नूह: हरियाणा का नूह (मेवात) क्षेत्र हाल के दिनों में अपनी भौगोलिक स्थिति और कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति के कारण चर्चा में बना हुआ है।
दिल्ली-एनसीआर के करीब होने के बावजूद, यह इलाका पुलिस और अपराधियों के बीच ‘लुका-छिपी’ के खेल का केंद्र बन गया है ऐसे खबरें मीडिया में लगातार सामने आती रही है।
हाल ही में मेघालय पुलिस के साथ हुई घटना ने एक बार फिर यहाँ के जमीनी हालातों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मेघालय पुलिस और ट्रांजिट रिमांड पर हमला
फरवरी में मेघालय के पूर्वी खासी हिल्स जिले में एक बड़ी एटीएम चोरी की घटना हुई थी। इस साजिश के मुख्य सूत्रधार और हिस्ट्रीशीटर राहुल खान को गिरफ्तार करने के बाद, जब मेघालय पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले जा रही थी, तब नूह में उसे छुड़ाने के लिए भारी हंगामा हुआ।
ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि उन्हें स्थानीय स्तर पर संगठित समर्थन भी प्राप्त होता है।
भीड़ का हिंसक चेहरा और हथियारों की लूट का प्रयास
नूह: नूह में पुलिस को जिस स्थिति का सामना करना पड़ा, वह डराने वाली थी। एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें मुख्य सूत्रधार और हिस्ट्रीशीटर राहुल खान को गिरफ्तार करने के बाद, जब मेघालय पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले जा रही थी। लेकिन तभी भीड़ उन्हें रोक लेती हैं।
इस भीड़ में महिलाएं भी शामिल थीं। भीड़ ने पुलिस के वाहन को घेर लिया और चाबी छीनने की कोशिश की। हद तो तब हो गई जब उग्र भीड़ ने पुलिसकर्मियों के हथियार तक लूटने का प्रयास किया। अपनी जान बचाने और आरोपी को सुरक्षित रखने के लिए पुलिस को मजबूरन आत्मरक्षा में गोलियां चलानी पड़ीं, जिसमें आरिफ खान नामक एक व्यक्ति घायल हो गया।
“ट्रैक्टर लगाओ”: सुनियोजित तरीके से पुलिस को रोकने की रणनीति?
इस पूरे हंगामे के दौरान भीड़ के इरादे स्पष्ट थे। सोशल मीडिया और मौके पर मौजूद गवाहों के अनुसार, भीड़ से “ट्रैक्टर लगाओ” जैसे नारे सुनाई दे रहे थे। ऐसे में सवाल यह है कि क्या ये एक सोची-समझी रणनीति थी?
इस तरह सड़क को ट्रैक्टरों से ब्लॉक करना ताकि पुलिस का वाहन आगे न बढ़ सके और इस बीच अपराधी को आसानी से भगाया जा सके।
यह पैटर्न पहले भी कई बार देखा जा चुका है, जहाँ भारी वाहनों का उपयोग करके पुलिस के रास्ते रोके जाते हैं। ऐसे खबरें मीडिया में अक्सर सामने आती रहती है।
एनसीआर की शांति के लिए बढ़ता खतरा
नूह की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहाँ से राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सीमाएं लगती हैं। एनसीआर में अपराध करने के बाद अपराधी अक्सर यहाँ की अरावली पहाड़ियों और घनी बस्तियों में शरण लेते हैं।
जब पुलिस इन इलाकों में दबिश देती है, तो उन्हें स्थानीय प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है।
इसे “एनसीआर की शांति का कैंसर” कहा जा रहा है क्योंकि यदि पुलिस ही सुरक्षित नहीं होगी, तो आम नागरिक की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी?
नूह में बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं प्रशासन के लिए एक वेक-अप कॉल हैं। केवल गिरफ्तारी काफी नहीं है; उस तंत्र को तोड़ने की जरूरत है जो अपराधियों को ढाल प्रदान करता है।
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