मलेरिया: बारिश का मौसम अपने साथ हरियाली और ठंडक तो लेकर आता है, लेकिन इसी मौसम में मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है।
इनमें मलेरिया सबसे गंभीर संक्रमणों में से एक है। अक्सर लोग तेज बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द या शरीर में दर्द जैसे शुरुआती लक्षणों को सामान्य वायरल फीवर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।
यही लापरवाही कई बार बीमारी को गंभीर बना सकती है। इसलिए यह जानना बेहद जरूरी है कि किन परिस्थितियों में मलेरिया की जांच करानी चाहिए और इसके लिए कौन-कौन से टेस्ट किए जाते हैं।
किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार मलेरिया की शुरुआत सामान्य वायरल संक्रमण जैसी ही दिखाई दे सकती है। मरीज को अचानक तेज बुखार आना, ठंड के साथ कंपकंपी होना,
अत्यधिक पसीना आना, सिरदर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, कमजोरी तथा थकान महसूस हो सकती है।
कई मामलों में बुखार बार-बार एक निश्चित अंतराल पर लौटकर आता है, जो मलेरिया का महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है।
यदि इन लक्षणों के साथ ठंड लगना और पसीना आना लगातार बना रहे, तो बिना देरी किए डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
खासकर ऐसे लोगों को अधिक सतर्क रहने की जरूरत है जो मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं या हाल ही में वहां की यात्रा करके लौटे हैं।
मलेरिया टेस्ट कराने का सही समय
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बुखार 24 से 48 घंटे के भीतर ठीक नहीं होता या बुखार कम करने की दवा लेने के बाद भी बार-बार लौट आता है, तो मलेरिया की जांच जरूर करानी चाहिए।
लगातार कमजोरी, शरीर में दर्द और ठंड लगने की शिकायत भी जांच कराने का संकेत हो सकती है।
समय पर जांच कराने से बीमारी की सही पहचान हो जाती है और मरीज का इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है।
इससे बीमारी गंभीर होने का खतरा काफी कम हो जाता है। साथ ही बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक या मलेरिया की दवा लेने से भी बचना चाहिए,
क्योंकि गलत दवा लेने से इलाज में देरी हो सकती है।
समय पर जांच क्यों है जरूरी
मलेरिया का कारण प्लाज्मोडियम नामक परजीवी होता है। इनमें प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम सबसे खतरनाक माना जाता है।
यदि इस संक्रमण की समय पर पहचान न हो और इलाज में देरी हो जाए, तो मरीज को गंभीर जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है।
गंभीर मलेरिया में दिमाग पर असर पड़ना, किडनी फेल होने का खतरा, खून की कमी (एनीमिया), सांस लेने में परेशानी और कई अंगों का एक साथ प्रभावित होना जैसी स्थितियां विकसित हो सकती हैं।
ऐसे मामलों में मरीज को अस्पताल में भर्ती करने की भी जरूरत पड़ सकती है।
यही कारण है कि विशेषज्ञ शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करने और समय पर जांच कराने की सलाह देते हैं।
मलेरिया की जांच कैसे होती है?
मलेरिया की पुष्टि के लिए कई प्रकार की जांच उपलब्ध हैं। सबसे सामान्य जांच माइक्रोस्कोपी है, जिसमें खून की स्लाइड बनाकर माइक्रोस्कोप से परजीवी की पहचान की जाती है।
यह तरीका काफी प्रभावी माना जाता है, लेकिन हर स्वास्थ्य केंद्र पर इसकी सुविधा उपलब्ध नहीं होती।
ऐसी स्थिति में रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट (RDT) का उपयोग किया जाता है। यह टेस्ट कुछ ही मिनटों में शुरुआती रिपोर्ट दे देता है और दूरदराज के इलाकों में भी आसानी से किया जा सकता है।
कुछ विशेष परिस्थितियों में क्वांटिटेटिव बफी कोट (QBC) टेस्ट भी किया जाता है, जो संक्रमण की तेजी से पहचान करने में मदद करता है।
वहीं, यदि अधिक सटीक जांच की जरूरत हो या सामान्य टेस्ट से स्पष्ट परिणाम न मिलें, तो पॉलीमरेज चेन रिएक्शन (PCR) टेस्ट कराया जाता है।
यह आधुनिक तकनीक संक्रमण की बेहद कम मात्रा का भी पता लगाने में सक्षम होती है।
बचाव भी उतना ही जरूरी
मलेरिया से बचने के लिए मच्छरों के काटने से बचाव सबसे प्रभावी उपाय है। घर और आसपास पानी जमा न होने दें, पूरी बांह के कपड़े पहनें, रात में
मच्छरदानी का इस्तेमाल करें और जरूरत पड़ने पर मच्छर भगाने वाले रिपेलेंट का उपयोग करें।
यदि बारिश के मौसम में तेज बुखार, ठंड लगना या बार-बार बुखार आने जैसी शिकायत हो, तो स्वयं दवा लेने के बजाय डॉक्टर की सलाह लेकर समय पर जांच कराना ही सबसे सुरक्षित कदम है।
जल्दी पहचान और सही इलाज से मलेरिया को गंभीर होने से रोका जा सकता है।

