूली छात्रों के सहयोग से शब्दकोश निर्माण का कार्य करवाया, जो जन-भागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण था।
इसके साथ ही, ‘अक्षर भारती कम्युनिटी लाइब्रेरी’ के माध्यम से उनके मार्गदर्शन में भारत के 8 राज्यों में 600 से अधिक पुस्तकालय स्थापित किए गए, जिनसे लाखों वंचित बच्चे लाभान्वित हुए। उनका स्पष्ट मत था कि ‘सप्ताह में एक घंटा’ समाज सेवा के लिए निकालना प्रत्येक बौद्धिक नागरिक का कर्तव्य है।
एक निर्लिप्त वेदान्ती की विदाई
प्रो. विनीत चैतन्य का जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि विज्ञान और धर्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। वे हृदय से एक निर्लिप्त वेदान्ती थे, जिन्हें न तो पुरस्कारों का लोभ था और न ही प्रसिद्धि की आकांक्षा। उनके लिए शोध एक आराधना थी और तकनीक सामाजिक कल्याण का साधन।
उनके इसी असाधारण योगदान को मान्यता देते हुए कवि कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक ने उन्हें ‘डी.लिट’ की मानद उपाधि से विभूषित किया था। 31 जनवरी 2026 को जब उन्होंने भौतिक देह का त्याग किया, तब भारतीय भाषा प्रौद्योगिकी के एक युग का अंत हो गया। जीवन के उपरांत भी उनके नेत्र दो जीवनों का जीवन आलोकित करेंगे।

किंतु, उनके द्वारा रोपे गए विचार बीज आज ‘अनुसारक’ और ‘भारतीय भाषा तकनीक’ के रूप में फल-फूल रहे हैं। उनकी स्मृतियाँ हमें सदैव यह स्मरण कराती रहेंगी कि भारत को विश्वगुरु बनने के लिए पश्चिम की नकल करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपनी ही प्राचीन प्रज्ञा को आधुनिक संदर्भों में पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता है।
आज के ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स’ (LLMs) के दौर में उनकी ‘पारदर्शी और तर्कसंगत एआई’ की दृष्टि और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। एक ऐसे महामानव, गुरु और वैज्ञानिक ऋषि के चरणों में संपूर्ण राष्ट्र कृतज्ञता के साथ नमन करता है।


