Tuesday, February 24, 2026

ममता बनर्जी बायोग्राफी: छात्र राजनीति से तृणमूल कांग्रेस की स्थापना और मुख्यमंत्री पद तक का विस्तृत सफर

ममता बनर्जी बायोग्राफी: क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक महिला, जो आज भी ₹500 की साधारण सूती साड़ी पहनती है और हवाई चप्पल पहनकर मीलों पैदल चल सकती है,

उसने दुनिया के सबसे लंबे समय तक चलने वाले (34 साल के) वामपंथी किले को अपने दम पर ढहा दिया? बिना किसी बड़े राजनीतिक खानदान या विरासत के,

सिर्फ अपने जज्बे के साथ सड़कों से निकलकर सत्ता के शिखर तक पहुँचने वाली यह शख्सियत आखिर कौन है?

यह कहानी उस ‘फाइटर’ की है जिसने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के बदले सिर पर गहरी चोटें सहीं, पुलिस की लाठियां झेलीं और महीनों तक अनशन पर बैठी रहीं,

लेकिन कभी हार नहीं मानी। जिनकी सादगी ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है और जिनकी एक आवाज़ पर आज भी पूरा बंगाल ठहर जाता है।

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री और करोड़ों लोगों की चहेती ‘दीदी’ , ममता बनर्जी की।

एक ऐसी नेता, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो एक साधारण इंसान भी बड़े-बड़े साम्राज्यों को चुनौती दे सकता है।

व्यक्तिगत जीवन

विवरणजानकारी
पूरा नामममता बनर्जी
जन्म तिथि5 जनवरी 1955 (आयु 71 वर्ष)
जन्म स्थानकोलकाता
दल का नामअखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस
पार्टी की स्थितिअध्यक्ष
शिक्षास्नातकोत्तर
पेशाराजनीति और सामाजिक कार्य
पिता का नामप्रोमिलेश्वर बनर्जी
मां का नामगायत्री बनर्जी
धर्महिंदू
जातिब्राह्मण
वेबसाइटhttps://wb.gov.in/portal/web/guest/meet-the-chief-minister
वर्तमान निर्वाचन क्षेत्रभवानीपुर

प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि

ममता बनर्जी का जन्म 5 जनवरी 1955 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता में एक साधारण, निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था।

जब वह बहुत छोटी थी तभी उसके पिता का निधन हो गया था और उसके परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।

इन चुनौतियों के बावजूद, ममता की मां ने यह सुनिश्चित किया कि ममता को अच्छी शिक्षा मिले और वह मजबूत मूल्यों के साथ बड़ी हो।

बचपन और परवरिश

ममता बनर्जी की जीवनी: बचपन से ही ममता अपने साहस, दृढ़ संकल्प और न्याय की प्रबल भावना के लिए जानी जाती थीं।

वह छोटी उम्र से ही अक्सर उन बातों के लिए खड़ी होती थी जिन्हें वह सही मानती थी।

एक साधारण से घर में पली-बढ़ी होने के कारण उसने कड़ी मेहनत, सादगी और आम लोगों के संघर्षों के प्रति सहानुभूति का महत्व सीखा।

शुरुआती प्रभाव और प्रेरणा

ममता बनर्जी का बचपन सिर्फ अभावों में ही नहीं बीता, बल्कि उनके आसपास हो रही सामाजिक और राजनीतिक हलचलों ने भी उन्हें बहुत प्रभावित किया।

उनके सोचने के तरीके पर इन तीन चीजों का सबसे गहरा असर पड़ा:

आसपास का माहौल: छोटी उम्र से ही उन्होंने अपने आसपास गरीबी और लोगों की परेशानियां देखी थीं।

समाज में चल रहे मुद्दों ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि बदलाव लाना कितना जरूरी है।

मार्गदर्शकों का साथ: उनके स्कूल के शिक्षकों, समाज के अनुभवी नेताओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने उनके मन में सेवा का बीज बोया।

उन्होंने ममता को सिखाया कि कैसे निडर होकर लोगों की मदद की जाती है और न्याय के लिए आवाज़ उठाई जाती है।

मजबूत नींव: इन शुरुआती अनुभवों ने ही उन्हें आम जनता के दुख-दर्द से जुड़ना सिखाया। यही कारण था कि उन्होंने अपना पूरा जीवन सार्वजनिक सेवा और राजनीति के लिए समर्पित कर दिया।

शिक्षा और संघर्ष: ट्यूशन पढ़ाने से लेकर वकील बनने तक का सफर

ममता बनर्जी न केवल एक कद्दावर नेता हैं, बल्कि उन्होंने बहुत कठिन परिस्थितियों में अपनी पढ़ाई पूरी की है।

उनका सफर एक साधारण स्कूल टीचर से शुरू होकर, वकील और फिर देश की सबसे ताकतवर महिला मुख्यमंत्रियों में से एक बनने तक का है।

पढ़ाई और कॉलेज

डिग्री विषय कॉलेज/यूनिवर्सिटी

बी.ए. (B.A.) इतिहास (ऑनर्स) जोगमाया देवी कॉलेज

एम.ए. (M.A.) इस्लामिक इतिहास कलकत्ता विश्वविद्यालय

बी.एड. (B.Ed.) शिक्षा (Education) श्री शिक्षायातन कॉलेज

एल.एल.बी. (LL.B.) कानून जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज

शिक्षा से जुड़े कुछ खास और दिलचस्प किस्से

पढ़ाई के साथ काम (Financial Struggle): ममता बनर्जी का बचपन संघर्षों भरा था। जब वे मात्र 17 साल की थीं, तभी उनके पिता का साया सिर से उठ गया।

अपने परिवार का खर्च चलाने और अपनी कॉलेज की फीस भरने के लिए उन्होंने स्टेनोग्राफर के रूप में काम किया और घर-घर जाकर ट्यूशन (Private Tutor) भी पढ़ाई।

कॉलेज से ‘स्ट्रीट फाइटर’ की पहचान: उनकी राजनीति की असली शुरुआत कॉलेज के दिनों में ही हो गई थी।

जोगमाया देवी कॉलेज में उन्होंने कांग्रेस की छात्र शाखा (छात्र परिषद) की नींव रखी और उस समय के बड़े-बड़े छात्र संघों को हराकर अपनी लीडरशिप का लोहा मनवाया।

विषय का अनोखा चुनाव: यह बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अपनी मास्टर डिग्री के लिए ‘इस्लामिक इतिहास’ को चुना।

यह उनकी सोच को दर्शाता है कि वे भारत की मिली-जुली संस्कृति और इतिहास को कितनी गहराई से समझना चाहती थीं।

बहुमुखी प्रतिभा: राजनीति में आने से पहले उन्होंने एक प्राइमरी स्कूल टीचर के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं, जिससे पता चलता है कि वे ज़मीनी स्तर पर लोगों से कितनी जुड़ी हुई थीं।

ममता बनर्जी की यह डिग्रियां सिर्फ कागज़ के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि उनकी उस अटूट जिद का परिणाम हैं जिसने उन्हें कभी हार नहीं मानने दी।

विशेष उपलब्धियां एवं सम्मान

सबसे कम उम्र की सांसद: विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी करने के कुछ ही समय बाद, 1984 में, वह 29 वर्ष की आयु में लोकसभा के लिए चुनी जाने वाली सबसे कम उम्र की व्यक्तियों में से एक बन गईं।

मानद डॉक्टरेट उपाधियाँ: उन्हें उनकी सामाजिक सेवा के लिए वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त है:

डी. लिट (मानद उपाधि): कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा सम्मानित

मानद डॉक्टरेट: कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी (केआईआईटी) द्वारा प्रदान की गई।

हालिया सम्मान (2025): उन्हें हाल ही में जापान के ओकायामा विश्वविद्यालय से मानद डी. लिट की उपाधि प्राप्त हुई,

जिससे वह स्वास्थ्य और शिक्षा में अपने नेतृत्व के लिए इस संस्थान द्वारा सम्मानित होने वाली एशिया की पहली महिला बन गईं।

पहली नागरिक-वकील: उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में वकील के रूप में व्यक्तिगत रूप से एक मामले की पैरवी करने वाली पहली मौजूदा मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रचा (यह घटना फरवरी 2026 में हुई थी)।

राजनीति में प्रवेश

ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो दिग्गज को हराने का बेहतरीन उदाहरण है।

उन्होंने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और निडर, अक्सर शारीरिक रूप से आक्रामक, विरोध शैली के दम पर एक छात्रा कार्यकर्ता से राष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई।

प्रारंभिक राजनीतिक भागीदारी

किशोरी कार्यकर्ता: उन्होंने स्कूल में पढ़ते हुए महज 15 साल की उम्र में राजनीति में प्रवेश किया।

“कार डांस” घटना: 1975 में, उन्होंने एक साहसिक विरोध प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के काफिले को रोक दिया और उनकी कार के बोनट पर कूद गईं।

जमीनी स्तर की पहचान: शुरुआत से ही, उन्हें एक “स्ट्रीट फाइटर” के रूप में जाना जाता था, जो श्रमिकों, किसानों और हाशिए पर पड़े लोगों के अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करती थीं।

प्रारंभिक नेतृत्व भूमिकाएं

विद्यार्थी नेता: जोगमाया देवी कॉलेज में, उन्होंने छात्र परिषद (कांग्रेस पार्टी की छात्र शाखा) की स्थापना की और स्थापित समाजवादी संघों को सफलतापूर्वक चुनौती दी।

सबसे कम उम्र की सांसद (1984): उनकी सबसे बड़ी सफलता 29 वर्ष की आयु में मिली, जब उन्होंने दिग्गज कम्युनिस्ट नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया । इस जीत ने उन्हें भारत की सबसे कम उम्र की संसद सदस्यों में से एक बना दिया।

युवा एवं महिला विंग: उन्होंने महिला कांग्रेस (1976-80) और बाद में अखिल भारतीय युवा कांग्रेस (1984) की महासचिव के रूप में कार्य किया।

राजनीतिक संबद्धताएं

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1970 का दशक-1997): उन्होंने यहीं से अपने करियर की शुरुआत की और राजीव गांधी के नेतृत्व में एक “उभरती हुई स्टार” थीं।

हालांकि, बाद में उन्हें लगा कि पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट सरकार के प्रति पार्टी का रवैया बहुत “नरम” था।

अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (1998-वर्तमान): 1997 में, वह अलग हो गईं और 1 जनवरी, 1998 को अपनी पार्टी की स्थापना की। “तृणमूल” नाम का अर्थ “जमीनी स्तर” है, जो आम लोगों से उनके जुड़ाव का प्रतीक है।

राजनीतिक करियर की समयरेखा (1970–2026)

ममता बनर्जी का राजनीतिक करियर आधुनिक भारतीय इतिहास में सबसे लंबा और सबसे दृढ़ करियर में से एक है।

नीचे एक युवा कार्यकर्ता से लेकर मुख्यमंत्री के रूप में उनकी वर्तमान भूमिका तक की उनकी यात्रा का संक्षिप्त समयक्रम दिया गया है।

वर्ष/ अवधि भूमिका/ उपलब्धि मुख्य विवरण

1970 के दशक में प्रारंभिक सक्रियता: कांग्रेस में शामिल हुईं (प्रथम); महिला कांग्रेस की महासचिव के रूप में कार्य किया (1976-80)।

1984 में दिग्गज को हराने वाला क्षण: अनुभवी सोमनाथ चटर्जी को हराकर भारत के सबसे युवा सांसदों में से एक बने (जादवपुर)।

1991-1993 तक केंद्रीय मंत्री के रूप में मानव संसाधन विकास, युवा मामले, खेल और महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया।

1998 में स्थापित टीएमसी ने 1 जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का गठन किया।

1999-2001 में केंद्रीय रेल मंत्री रहीं, जो एनडीए सरकार के अधीन पहली महिला रेल मंत्री थीं।

2004 में केंद्रीय मंत्रिमंडल में कोयला और खान मंत्री के रूप में कार्य किया।

2007-2008 में सिंगूर और नंदीग्राम में ऐतिहासिक भू-आंदोलनों का नेतृत्व किया गया, जिसके परिणामस्वरूप अंततः वाम मोर्चा का पतन हुआ।

2009-2011 में रेल मंत्रालय में वापसी: यूपीए-2 सरकार के तहत दूसरी बार रेल मंत्री के रूप में कार्य किया।

2011-2016 मुख्यमंत्री (पहला कार्यकाल) 34 वर्षों के कम्युनिस्ट शासन का अंत किया; पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।

2016-2021 मुख्यमंत्री (दूसरा कार्यकाल): लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए भारी बहुमत से जीत हासिल की।

2021 – वर्तमान मुख्यमंत्री (तीसरा कार्यकाल) पैर में चोट लगने के कारण व्हीलचेयर पर बैठकर चुनाव प्रचार करने के बावजूद 2021 के चुनाव जीते।

फरवरी 2026 की वर्तमान स्थिति: मौजूदा मुख्यमंत्री; आगामी 2026 विधानसभा चुनावों की तैयारी कर रहे हैं।

प्रमुख कल्याणकारी योजनाएं और कार्यक्रम

ममता बनर्जी का “बंगाल मॉडल”: हर घर और हर हाथ को सहारा :

ममता बनर्जी के शासन की सबसे बड़ी खूबी उनकी कल्याणकारी योजनाएं हैं। इसे “बंगाल मॉडल” कहा जाता है क्योंकि यह जन्म से लेकर बुढ़ापे तक हर नागरिक की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

2026 की शुरुआत में उन्होंने इन योजनाओं को और भी मजबूत बनाया है।

सामाजिक सुरक्षा: महिलाओं और बच्चों के लिए खास

ममता बनर्जी का मानना है कि जब घर की महिला सशक्त होगी, तभी समाज बढ़ेगा।

लक्ष्मी भंडार (पैसे सीधे महिलाओं के हाथ में): यह बंगाल की सबसे लोकप्रिय योजना है। फरवरी 2026 में इसमें ₹500 की बढ़ोत्तरी की गई है।

अब सामान्य वर्ग की महिलाओं को ₹1,500 और SC/ST महिलाओं को ₹1,700 हर महीने मिलते हैं।

कन्याश्री योजना: इस योजना को संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी सराहा है। यह लड़कियों की पढ़ाई जारी रखने और बाल विवाह रोकने के लिए उन्हें आर्थिक मदद देती है।

बांग्लर युवा साथी (नयी योजना – 2026): बेरोजगार युवाओं के लिए ममता सरकार ने यह कदम उठाया है।

21 से 40 साल के बेरोजगारों को काम मिलने तक (5 साल के लिए) ₹1,500 प्रति माह का भत्ता दिया जा रहा है।

स्वास्थ्य साथी: हर परिवार के पास ₹5 लाख तक का मुफ्त इलाज कार्ड है। 2026 में इसमें डिलीवरी बॉयज और ओला-उबर चलाने वाले ‘गिग वर्कर्स’ को भी जोड़ दिया गया है।

आर्थिक मजबूती: व्यापार और रोजगार

ममता सरकार की कोशिश है कि लोगों के पास नकद पैसा पहुँचे और छोटे उद्योग फलें-फूलें।

छोटे उद्योगों (MSME) का केंद्र: आज पश्चिम बंगाल में भारत के सबसे ज्यादा छोटे उद्योग हैं। 2026 के बजट में इसके लिए ₹1,250 करोड़ का अलग से फंड रखा गया है।

महंगाई से राहत (DA): हाल ही में राज्य कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ते (DA) में 4% की बढ़ोत्तरी की गई है। साथ ही आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की सैलरी भी ₹1,000 बढ़ाई गई है।

महात्माश्री योजना: गाँवों में रहने वाले लोगों को 100 दिन का पक्का काम दिलाने के लिए सरकार ने अपने दम पर यह योजना शुरू की है।

  1. बुनियादी ढांचा: गाँव-गाँव तक सड़क और पानी :

“सड़कें विकास लाती हैं” , इसी मंत्र के साथ बंगाल में बड़े प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं।

पाठाश्री-रास्ताश्री: इसके तहत लाखों किलोमीटर सड़कों का जाल बिछाया गया है। 2026 तक 20,000 किलोमीटर और नई सड़कें बनाने का काम शुरू हो चुका है।

गंगासागर सेतु (2026 का बड़ा प्रोजेक्ट): जनवरी 2026 में ममता बनर्जी ने सागर द्वीप को मुख्य भूमि से जोड़ने वाले 5 किलोमीटर लंबे पुल की नींव रखी।

₹1,670 करोड़ का यह पुल तीर्थयात्रियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

जल स्वप्नो: इस मिशन का लक्ष्य हर घर के नल में स्वच्छ पानी पहुँचाना है। स्कूलों और अस्पतालों को प्राथमिकता पर पानी के कनेक्शन दिए जा रहे हैं।

नेतृत्व और विजन: “एक योद्धा का साहस, एक माँ की ममता :

ममता बनर्जी का नेतृत्व दो अलग-अलग छोरों का मिलन है , एक तरफ वे एक निडर योद्धा हैं जो किसी से नहीं डरतीं, तो दूसरी तरफ वे एक संरक्षक की तरह अपने राज्य के गरीबों का ख्याल रखती हैं।

उनके लिए सरकार का मतलब सिर्फ दफ्तर नहीं, बल्कि जनता का ‘अभिभावक’ होना है।

शासन का तरीका: फाइलों में नहीं, जमीन पर शासन

ममता बनर्जी का मानना है कि शासन वही है जो आम आदमी को महसूस हो। उनकी कार्यशैली बहुत सक्रिय है:

सड़कों पर प्रशासन: वे केवल राजधानी कोलकाता से सरकार नहीं चलातीं। वे खुद जिलों में जाकर प्रशासनिक बैठकें करती हैं।

अगर किसी सरकारी काम में देरी होती है, तो वे सार्वजनिक रूप से अधिकारियों से जवाब मांगती हैं। इससे जनता को सीधा संदेश जाता है कि उनकी मुख्यमंत्री खुद हर काम की निगरानी कर रही हैं।

दुआरे सरकार (आपके द्वार पर सरकार): उन्होंने सरकारी व्यवस्था को उलट दिया है। उनका कहना है कि जनता को सरकार के पीछे नहीं भागना चाहिए,

बल्कि सरकार को जनता के पास जाना चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने ‘दुआरे सरकार’ कैंप शुरू किए।

खुद लड़ती हैं अपनी लड़ाई: 2026 की शुरुआत में उन्होंने एक मिसाल कायम की। वे राज्य के अधिकारों की कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए एक वकील की ड्रेस पहनकर खुद सुप्रीम कोर्ट में खड़ी हुईं।

यह दिखाता है कि वे अपनी जनता के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं।

क्यों हैं वे सबकी “दीदी”?

ममता बनर्जी की छवि को उनकी सादगी ने सबसे ज्यादा मजबूत बनाया है।

सादगी की पहचान: 15 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद भी उनकी पहचान वही सफेद सूती साड़ी और हवाई चप्पल है।

यह सादगी करोड़ों लोगों को यह एहसास दिलाती है कि वे आज भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई हैं और आम आदमी की तरह ही रहती हैं।

नेता नहीं, परिवार की सदस्य: उन्हें ‘मुख्यमंत्री’ से ज्यादा ‘दीदी’ (बड़ी बहन) कहलाना पसंद है। यह शब्द उन्हें राजनीति से ऊपर उठाकर परिवार का हिस्सा बना देता है।

समर्थकों के लिए वे एक ढाल हैं, तो विरोधियों के लिए वे एक ऐसी ‘स्ट्रीट फाइटर’ हैं जो कभी पीछे नहीं हटतीं।

कला और राजनीति का संगम: वे केवल भाषण नहीं देतीं, बल्कि कविताएँ लिखती हैं और पेंटिंग भी करती हैं। 2026 के कोलकाता पुस्तक मेले में उन्होंने अपनी नई किताब “SIR: 26 in 26” जारी की।

वे अपनी कविताओं और चित्रों के जरिए बंगाल की संस्कृति और अपनी राजनीतिक लड़ाई को लोगों के दिलों तक पहुँचाती हैं।

मां, माटी, मानुष”: ममता बनर्जी की विचारधारा का असली आधार।

ममता बनर्जी की राजनीति किसी बड़ी किताबी थ्योरी पर नहीं, बल्कि ज़मीन से जुड़े इन तीन शब्दों पर टिकी है।

मां (महिला सुरक्षा और सम्मान)

यहाँ ‘माँ’ का मतलब है राज्य की हर महिला की सुरक्षा और उसका सम्मान। ममता बनर्जी खुद को बंगाल की महिलाओं के ‘अभिभावक’ के रूप में देखती हैं।

यही कारण है कि उनकी सबसे बड़ी योजनाएं, जैसे कन्याश्री (लड़कियों की पढ़ाई के लिए) और लक्ष्मी भंडार (महिलाओं की सीधी आय) महिलाओं को आर्थिक रूप से आज़ाद बनाने के लिए हैं।

माटी (किसानों का अधिकार और अपनी ज़मीन)

‘माटी’ का मतलब है बंगाल की मिट्टी और यहाँ का किसान। ममता बनर्जी की राजनीति की जड़ें सिंगूर और नंदीग्राम के किसान आंदोलनों में हैं।

उनके लिए अपनी ज़मीन की रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म है। वे मानती हैं कि विकास के नाम पर किसानों की मर्जी के बिना उनकी ‘माटी’ उनसे नहीं छीनी जानी चाहिए।

मानुष (आम आदमी और गरीब की सेवा)

‘मानुष’ यानी वह आम आदमी जो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ा है।

ममता बनर्जी की विचारधारा का केंद्र यह है कि सरकार का पहला काम गरीब और कमज़ोर लोगों की मदद करना है।

वे “कल्याणकारी राजनीति” में विश्वास रखती हैं, जहाँ सरकार सीधे लोगों के हाथों में पैसा और मदद पहुँचाती है।

बंगाली पहचान और धर्मनिरपेक्षता

बंगाली अस्मिता: ममता बनर्जी खुद को बंगाल की संस्कृति और पहचान की सबसे बड़ी रक्षक मानती हैं।

वे अक्सर केंद्र सरकार के सामने एक “अकेली योद्धा” की तरह खड़ी हो जाती हैं, ताकि बंगाल की भाषा, खान-पान और अनूठी संस्कृति पर कोई आंच न आए।

सबको साथ लेकर चलना (धर्मनिरपेक्षता): वे एक ऐसे बंगाल की समर्थक हैं जहाँ हर धर्म और जाति के लोग मिलकर रहें।

उनकी राजनीति में धर्मनिरपेक्षता एक मज़बूत स्तंभ है, और वे किसी भी तरह के धार्मिक भेदभाव के सख्त खिलाफ रहती हैं।

पुरस्कार और मान्यता

वैश्विक स्वास्थ्य एवं शिक्षा में मानद डी.लिट (प्रथम एशियाई महिला) ओकायामा विश्वविद्यालय, जापान, नवंबर 2025

ई-लर्निंग में डिजिटल गवर्नेंस उत्कृष्टता (बांग्लाशिक्षा 3.0) डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन समिट जनवरी 2026

संयुक्त राष्ट्र लोक सेवा पुरस्कार (प्रथम पुरस्कार) संयुक्त राष्ट्र 2017

टाइम पत्रिका द्वारा 2012 और 2021 में प्रकाशित विश्व के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची।

राजनीतिक नेतृत्व: इंडियन ऑफ द ईयर (राजनीति) सीएनएन-आईबीएन 2011

कौशल विकास सूचना समाज पर विश्व शिखर सम्मेलन (डब्ल्यूएसआईएस) संयुक्त राष्ट्र 2019

साहित्य विशेष बांग्ला अकादमी पुरस्कार, बांग्ला अकादमी २०२२

कुल संपत्ति का अवलोकन (2025-2026) :

कुल संपत्ति लगभग ₹15.38 लाख

अचल संपत्ति शून्य (उनके पास कोई जमीन, घर या अपार्टमेंट नहीं है)

वाहन शून्य (उनके पास कार नहीं है)

देनदारियां शून्य

वार्षिक आय लगभग ₹15.47 लाख (मुख्यतः रॉयल्टी से)

विरासत और प्रभाव

ममता बनर्जी की विरासत को पश्चिम बंगाल को एक आधुनिक “कल्याणकारी राज्य” में बदलने और भारतीय लोकतंत्र में क्षेत्रीय प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में उनकी भूमिका से परिभाषित किया जाता है।

राज्य को योगदान

एक नया आर्थिक पथ: उनके नेतृत्व में, पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था (जीएसडीपी) 2011 से लगभग 5.4 गुना बढ़ी है, जो 2026-27 के बजट में 21.48 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई है।

गरीबी उन्मूलन: उनकी सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण योजनाओं के माध्यम से उनके कार्यकाल के दौरान 1.72 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया।

अवसंरचना परिवर्तन: उन्होंने ग्रामीण संपर्क पर ध्यान केंद्रित किया है, जिसके तहत 2.2 लाख किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण किया गया है,

2026 में ₹1,670 करोड़ की लागत से गंगासागर सेतु पुल जैसी विशाल परियोजनाओं का शुभारंभ किया गया है।

दीर्घकालिक प्रभाव

कल्याणकारी योजनाओं का “बंगाल मॉडल”: उनकी “जन्म से मृत्यु तक” की योजनाएं, जैसे कन्याश्री और लक्ष्मी भंडार, का संयुक्त राष्ट्र द्वारा अध्ययन किया गया है और अन्य भारतीय राज्यों द्वारा इन्हें अपनाया गया है।

“स्ट्रीट फाइटर” का आदर्श: उन्होंने सफेद साड़ी और रबर की चप्पलों वाली “वर्गहीन” छवि को बनाए रखकर भारतीय राजनीतिक नेतृत्व को फिर से परिभाषित किया है,

यह साबित करते हुए कि एक नेता जमीनी स्तर के, “आम आदमी” के व्यक्तित्व को खोए बिना अपार शक्ति का प्रयोग कर सकता है ।

एक युग का अंत: उनका सबसे ऐतिहासिक प्रभाव 2011 में 34 वर्षों के कम्युनिस्ट शासन का अंत करना रहा, एक ऐसा कारनामा जिसने पूर्वी भारत के राजनीतिक स्वरूप को स्थायी रूप से बदल दिया।

2026 में राजनीतिक महत्व

एक अकेली योद्धा: फरवरी 2026 तक, वह एक दशक से अधिक समय तक केंद्र सरकार के खिलाफ सफलतापूर्वक अपनी स्थिति बनाए रखने वाली सबसे प्रमुख क्षेत्रीय नेता बनी हुई हैं।

संघवाद का बचाव: राज्य के मतदाता अधिकारों के लिए लड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक वकील के रूप में उनकी हालिया व्यक्तिगत उपस्थिति (फरवरी 2026) ने राज्य की संप्रभुता और “बंगाली पहचान” के एक प्रबल रक्षक के रूप में उनकी विरासत को मजबूत किया है।

समावेशी लोकलुभावनवाद: 2026 की शुरुआत में युवा साथी (₹1,500 मासिक युवा भत्ता) योजना शुरू करके,

वह राष्ट्रीय राजनीतिक लहरों से स्वतंत्र होकर अपने मतदाताओं के साथ सीधा भावनात्मक संबंध बनाए रखने के लिए “कल्याणकारी लोकलुभावनवाद” का उपयोग करना जारी रखती है।

ममता बनर्जी की विरासत एक परिवर्तनकारी नेता की है। उन्होंने एक स्थापित वैचारिक शासन को एक व्यक्तित्व-प्रधान,

कल्याण-केंद्रित मॉडल से बदल दिया, जो ” मां, माता, मनुष्य” (मां, भूमि और जन) को सर्वोपरि प्राथमिकता देता है।

विवाद

  1. कानून प्रवर्तन एजेंसियों और विपक्षी दलों के साथ झड़पें

ममता बनर्जी की टकरावपूर्ण राजनीतिक शैली के लिए अक्सर उनकी आलोचना की जाती रही है।

टीएमसी समर्थकों और विपक्षी दलों के बीच झड़पों की कई घटनाओं ने राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया है, जिससे कभी-कभी राजनीतिक असहिष्णुता के आरोप भी लगे हैं।

भ्रष्टाचार के आरोप

उनकी सरकार को भूमि आवंटन और कल्याणकारी योजनाओं से संबंधित मुद्दों सहित परियोजनाओं और अनुबंधों में अनियमितताओं के आरोपों का सामना करना पड़ा है।

हालांकि इस मामले में कोई बड़ी सजा नहीं हुई है, लेकिन विपक्षी दल अक्सर राजनीतिक बहसों में इन मुद्दों को उठाते हैं।

  1. विरोध प्रदर्शनों और हड़तालों का प्रबंधन :

कुछ हड़तालों, विशेष रूप से छात्र विरोध प्रदर्शनों या श्रमिक आंदोलनों से संबंधित हड़तालों के कारण राज्य सरकार द्वारा कानून और व्यवस्था के प्रबंधन की आलोचना हुई है।

  1. केंद्र सरकार के संघर्ष :

ममता बनर्जी का अक्सर केंद्र सरकार से मतभेद रहा है, जिसके चलते हाई-प्रोफाइल मौखिक विवाद, राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप और वित्त पोषण और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर संघर्ष हुए हैं।

  1. मीडिया और सार्वजनिक आलोचना :

उन्हें राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों और मीडिया के खिलाफ अपने सीधे और कभी-कभी अचानक दिए गए बयानों के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है, जिसे कुछ लोग टकरावपूर्ण मानते हैं।

ममता बनर्जी के बारे में 5 रोचक तथ्य

1 ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।

2 उन्हें लोकप्रिय रूप से ‘दीदी’ के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है बड़ी बहन।

3 वह कविताएं लिखती हैं और उनकी लगभग 300 चित्रकलाएं बिक चुकी हैं।

4 उन्होंने कोलकाता के ट्रैफिक सिग्नल पर टैगोर के गीत, रवींद्र संगीत, प्रस्तुत किए।

5 राजनीति में पूर्णकालिक रूप से प्रवेश करने से पहले, बनर्जी ने एक स्टेनोग्राफर, एक प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका, एक निजी ट्यूटर और यहां तक ​​कि एक सेल्सगर्ल के रूप में भी काम किया।

इस बायोग्राफी की लेखिका हैं आरुषि शर्मा

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Madhuri
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पत्रकारिता में 6 वर्षों का अनुभव है। पिछले 3 वर्षों से Report Bharat से जुड़ी हुई हैं। इससे पहले Raftaar Media में कंटेंट राइटर और वॉइस ओवर आर्टिस्ट के रूप में कार्य किया। Daily Hunt के साथ रिपोर्टर रहीं और ETV Bharat में एक वर्ष तक कंटेंट एडिटर के तौर पर काम किया। लाइफस्टाइल, इंटरनेशनल और एंटरटेनमेंट न्यूज पर मजबूत पकड़ है।
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