सोमनाथ मंदिर गुजरात के समुद्र तट पर स्थित भारत के सबसे प्राचीन और पवित्र शिव मंदिरों में से एक है।
यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति और आत्मसम्मान का प्रतीक माना जाता है।
इतिहास गवाह है कि इस मंदिर पर कई बार विदेशी आक्रमणकारियों ने हमले किए, इसे तोड़ा गया, लूटा गया, लेकिन हर बार यह फिर से खड़ा हुआ।
यही कारण है कि सोमनाथ मंदिर को भारत की अटूट आस्था और सभ्यतागत निरंतरता का प्रतीक कहा जाता है।
सोमनाथ मंदिर: 1026 में गजनवी ने किया सोमनाथ पर आक्रमण
8 जनवरी 2026 को पूरा देश सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मना रहा है। यह पर्व न केवल मंदिर के गौरवशाली इतिहास को याद करने का अवसर है बल्कि उन संघर्षों को भी सम्मान देने का दिन है,
जिनसे गुजरकर यह मंदिर आज अपनी भव्यता में खड़ा है। वर्ष 1026 में महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ पर आक्रमण किया गया था।
इसके बाद भी कई बार यह मंदिर नष्ट किया गया, लेकिन हर पीढ़ी ने इसे फिर से बसाया। यह दर्शाता है कि भारतीय संस्कृति को मिटाया नहीं जा सकता।
सरकार को किसी भी धार्मिक आयोजन से दूरी बनाए रखना चाहिए- नेहरू
भारत के विभाजन के बाद देश ने एक नई राजनीतिक दिशा अपनाई। पाकिस्तान इस्लामी गणराज्य बना जबकि भारत ने खुद को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया, लेकिन इस धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या को लेकर हमेशा बहस होती रही है।
कई लोगों का मानना है कि स्वतंत्रता के बाद हिंदू समाज के अधिकारों और भावनाओं को अक्सर नजरअंदाज किया गया। इसी संदर्भ में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण एक बड़ा मुद्दा बना।
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और अभिषेक समारोह को लेकर काफी असहज थे।
उन्होंने 1950 और 1951 के बीच कई पत्र लिखे, जिनमें इस आयोजन का विरोध किया। नेहरू का मानना था कि सरकार को किसी भी धार्मिक आयोजन से दूरी बनाए रखनी चाहिए ताकि भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि बनी रहे।
उन्हें चिंता थी कि यदि राष्ट्रपति या मंत्री इस समारोह में शामिल होंगे तो इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गलत संदेश जाएगा।
राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ मंदिर की अध्यक्षता न करें- नेहरू
नेहरू ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से भी आग्रह किया था कि वे सोमनाथ मंदिर के अभिषेक समारोह की अध्यक्षता न करें।
उनका कहना था कि यह केवल पूजा नहीं बल्कि एक बड़ा सार्वजनिक आयोजन है, जिसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव हो सकते हैं।
हालांकि राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने इसे अपनी व्यक्तिगत आस्था का विषय बताया और समारोह में शामिल होने का निर्णय लिया।
नेहरू ने विदेश सचिव को निर्देश दिए कि विदेशी दूतावासों को पत्र लिखकर विभिन्न नदियों से जल लाने की अपीलों पर ध्यान न दिया जाए।
उन्हें यह सब अनावश्यक और प्रतीकात्मक दिखावा लगता था। उनका मानना था कि ऐसे कार्य भारत को एक धार्मिक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं,
जिससे उसकी धर्मनिरपेक्ष पहचान पर सवाल उठ सकता है।
इसके अलावा सौराष्ट्र सरकार द्वारा सोमनाथ मंदिर समारोह के लिए पांच लाख रुपये खर्च करने पर भी नेहरू ने कड़ी आपत्ति जताई।
उन्होंने इसे सार्वजनिक धन का अनुचित उपयोग बताया। उस समय देश आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहा था,
कई जगह भुखमरी थी, ऐसे में किसी धार्मिक आयोजन पर इतनी बड़ी राशि खर्च करना उन्हें गलत लगा।
नेहरू ने पाकिस्तान को लिखा पत्र
नेहरू को यह भी चिंता थी कि पाकिस्तान इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाकर भारत को गैर-धर्मनिरपेक्ष साबित करने की कोशिश कर रहा है।
उन्होंने नवनगर के जाम साहब को लिखे पत्र में इसका उल्लेख किया और कहा कि पाकिस्तान इस मौके का फायदा उठा रहा है।
जबकि पाकिस्तान खुद एक इस्लामी गणराज्य था, फिर भी वह भारत की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े कर रहा था।
21 अप्रैल 1951 को नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को पत्र लिखा। इसमें उन्होंने पाकिस्तानी मीडिया में चल रही उन खबरों का खंडन किया,
जिनमें कहा जा रहा था कि सोमनाथ मंदिर के पुराने द्वार अफगानिस्तान से वापस लाए जा रहे हैं। नेहरू ने इसे पूरी तरह झूठा बताया और कहा कि ऐसी कोई योजना नहीं है।
इन सभी घटनाओं से यह साफ होता है कि नेहरू धर्मनिरपेक्षता को लेकर बेहद सजग थे। उनका मानना था कि सरकार को धार्मिक मामलों से दूर रहना चाहिए।
हालांकि आलोचक कहते हैं कि यह रवैया हिंदू समाज की भावनाओं की अनदेखी करता था, खासकर तब जब देश विभाजन के दर्द से उबर रहा था।
वल्लभभाई पटेल ने कराया पुननिर्माण
सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। 13 नवंबर 1947 को जूनागढ़ दौरे के दौरान उन्होंने मंदिर के पुनर्निर्माण का वादा किया था।
बाद में कैबिनेट में इस पर चर्चा हुई और मंदिर के पुनर्निर्माण का फैसला लिया गया।
हालांकि महात्मा गांधी चाहते थे कि इसका खर्च जनता उठाए, न कि सरकार। इसी वजह से एक ट्रस्ट बनाया गया, जिसकी जिम्मेदारी के.एम. मुंशी को दी गई।
सरदार पटेल के निधन के बाद के.एम. मुंशी ने इस कार्य को आगे बढ़ाया। उन्होंने तमाम बाधाओं के बावजूद मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा कराया।
यही कारण है कि आज सोमनाथ मंदिर अपनी भव्यता में खड़ा है।
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक
आज जब हम सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मना रहे हैं, तो यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है।
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि कितनी भी बार हमारी सभ्यता पर हमला हुआ हो, हम हर बार और मजबूत होकर खड़े हुए हैं।
सोमनाथ मंदिर हमें यह सिखाता है कि आस्था, संस्कृति और आत्मसम्मान को कोई मिटा नहीं सकता।
समय के साथ भारत में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा भी बदल रही है। आज यह समझ बढ़ रही है कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म विरोध नहीं बल्कि सभी धर्मों का सम्मान है।
सोमनाथ मंदिर जैसे स्थल हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं और इन्हें सम्मान देना हमारी पहचान को मजबूत करता है।
अंत में कहा जा सकता है कि सोमनाथ मंदिर केवल पत्थरों से बना ढांचा नहीं बल्कि भारत की आत्मा है। यह मंदिर हमें हमारे इतिहास, संघर्ष और विजय की कहानी सुनाता है।
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व हमें अपने गौरवशाली अतीत को याद करने और भविष्य के लिए आत्मविश्वास से भरने का अवसर देता है। यही इस पर्व का असली उद्देश्य है।

