आडवाणी जी
22 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के हाथों भगवान् श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा अयोध्या में हुई और ‘रामलला हम आएंगे मंदिर भव्य बनाएंगे’ का नारा पूर्ण हुआ है। पूरे राष्ट्र में जय श्रीराम का जयघोष हुआ।
आज प्रधानमन्त्री मोदी जी अपनी जनसेवा के 25 वर्ष पूरा होने पर हिन्दू राजनीति के लौहपुरुष भारत-रत्न माननीय श्री लालकृष्ण आडवाणी के निवास पर उनके आशीर्वाद लेने पहुंचे।
तब मुझे ये भाव आया कि प्रभु रामलला तो विराजमान हो गये पर वह क्षण अब तक नहीं आया जब वह भक्त जिसने राम के नाम को लेकर पहली बार भारत की राजनीति को झकझोरा, वह अपने आराध्य रामलला के सम्मुख पहुंचे और कृतकृत्य भाव से अपना मस्तक झुकाकर अपने भव्य जीवन की सर्वोच्च परिणति अपनी आंखों से देखे।
मुझे याद है 9 नवंबर 2019 का वो दिन जिस दिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया कि श्रीरामजन्मभूमि पूर्णतः हिंदुओं की है और उस पर मंदिर का निर्माण होगा। सारे देश में हर्ष की लहर फैल गई। राममंदिर आंदोलन की नेत्री रहीं साध्वी उमा भारती उस समय ऋषिकेश आदि में हिमालय की यात्रा पर थीं। यह फैसला सुनते ही उनकी गाड़ी दिल्ली की ओर मुड़ गई। वे सीधा विश्व हिन्दू परिषद कार्यालय पहुँचीं और श्री रामजन्मभूमि आंदोलन के शिल्पकार हिन्दू हृदय सम्राट परमपूजनीय श्री अशोक सिंघल जी को श्रद्धांजलि देने पहुंचीं और श्रद्धासुमन चढाए।
इसके बाद सीधा वे श्रीराम रथयात्रा के नायक और हिन्दू राजनीति के लौहपुरुष भारत-रत्न माननीय श्री लालकृष्ण आडवाणी जी के घर की ओर उनसे मिलने निकल पड़ीं। तब वे एक पोस्ट लिखती हैं। वे लिखती हैं,
“मैं हिमालय, उत्तराखंड गंगा किनारे से अभी-अभी दिल्ली पहुँची हूँ। आज बीजेपी के पदाधिकारियों की बैठक है। रास्ते में ही मैंने यह फ़ैसला सुना तो मैं सबसे पहले आडवाणी जी के घर पहुँचना चाहती हूँ, मैं उन्हें प्रणाम करूँगी एवं उन्होंने जो सीख दी है, उसपे आगे भी चलूँगी। आडवाणी जी ही वह भारतीय राजनीति के पुरोधा हैं जिन्होंने Pseudo Secularism Vs Nationalism की बहस भारत के राजनीति के पटल पर छेड़ी थी। उसी बहस के मंथन में से अयोध्या आंदोलन आगे बढ़ा।
भारत की राजनीति में आडवाणी जी वह पहले नेता थे जिन्होंने Pseudo Secularism की चूलें हिला कर रख दी थीं। उन्हीं के कारण आज भाजपा इस मुकाम पर है। लोगों ने जाति-संप्रदाय तथा वर्ग भेद से ऊपर उठकर मोदी जी का साथ दिया। आज हमारी पार्टी सत्ता की शीर्ष पर है, दुनिया में मोदी जी की जय-जयकार है, भारत परम वैभव तथा परम शक्तिशाली राष्ट्र होने की ओर है, इसकी नींव में जो रत्न थे, उनमें से एक जगमगाता हुआ रत्न हैं माननीय आडवाणी जी।
आज-अभी कुछ मिनटों में जब मैं उनके सामने खड़ी होऊंगी, तो मुझे लगेगा ही नहीं कि हिमालय पीछे छूट गया है, क्योंकि वो हिमालय जैसे ही हैं – महान और शीतल। ईश्वर उन्हें शतायु करे एवं स्वस्थ रखे।”
ये थे उमा भारती के शब्द। राममंदिर आंदोलन के प्रत्येक नायक के भाव यही हैं, कि लालकृष्ण आडवाणी जी हिमालय जैसे ही हैं, महान और शीतल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के लिए भी आडवाणी जी का यही स्थान है, जिसे बार बार उन्होंने अभिव्यक्त किया है, उनसे भेंटों में, उनके बारे में बताते हुए। 31 मार्च 2024 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने हिन्दू राजनीति के इस हिमालय को भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार “भारत रत्न” से सम्मानित कर भारत रत्न का मान बढ़ा दिया।
कौन हैं लालकृष्ण आडवाणी?

एक ऐसा नाम, जिसने “राम” को राजनीतिक विमर्श ही नहीं बनाया, बल्कि “बच्चा बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का” बना दिया। 1990 में जब लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की राम रथ यात्रा शुरू की थी, तब तक भाजपा लोकसभा में 2 सीटों पे सिमटी थी।
आडवाणी की रथ यात्रा को लालू यादव ने बिहार में रोक दिया, उन्हें गिरफ़्तार किया गया, लेकिन रामजन्मभूमि आंदोलन को कोई रोक नहीं पाया। और 6 दिसंबर 1992 को उस कलंक को हिन्दुओं ने सदा के लिए मिटा दिया। Indian Express रिपोर्ट की हैडिंग बनी, “No regrets over demolition, says Advani”.
1975 के आपातकाल में आडवाणी जी 19 महीने जेल में रहे। 1985 में शाहबानो फैसले को पलटने को उन्होंने वह turning point बताया जब भाजपा ने “pseudo-secularism” को सीधी चुनौती दी, 1989 में उन्होंने रामजन्मभूमि आंदोलन में उतरकर भारतीय राजनीति का भूगोल बदल दिया। आडवाणी ने स्वयं कहा कि रामजन्मभूमि आंदोलन भाजपा और उनके लिए “defining landmark” था और इसी “Hindu resurgence” ने पार्टी को राष्ट्रीय प्रमुखता तक पहुँचाया।
उन्होंने राम मंदिर आन्दोलन को “cultural nationalism” और अखण्ड कश्मीर को “national unity” बताया। अनुच्छेद 370 हटाना, समान नागरिक संहिता और अयोध्या में राम मंदिर, इन तीनों मुद्दों को उन्होंने भाजपा की घोषित वैचारिक प्रतिबद्धताओं में हमेशा रखा, जो आज साकार हो उठा है।
संसद में वीर सावरकर के चित्र का विरोध करने वालों का आडवाणी ने तीव्र प्रतिकार किया। 2004 में कांची के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी को उन्होंने साफ “Assault on Hinduism” कहा, उसी दौर में सावरकर और तिरंगे के अपमान के विरुद्ध आंदोलन किया।
आतंकवाद पर POTA हटाने का उन्होंने तीव्र विरोध किया और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा पर आघात बताया। जब राम मंदिर कानूनी उलझनों में फंसा था तब उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता को “intact and unwavering” कहा, और कहा कि भारत को स्वामी विवेकानंद की कल्पना जैसा “Hindu Renaissance” चाहिए। ऐसी हजारों घटनाएं हैं जब हिंदुत्व के हर मुद्दे पर आडवाणी जी प्रखरता से लड़ते रहे।
भारतीय राजनीति के पुरोधा आडवाणी जी इस साल 8 नवंबर को 99 वर्ष के हो जाएँगे। हिन्दू राजनीति के पुरोधा श्री लालकृष्ण आडवाणी जी 8 नवंबर 2027 को शतायु हो जाएँगे, वेदों और शास्त्रों में कहे गये जीवेम शरदः शतम् ऐसे ही महापुरुषों के लिए सार्थक हैं। वे 100 वर्ष के हो जाएँगे। प्रभु श्रीराम करें वे अपनी जन्म शताब्दी अपनी आँखों से देखें, व स्वस्थ रहते हुए और दीर्घायु प्राप्त करें।
22 जनवरी 2024 के भव्य प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में श्री लालकृष्ण आडवाणी नहीं थे। उन्हें आमंत्रित किया गया था और अत्यधिक आयु तथा स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उनकी उपस्थिति संभव नहीं हो सकी। पर क्या उसके ढाई साल बाद भी क्या कभी ऐसी विशेष व्यवस्था नहीं की जा सकती थी कि राम रथ यात्रा का यह वृद्ध सारथी कुछ मिनट अपने रामलला के दर्शन कर सके?
क्या नेताओं, न्यायाधीशों, अधिकारीयों में कोई वृद्ध नहीं होते? क्या राष्ट्रपति भवन, संसद या बड़े आयोजनों में वृद्धजन विशेष व्यवस्था से नहीं आते? आडवाणी जी को एयर एम्बुलेंस या विशेष व्यवस्था से लाकर दर्शन क्यों नहीं कराए जा सकते?
भगवान न करें पर यह कितना दुखद होगा कि भारत की सांस्कृतिक राजनीति का अग्रगामी रामरथ सारथी श्री रामलला के दर्शन किए बिना ही संसार से विदा हो जाए?
यह किसी बूढ़े नेता को तीर्थयात्रा कराने का मामला नहीं है। यह राष्ट्रीय ऋण है। कल्पना कीजिए, 99 वर्षीय आडवाणी जी भव्य राममंदिर में प्रभु श्री रामलला के समक्ष बैठे हों, पास में पीएम नरेंद्र मोदी जी खड़े हों। वह एक तस्वीर एक सदी की भारतीय राजनीति की महानतम तस्वीरों में एक होगी।
श्री लालकृष्ण आडवाणी जी को अयोध्या ले जाकर भव्य राममंदिर और श्रीरामलला के दर्शन कराना केवल एक सम्मान नहीं, एक अनिवार्य कृतज्ञता होगी। यदि आडवाणी जी को अयोध्या में श्रीरामलला के दर्शन कराने के लिए राफेल भी लगाना पड़े तो लगा देना चाहिए। ऐसी कोई चीज, कोई बाधा, कोई परेशानी नहीं हो सकती कि आडवाणी जी रामलला के दर्शन न कर सकें। वे लौहपुरुष हैं, पूर्ण स्वस्थ, आज भी अविचल और अटल।
31 मार्च 2024 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु जी स्वयं उनके आवास पहुँचीं और उन्हें भारत रत्न प्रदान किया। पीएम नरेंद्र मोदी जी भी वहाँ उपस्थित थे। राज्य चाह ले तो protocol व्यक्ति के सम्मान के अनुसार ढल सकता है। फिर अयोध्या जाने के लिए विशेष विमान क्यों नहीं हो सकता? स्वास्थ्य की जरा सी भी बाधा हो तो डॉक्टरों की पूरी टीम हर पल साथ रहे। नियंत्रित route, wheelchair-access, कुछ मिनट रामलला का दर्शन, क्या यह भारत की क्षमता से बाहर है?
इसलिए कहता हूँ, इस पवित्र काम में राफेल ही क्यों न लगाने पड़ें, लगा दीजिए। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए..
आज माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने माननीय आडवाणी जी से मुलाकात कर उनका आशीर्वाद लिया। मोदी जी से एक निवेदन और है कि आदरणीय आडवाणी जी को श्रीरामलला के दर्शन कराने का पवित्र कार्य भी आपके द्वारा सम्पन्न हो, यह उनके लिए भारत रत्न से भी बड़े व सर्वोच्च सम्मान की बात होगी।
— मुदित —

