सोमनाथ मंदिर: पीएम मोदी का पूरा भाषण
जय सोमनाथ, जय सोमनाथ, जय जय सोमनाथ।
आज देश के कोने-कोने से लाखों लोग जुड़े हैं हमारे साथ। उन सबको भी मेरी तरफ से जय सोमनाथ। साथियों, यह समय अद्भुत है। यह वातावरण अद्भुत है। यह उत्सव अद्भुत है। एक ओर स्वयं देवाधिदेव महादेव, दूसरी ओर समुद्र की विशाल लहरें, सूर्य की किरणें, मंत्रों की ये गूंज, आस्था का यह उफान।
और इस दिव्य वातावरण में भगवान सोमनाथ के आप सब भक्तों की उपस्थिति यह इस अवसर को दिव्य बना रही है। भव्य बना रही है। और मैं इसे अपना बहुत बड़ा सौभाग्य मानता हूं कि सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में मुझे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में सक्रिय सेवा का अवसर मिला है।
72 घंटों तक अनवरत ओमकार का नाद, 72 घंटों का अनवरत मंत्रोच्चार और मैंने देखा कल शाम को 1000 ड्रोंस द्वारा वैदिक गुरुकुलों के 1000 विद्यार्थियों की उपस्थिति, सोमनाथ के 1000 वर्षों की गाथा का प्रदर्शन और आज 108 अश्वों के साथ मंदिर तक शौर्य यात्रा, मंत्रों और भजनों की अद्भुत प्रस्तुति, सब कुछ मंत्रमुग्ध कर देने वाला है।
इस अनुभूति को शब्द अभिव्यक्त नहीं कर सकते। इसे केवल समय ही संकलित कर सकता है। इस आयोजन में गर्व है, गरिमा है, गौरव है। और इसमें गरिमा का ज्ञान भी है। इसमें है वैभव की विरासत। इसमें है आध्यात्म की अनुभूति। अनुभव है, आनंद है, आत्मीयता है। और सबसे बढ़कर देवाधिदेव महादेव का आशीर्वाद है।
आइए मेरे साथ बोलिए नमः पार्वती पतये हर हर महादेव। साथियों, आज जब मैं आपसे बात कर रहा हूं तो मन में बार-बार यह प्रश्न आ रहा है कि ठीक 1000 साल पहले ठीक इसी जगह पर जहां आप बैठे हैं, क्या माहौल रहा होगा?
आप जो यहां उपस्थित हैं उनके पुरखों ने, आपके पुरखों ने, हमारे सारे पुरखों ने जान की बाजी लगा दी थी। अपनी आस्था के लिए, अपने विश्वास के लिए, अपने महादेव के लिए उन्होंने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। हजार साल पहले तब वो आतताई सोच रहे थे कि हमें जीत लिया।
लेकिन आज 1000 साल बाद भी सोमनाथ महादेव के मंदिर पर फहरा रही ध्वजा पूरी सृष्टि का आह्वान कर रही है कि हिंदुस्तान की शक्ति क्या है? उसका सामर्थ्य क्या है? प्रभास पाटन तीर की इस मिट्टी का कण-कण शौर्य, पराक्रम और वीरता का साक्षी है।

सोमनाथ के स्वरूप के लिए कितने ही शिव भक्तों ने, संस्कृति के उपासकों ने, संस्कृति के ध्वज धारकों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। आज सोमनाथ स्वाभिमान पर्व पर सबसे पहले मैं हर उस वीर वीरांगना को नमन करता हूं, जिसने सोमनाथ की रक्षा को, मंदिर के पुनर्निर्माण को अपना जीवन ध्येय बनाया। अपना सब कुछ देवाधिदेव महादेव को अर्पण कर दिया।
भाइयों बहनों, प्रभास पाटन का यह क्षेत्र भगवान शिव का अपना क्षेत्र तो है ही, इसकी पवित्रता भगवान श्री कृष्ण से भी जुड़ी है। महाभारत काल में पांडवों ने भी इस तीर्थ में तपस्या की थी। इसलिए यह अवसर भारत के अनगिनत आयामों को नमन करने का भी अवसर है।
यह भी एक सुखद संयोग है कि आज जब सोमनाथ मंदिर के स्वाभिमान यात्रा के 1000 साल पूरे हो रहे हैं, तो साथ ही 1951 में हुए इसके पुनर्निर्माण के 75 साल भी पूरे हो रहे हैं। मैं दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालुओं को सोमनाथ स्वाभिमान पर्व की शुभकामनाएं देता हूं।
साथियों, सोमनाथ स्वाभिमान पर्व 1000 साल पहले हुए विध्वंस के स्मरण के लिए नहीं, यह पर्व हजार साल की यात्रा का पर्व है। साथ ही यह हमारे भारत के अस्तित्व और अभिमान का पर्व है क्योंकि हमें हर कदम पर, हर मुकाम पर सोमनाथ और भारत में अनोखी समानताएं दिखती हैं।
जैसे सोमनाथ को नष्ट करने के एक नहीं अनेकों प्रयास हुए, दुष्प्रयास हुए। उसी तरह विदेशी आक्रांताओं द्वारा कई सदियों तक भारत को खत्म करने की लगातार कोशिशें होती रहीं। लेकिन ना सोमनाथ नष्ट हुआ और ना ही भारत नष्ट हुआ। क्योंकि भारत और भारत की आस्था के केंद्र एक दूसरे में समाए हुए हैं।
साथियों, आप उस इतिहास के बारे में कल्पना करिए। आज से हजार साल पहले सन 1026 में सबसे पहले गजनी ने सोमनाथ मंदिर को तोड़ा। उसे लगा उसने सोमनाथ का वजूद मिटा दिया। लेकिन कुछ वर्षों के भीतर-भीतर सोमनाथ का पुनर्निर्माण हो चुका था। 12वीं शताब्दी में राजा कुमार पाल ने मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार करा दिया था।
लेकिन 13वीं शताब्दी के अंत में अलाउद्दीन खिलजी ने सोमनाथ पर फिर आक्रमण का दुस्साहस कर दिया। कहते हैं जालौर के रावल ने खिलजी सेनाओं से जमकर लोहा लिया। इसके बाद 14वीं शताब्दी की शुरुआत में जूनागढ़ के राजा द्वारा फिर से सोमनाथ की प्रतिष्ठा संपन्न कर दी गई।

14वीं शताब्दी के आखिरी वर्षों में मुजफ्फर खान ने सोमनाथ पर फिर हमला किया। वो हमला भी नाकाम रहा। 15वीं शताब्दी में सुल्तान अहमद शाह ने सोमनाथ मंदिर को दूषित करने की कोशिश की और इसी शताब्दी में उसके पोते सुल्तान महमूद बेगड़ा ने सोमनाथ पर आक्रमण कर मंदिर को मस्जिद बनाने की कोशिश की।
लेकिन महादेव के भक्तों के प्रयासों से मंदिर पुनः जीवंत हो उठा। 17वीं-18वीं शताब्दी में औरंगजेब का दौर आया। उसने सोमनाथ मंदिर को अपवित्र किया। सोमनाथ को फिर मस्जिद बनाने की कोशिश की। उसके बाद भी अहिल्याबाई होलकर ने नए मंदिर की स्थापना कर सोमनाथ को एक बार फिर साकार कर दिया।
यानी सोमनाथ का इतिहास विनाश और पराजय का इतिहास नहीं है। यह इतिहास विजय और पुनर्निर्माण का है। हमारे पूर्वजों के पराक्रम का है। हमारे पूर्वजों के त्याग और बलिदान का है। आतताई आते रहे। मजहबी आतंक के नए-नए आक्रमण होते रहे। लेकिन हर युग में सोमनाथ पुनः पुनः स्थापित होता रहा।
इतनी सदियों तक का संघर्ष, इतना लंबा प्रतिकार, इतना महान धैर्य, सृजन और पुनर्निर्माण का ऐसा जीवट, यह सामर्थ्य, अपनी संस्कृति में ऐसा विश्वास और ऐसी आस्था, दुनिया के इतिहास में ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है। जरा मैं जवाब मांगता हूं, आप जो आपने आप पूर्वजों ना पराक्रम नो पुण्य स्मरण करवु जोइए कि ना करवु जोइए?
आपणा पूर्वजो ए करेला पराक्रम माथी प्रेरणा लेवी जोइए कि नहीं लेवी जोइए? कोई दीकरो होय, एवो कोई संतान होय के जे पोताना पूर्वजों ने भूलवा माटे नाटक करे? भाइयों बहनों, जब गजनी से लेकर औरंगजेब तक तमाम आक्रांता सोमनाथ पर हमला कर रहे थे, तो उन्हें लग रहा था कि उनकी तलवार सनातन सोमनाथ को जीत रही है।
वह मजहबी कट्टरपंथी यह नहीं समझ पाए कि जिस सोमनाथ को वह नष्ट करना चाहते हैं, उनके नाम में ही सोम अर्थात अमृत जुड़ा हुआ है। उसमें हलाहल को पीकर भी अमर रहने का विचार जुड़ा है। उसके भीतर सदा शिव महादेव के रूप में वो चैतन्य शक्ति प्रतिष्ठित है, जो कल्याणकारक भी है और प्रचंड तांडव, शिवा, यह शक्ति का स्रोत भी है।
भाइयों बहनों, सोमनाथ में विराजमान महादेव उनका एक नाम मृत्युंजय भी है। मृत्युंजय, जिसने मृत्यु को जीत लिया हो। जो स्वयं काल स्वरूप है। यतो जायते पाल्यते विश्वम, तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम। अर्थात यह सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न होती है। उन्हीं में लय हो जाती है।

हम मानते हैं- त्वमेको जगत व्यापको विश्वरूपा। यानी शिव पूरे जगत में व्याप्त है। इसलिए हम कण-कण, कंकण में भी उस शंकर को देखते हैं। फिर कोई उन शंकर के कितने स्वरूपों को नष्ट कर सकता है? हम तो वो लोग हैं जो जीव में भी शिव को देखते हैं। उनसे हमारी आस्था को कोई कैसे डिगा सकता था?
और साथियों, यह समय चक्र है कि सोमनाथ को ध्वस्त करने की मंशा लेकर आए मजहबी आतताई आज इतिहास के कुछ पन्नों में सिमट कर रह गए हैं। और सोमनाथ मंदिर उसी विशाल समंदर के किनारे गगनचुंबी धर्मध्वजा को थामे खड़ा है। सोमनाथ का यह शिखर मानव उद्घोष कर रहा है- चंद्रशेखरम आश्रये मम किम करिष्यति वै यमः।
अर्थात मैं चंद्रशेखर शिव पर आश्रित हूं। काल भी मेरा क्या कर लेगा? साथियों, सोमनाथ स्वाभिमान पर्व इतिहास के गौरव का पर्व तो है ही, यह कालातीत यात्रा को भविष्य के लिए जीवंत बनाने का माध्यम भी है। हमें इस अवसर को अपने अस्तित्व और पहचान को सशक्त करने के लिए उपयोग करना है।
आप भी देखते हैं अगर कहीं किसी देश के पास कुछ 100 साल पुरानी विरासत होती है, तो वो देश उसे अपनी पहचान बनाकर दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है। वहीं भारत के पास सोमनाथ जैसे हजारों साल पुराने पुण्य स्थान हैं। ये स्थान हमारे सामर्थ्य, प्रतिरोध और परंपरा के पर्याय रहे।
लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के बाद गुलामी की मानसिकता वाले लोगों ने उनसे पल्ला झाड़ने की कोशिश की। उस इतिहास को भुलाने के कुत्सित प्रयास हुए। हम जानते हैं सोमनाथ की रक्षा के लिए देश ने कैसे-कैसे बलिदान दिए थे। रावल कन्नड़ जैसे शासकों के प्रयास, वीर हमीर जी गोहिल का पराक्रम, वेगड़ा भील का शौर्य, ऐसे कितने ही नायकों का इतिहास सोमनाथ मंदिर से जुड़ा है।
लेकिन दुर्भाग्य से इन्हें कभी उतना महत्व नहीं दिया गया। बल्कि आक्रमण के इतिहास को भी कुछ इतिहासकारों और राजनेताओं द्वारा वाइट वॉश करने की कोशिश की गई। मजहबी उन्माद की मानसिकता को केवल साधारण लूट बताकर ढकने के लिए किताबें लिखी गईं। सोमनाथ मंदिर एक बार नहीं, बार-बार तोड़ा गया।
अगर सोमनाथ पर आक्रमण केवल आर्थिक लूट के लिए हुए होते, तो हजार साल पूर्व पहली बड़ी लूट के बाद रुक गए होते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सोमनाथ के पवित्र विग्रह को तोड़ा गया। बार-बार मंदिर का स्वरूप बदलने की कोशिश हुई। और हमें पढ़ाया गया कि सोमनाथ को लूट के लिए तोड़ा गया था।

नफरत, अत्याचार और आतंक का असली क्रूर इतिहास हमसे छिपाया गया। साथियों, हमने धर्म के प्रति ईमानदार कोई भी व्यक्ति ऐसी कट्टरपंथी सोच का समर्थन नहीं करेगा। लेकिन तुष्टिकरण के ठेकेदारों ने हमेशा इस कट्टरपंथी सोच के आगे घुटने टेके। जब भारत गुलामी की बेड़ियों से मुक्त हुआ, जब सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण की शपथ ली, तो उन्हें भी रोकने की कोशिश की गई।
1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के यहां आने पर भी आपत्ति जताई गई। उस समय सौराष्ट्र के सर्वाधिक मशहूर हमारे जाम साहब महाराजा दिग्विजय सिंह जी आगे आए थे। भूमि अदा से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक उन्होंने राष्ट्रीय गौरव को सबसे ऊपर रखा था।
उस दौर में सोमनाथ मंदिर के लिए जाम साहब ने ₹1 लाख का दान दिया और उन्होंने ट्रस्ट के प्रथम अध्यक्ष के रूप में बड़ी जिम्मेदारी निभाई। भाइयों बहनों, दुर्भाग्य से आज भी हमारे देश में वो ताकतें मौजूद हैं, पूरी तरह सक्रिय हैं, जिन्होंने सोमनाथ पुनर्निर्माण का विरोध किया।
आज तलवारों की जगह दूसरे कुत्सित तरीकों से भारत के खिलाफ षड्यंत्र हो रहे हैं और इसलिए हमें ज्यादा सावधान रहना है। हमें खुद को शक्तिशाली बनाना है। हमें एक रहना है। एकजुट रहना है। ऐसी हर ताकत को हराना है जो हमें बांटने की साजिशें रच रही है।
साथियों, जब हम अपनी आस्था से जुड़े रहते हैं। अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं। पूरे स्वाभिमान के साथ अपनी विरासत का संरक्षण करते हैं। अपनी विरासत के प्रति सजग रहते हैं तो हमारी सभ्यता की जड़ें भी मजबूत होती हैं और इसलिए पिछले 1000 वर्षों की यात्रा हमें अगले 1000 वर्षों के लिए तैयार रहने की प्रेरणा देती है।
साथियों, राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक अवसर पर मैंने भारत के लिए हजार साल का विराट स्वप्न सामने रखा था। मैंने देव से देश के विजन के साथ आगे बढ़ने की बात कही थी। आज देश का सांस्कृतिक पुनर्जागरण करोड़ों देशवासियों में नया विश्वास भर रहा है। आज हर देशवासी के मन में विकसित भारत को लेकर एक भरोसा है।
आज 140 करोड़ भारतीय भविष्य के लक्ष्यों को लेकर संकल्पित हैं। भारत अपने गौरव को नई बुलंदी देगा। हम गरीबी के खिलाफ अपनी लड़ाई में जीतेंगे। हम विकास की नई ऊंचाइयों को छुएंगे। पहले दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य। फिर उसके आगे का सफर, देश अब इसके लिए तैयार हो चुका है।

और सोमनाथ मंदिर की ऊर्जा हमारे इन संकल्पों को आशीर्वाद दे रही है। साथियों, आज का भारत विरासत से विकास की प्रेरणा लेकर आगे बढ़ रहा है। सोमनाथ में भी विकास भी विरासत भी, यह भावना निरंतर साकार हो रही है। आज एक और सोमनाथ मंदिर का सांस्कृतिक विस्तार, सोमनाथ संस्कृत यूनिवर्सिटी की स्थापना।
माधवपुर मेले की लोकप्रियता और उसके रंग, इनसे हमारी विरासत मजबूत हो रही है। गिर लायन के संरक्षण से इस क्षेत्र का प्राकृतिक आकर्षण बढ़ रहा है, तो वहीं प्रभास पाटन क्षेत्र के विकास के नए आयाम भी गढ़े जा रहे हैं। केशोद एयरपोर्ट का विस्तार किया जा रहा है।
इससे देश-विदेश से श्रद्धालु सीधे सोमनाथ तक पहुंच सकेंगे। अहमदाबाद से वेरावल वंदे भारत ट्रेन की शुरुआत से तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों का समय कम हुआ है। इस क्षेत्र में यात्रा धाम सर्किल का विकास भी किया जा रहा है। यानी आज का भारत आस्था को स्मरण करने के साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर, कनेक्टिविटी और टेक्नोलॉजी के जरिए उसे भविष्य के लिए सशक्त भी कर रहा है।
साथियों, हमारी सभ्यता का संदेश कभी किसी को पराजित करने का नहीं रहा। बल्कि जीवन को संतुलन में रखने का रहा है। हमारे यहां आस्था की राह हमें घृणा की तरफ नहीं ले जाती। हमारे यहां शक्ति हमें विनाश करने का अहंकार नहीं देती। सोमनाथ जैसे तीर्थ ने हमें सिखाया है कि सृजन का मार्ग लंबा होता है लेकिन वही स्थाई होता है।
चिरंजीव होता है। तलवार की नोक पर कभी दिलों को नहीं जीता जा सकता। जो सभ्यताएं दूसरों को मिटाकर आगे बढ़ना चाहती हैं, वे स्वयं समय में खो जाती हैं। इसलिए भारत ने दुनिया को यह नहीं सिखाया कि दूसरे को हराकर कैसे जीता जाए। बल्कि यह सिखाया कि कैसे दिलों को जीतकर जिया जाए।
यह विचार आज दुनिया की जरूरत है। सोमनाथ की हजार वर्षों की गाथा पूरी मानवता को सीख दे रही है। इसलिए आइए हम संकल्प करें। हम विकास की ओर आगे बढ़ें। कदम से कदम मिलाकर चलें। कंधे से कंधा मिलाकर चलें, मन से मन को जोड़कर चलें।
लक्ष्य को ओझल किए बिना हम चलते चलें और साथ ही अपने अतीत और अपनी विरासत से भी जुड़े रहें। हम आधुनिकता को अपनाते हुए अपनी चेतना को संभाले रखें। आइए सोमनाथ स्वाभिमान पर्व जैसे आयोजनों से प्रेरणा लेते हुए विकसित होने के मार्ग पर तेजी से चलें। हर चुनौती को पार करते हुए हम अपने लक्ष्य तक पहुंचें।
और यह कार्यक्रम आज तो शुरू हो रहा है। हमें हजार साल का स्मरण देश के कोने-कोने में करना है। दुनिया को हमारी विरासत का परिचय करवाना है। हमें 75 साल का यह नया पर्व भी मनाना है और हम 2027 मई तक इसको मनाते रहें। जन-जन को जगाते रहें। जगा हुआ देश सपनों को साकार करने के लिए चलता रहे।
इसी कामना के साथ एक बार फिर समस्त देशवासियों को मैं बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। हर हर महादेव। जय सोमनाथ। जय सोमनाथ। जय सोमनाथ। जय जय सोमनाथ। जय सोमनाथ।

